#HumanStory: व्हीलचेयर देख स्विमिंग पूल वालों ने एंट्री नहीं दी, आज अरेबियन सागर का ख़िताब है नाम

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Updated: September 2, 2019, 10:42 AM IST
#HumanStory: व्हीलचेयर देख स्विमिंग पूल वालों ने एंट्री नहीं दी, आज अरेबियन सागर का ख़िताब है नाम
कमर से नीचे पूरी तरह से सुन्न शरीर के साथ शम्स के हिस्से तैराकी के दर्जनों रिकॉर्ड हैं

व्हीलचेयर पर पहुंचें तो आपके नाम कितने ही रिकॉर्ड्स हों, लोग तरस ही खाएंगे. ये कुर्सी आपको बेचारा बना देती है. इसी साल एक स्विमिंग पूल वालों ने मुझे एंट्री देने से इनकार कर दिया. उनका कहना था कि मैं उनके 50 मीटर पूल में डूब जाऊंगा. लगातार 5 दिनों की मशक्कत के बाद आखिरकार उन्हें बताया- मैं इन्हीं नामालूम पैरों के साथ अरेबियन सागर तैर चुका हूं.

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ख्वाबों का आंखों से कोई ताल्लुक नहीं, वे जज्बे की कोरों पर पलते और वहीं जवान होते हैं. पैरा-एथलीट (Para-Athlete) मोहम्मद शम्स आलम (Mohammad Shams Aalam ) जब ये कहते हैं तो किलोमीटर दूर उनकी आवाज थरथरा रही है. कमर से नीचे पूरी तरह से सुन्न शरीर के साथ शम्स के हिस्से तैराकी के दर्जनों रिकॉर्ड हैं. पढ़ें, शम्स को.

बिहार के मधुबनी में बचपन बीता. गांव तकरीबन हर साल सैलाब में डूबा होता. तीन तरफ नदियां. पानी ही पानी. अगर जमीन के एक हिस्से को छोड़ दें तो हम किसी छोटे-मोटे टापू पर रह रहे थे. घर से सटकर एक बड़ा सा पोखर हुआ करता. वो इतना करीब था कि हमारे घर के पते पर गांव का नामभर लिख पोखर के बाजू में लिख दें तो खत पहुंच जाए!

गांव के दूसरे बच्चों की तरह मैं भी दिन-दोपहर बाहर खेला करता. छुटका सा था. पोखर इतना करीब कि गिरूं तो सीधा पानी में मिल जाऊं. मुझे नहीं याद कि मैं गिरा या नहीं लेकिन तैरना जरूर आ गया. मुंह से पानी का फव्वारा बनाते हुए पीठ के बल तैरता. अब जाकर जाना कि उसे बैक स्ट्रोक कहते हैं.

घर से सटकर एक बड़ा सा पोखर हुआ करता


वालिदान खूब खुशी से अपने तैराक बच्चे के किस्से सुनाते हैं. मैं 2 का था, तब पोखर के इस पार से उस पार सर्र से निकलने लगा. गांववाले तालियां बजाते. वालिदान खुश होते.

याद करता हूं तो कोहासे में डूबा हुआ कुछ याद आता है कि कैसे में गांव की मिट्टी में खेला-कूदा करता और कैसे मुझे गांव से सीधे मुंबई भेज दिया गया. घर का सबसे छोटा और सबसे लाड़ला था मैं. अब्बा पुश्तैनी खेती-बाड़ी करते. सारे बच्चों की पढ़ाई गांव के मदरसे में हुई. अब अब्बा ने तय किया कि छुटके यानी मेरे साथ ये नहीं होगा. मुझे मुंबई भेजने का पक्का हुआ. वहां भैया लोग लेडीज पर्स बनाया करते. नदियों-पोखरों वाले गांव से मैं सीधा मुंबई आ गया. सरकारी स्कूल में पढ़ना शुरू किया. पहले-पहल सोता तो गांव की नदियां बेतहाशा याद आतीं. जागता तो पसीने में डूबा होता जैसे अभी-अभी पानी में डुबकी लगाकर लौटा हूं.

धीरे-धीरे शहर में रमने लगा. मार्शल आर्ट सीखी. खूब उठापटक करता. मेडल लेकर लौटता तो वालिदा नजर उतारतीं. साथ में हर बार एक किस्सा सुनातीं. दरअसल उनके पिता पहलवान थे. पहलवानी में अपने जमाने में पूरा देश घूमा. वालिदा को इतना वक्त जाने के बाद भी उन तमाम शहरों के नाम याद थे. मेरी जीत पर कहतीं- ये तुम्हारे नाना का ही असर है.
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एशियन गेम्स की बेहद मजबूत दावेदारी छोड़कर मैं अस्पताल में भर्ती हो गया


नौ साल पहले जिंदगी एकदम से बदली. कई दिनों से पीठ में हल्का-हल्का दर्द रहने लगा था. धीरे-धीरे चाल बदलने लगी. मैं लंगड़ाकर चलने लगा था. MRI में स्पाइन में एक गांठ दिखी. उसकी वजह से नर्वस सिस्टम पर दबाव बन रहा था. डॉक्टर ने सर्जरी की सलाह दी. मुंबई का नामी-गिरामी अस्पताल. ठंडे लेकिन दोस्ताना लहजे में सर्जरी की जरूरत समझाते हुए डॉक्टर ने कहा- अभी करा लो तो ठीक. देर हुई तो बहुत देर हो जाएगी.

