#HumanStory: वकालत की पढ़ाई छोड़कर घर लौट आया ताकि पानी 'लूट' सकूं

दरारें पड़ी जमीन, सूखे नलके, हड्डियों का ढांचा बन चुके पशु और गिनकर घूंट पीते चेहरे. ये कहानी है मराठवाड़ा के पैथन की. पिछले कई सालों से सूखे से जूझ रहे इस तालुके में हर घर में पानी की अलग कहानी है. मिसाल के तौर पर 21 साल के अमजद पठान को वकालत की पढ़ाई छोड़कर गांव लौटना पड़ा ताकि वे बीमार मां और जर्जर पिता के लिए टैंकर से पानी 'लूट' सकें. पढ़िए, अमजद को.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 30, 2019, 12:02 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 30, 2019, 12:02 PM IST
(चार महीने बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने मन की बात की. इस दौरान उन्होंने जिस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया, वो है पानी बचाने की अपील. देश के ज्यादातर हिस्सों में पानी को लेकर जो हाहाकार मचा हुआ है, उसे फोकस करते हुए पीएम ने जल संरक्षण पर जन आंदोलन चलाने की अपील की. news18 ने देश में बढ़ते जलसंकट पर बाकायदा एक मुहिम छेड़ी हुई है, जिसमें सूखाग्रस्त इलाकों में रहने वालों का दर्द उन्हीं के लफ्जों में बताने की कोशिश की गई है. पढ़िए, इसी सीरीज़ की चुनिंदा कहानियां...)

सुबह के 11 बजे होंगे. चिलचिलाती धूप में पूरा गांव मैदान में जमा है. सबके हाथों में कोई न कोई बर्तन या ड्रम है. लोग बेसब्री से अपना मोबाइल टटोलते हैं. वक्त देखते हैं और फिर बर्तन पर जमाकर हाथ रख लेते हैं. लगभग घंटेभर बाद टैंकर की आवाज सुनाई देती है और शांति से खड़े लोग एकदम से 'एक्शन' में आ जाते हैं.

टैंकर के रुकते- न रुकते उसके चारों ओर भीड़ जमा हो जाती है. चाचा-ताऊ-मौसी कहने वाले लोग एक-दूसरे को धकिया रहे हैं. कुछ हट्टे-कट्टे लड़के टैंकर के ऊपर चढ़ जाते हैं और पाइप डाल देते हैं. नीचे खड़े लोग उनसे अपनी सिफारिश कर रहे हैं. टैंकर पर खड़े विजयी लोगों में से एक हैं अमजद. लॉ की किताबें छोड़कर फिलहाल वे घर के ड्रम-भगौने संभाले हुए हैं.



अमजद कहते हैं- मेरी पढ़ाई, घर में पानी से जरूरी नहीं.

गांव में पानी की किल्लत हुई तो मां ने टैंकर से पानी भरने का जिम्मा ले लिया. बीमार रहती है. बड़ी मुश्किल से घर के भीतरी काम कर पाती है. वो जाती तो थी, लेकिन पानी ला नहीं पाती थी. कई बार गिरते-गिरते बची. खाली हाथ लौटती. पिताजी की भी उम्र हो चली है. बहन है लेकिन इतनी धक्का-मुक्की में वो पानी कैसे लेगी!

चार दिन में एक बार सरकारी टैंकर आता है. अगर पानी न भर सकें तो अगले चार दिनों तक गुजारा कैसे होगा. प्राइवेट टैंकर मनमानी कीमत लेते हैं लेकिन देना पड़ता है. ऐसा कई बार हुआ.


मैं शहर में था. औरंगाबाद शहर के नामचीन लॉ कॉलेज में एडमिशन हुआ था. मेरे कमरे के बाथरूम में नल से पूरी तेजी से पानी आता. टोंटी खोलते ही घर के लोग याद आते थे. एग्जाम होने वाले थे. गर्मियां बढ़ गईं और इसके साथ ही गांव की बावड़ियां सूख गईं. टैंकर आने लगा. मां जाती- लौटती. पिता जाते- खाली लौटते. पानी के बिना गुजारा नहीं. तब एक दिन मैं गांव लौट आया.

टैंकर से 200 लीटर का ड्रम भर पाना किसी फतह से कम नहीं.

अमजद बताते हैं. टैंकर रुकते ही 2 मिनट में पूरा पानी खत्म हो जाता है. ऐसी लूट मचती है कि किसी को किसी की उम्र या रिश्ते की परवाह नहीं रहती. ऐसी लड़ाई-भिड़ाई होती है कि छोटा बच्चा हो तो दबकर मर जाए. पब्लिक 'टूटकर' गिरती है.



हालात हमेशा ऐसे नहीं थे. कुछ सालों पहले तक बावड़ी ऊपर तक पानी से भरी हुई थी. धीरे-धीरे पानी नीचे जाने लगा और अब एकदम तले पर लग गया है. कई घंटों बाद धीरे-धीरे रिसकर पानी जमा होता है. तब किसी हल्के-फुल्के आदमी को रस्सी और एक छोटा ड्रम देकर नीचे उतारा जाता है. वो पानी भरता है और फिर ऊपर खींच लेता है. गंदला, कीचड़वाला पानी. उसे ही छानकर हम बर्तन धो लेते हैं. फिटकरी डालकर पी लेते हैं.

जब से पानी कम हुआ है, गांव में पेट की बीमारी बढ़ गई है. वजह सब जानते हैं लेकिन कोई दूसरा रास्ता नहीं.

पिता सारी उम्र किसानी करते रहे. छोटे थे तो हम भी खेत की मिट्टी में खूब उछलते-कूदते. फसल के वक्त साथ जाया करते. खेल-खेल में काम हो जाता. हर साल फसल लहलहाती. घर में अनाज के कट्टे बनते. पिता कीमत का जोड़-भाग करते.



मां-पिताजी के लिए खेत मां से कम नहीं था. उसे प्यार करते. देखभाल करते. फसल हो, या न हो, रोज जाते. उसमें नजरबट्टू भी लगाया हुआ था. फिर एक रोज जमीन को नजर लग गई.

धीरे-धीरे बारिश कम होने लगी. पहले साल के साल फसल आती. अब पिछले पांच सालों से खेत खाली है. मौसंबी के झाड़ों का छोटा-सा बागान था. वो भी सूख गया गया है. घर के हाल देखकर छोटा भाई मिस्त्री का काम करने लगा. सुबह जाता, देर शाम लौटता है. मैं शहर में पढ़ाई के साथ हफ्ते में तीन दिन नाइट शिफ्ट कर रहा था. अब वो भी छूट गया.

हसरत-भरी आवाज में अमजद कहते हैं- एक दिन हमारे गांव में भी खूब बारिश होगी. बावड़ियां लबालब होंगी. तब मैं दोबारा पढ़ूंगा