एशियन गेम्स की बेहद मजबूत दावेदारी छोड़कर मैं अस्पताल में भर्ती हो गया. सर्जरी हुई. सीने के नीचे का शरीर सोया रहता. डॉक्टर ने भरोसा दिलाया- बस, 15-20 रोज. फिर दौड़ने लगोगे.

घर लौटा तो बिस्तर पर सोए हुए दिन बीतने का इंतजार करता. बस इतने रोज और. बस उतने और. अम्मी-अब्बू सिरहाने सोते-जागते. अम्मी बीच-बीच में पैरों को छूतीं. चुटकियां काटतीं. मुझे कुछ पता नहीं चलता था लेकिन फिर डॉक्टर की हिदायत याद आती. मैं अम्मी को तसल्ली देता- अभी तो इतने दिन बाकी हैं. भीतर से मेरा सब्र भी चुक रहा था. बस, उस पर इंतजार का मुलम्मा चढ़ा हुआ था.

दोबारा सर्जरी के बाद गांठ निकल गई लेकिन कमर के नीचे का हिस्सा सुन्न हो चुका था


महीने भर बाद भी जब सीने के नीचे का हिस्सा सुन्न ही रहा तो दोबारा MRI हुई. गांठ जस की तस थी. उसे तो छुआ ही नहीं गया था, और स्पाइनल कॉर्ड से सॉफ्ट टिश्यू निकाल दिए गए थे. दोबारा सर्जरी होनी थी. मेरे पास न पैसे थे, न हिम्मत. एशियन गेम्स का वक्त बीत चुका था. दोबारा सर्जरी के बाद गांठ निकल गई लेकिन कमर के नीचे का हिस्सा सुन्न हो चुका था. डॉक्टरों की नई टीम ने खास डॉक्टरी लहजे में बताया- इसे पैराप्लेजिक होना कहते हैं.

अम्मी का सूखा मुंह आज भी याद आता है. उसकी आंखें हर वक्त सूजी रहतीं, लेकिन मेरे सामने वो कभी नहीं रोई. मैं समझता था कि उसके दिल में क्या चल रहा होगा! पहलवान नाना का नाती अब हरदम के लिए व्हीलचेयर पर रहेगा!

साल 2011 के आखिर की बात है. फिजियोथैरेपी के एक सेशन में डॉक्टर ने बताया कि तैराकी 'मेरी तरह के मरीजों' की काफी मदद करती है. कोई और वक्त होता तो मन मसोस कर रह जाता लेकिन इस बार बात तैराकी की थी. यानी नदी. यानी तालाब. यानी समंदर! जिस शाम उसने ये कहा, मैं अगली सुबह का इंतजार नहीं कर पा रहा था. अगले रोज स्विमिंग पूल पहुंचा. पूल वालों को पहले तो समझ ही नहीं आया कि मैं अपने लिए एंट्री मांग रहा हूं. समझा तो तुरंत टरका दिया. एक के बाद एक कई जगहों पर मना किया गया. सबको डर था कि व्हीलचेयर पर बैठा मैं पानी में कुछ नहीं कर सकूंगा. अच्छे-बुरे लहजे में सबने यही कहा- आप डूब गए तो हमारा पूल बंद हो जाएगा.

अच्छे-बुरे लहजे में सबने यही कहा- आप डूब गए तो हमारा पूल बंद हो जाएगा


बहुत बाद में एक पूल में मौका मिला. ट्रायल के लिए लाइफगार्ड मुझे किनारे तक ले गए. मुझे पानी में उतारने के बाद वे एलर्ट थे कि मैं अब डूबा और वे तब कूदे. डुबुक-डुबुक. कई बार डाइव के बाद मैं दोबारा सतह पर आ जाता. यहीं से मेरा अंधेरों में खोया ख्बाव दोबारा सांस लेने लगा. तैरते हुए मैं सब भूल जाता. कमर के नीचे शरीर न होना. पैरों का बेजान होना. व्हीलचेयर. अम्मी की उदासी. मेरे रतजगे. मैं सिर्फ तैरता.

बहुत आहिस्ते से पैरालंपिक गेम्स की तैयारियां शुरू कीं. इसके बाद के किस्से बहुतों को मालूम हैं लेकिन कम ही लोग उस शम्स से मिले हैं जिसके शरीर पर बिस्तर पर पड़े रहने के कारण जख्म ही जख्म थे. जिसका मन उसके शरीर से भी ज्यादा जख्मी था. व्हीलचेयर देखता तो दहशत होती. किसी वक्त पर दुनिया जीतने का ख्वाब देखने वाला शख्स इंटरनेट पर मजबूत और ज्यादा कारगर व्हीलचेयर खोजता.

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First published: September 2, 2019, 9:40 AM IST
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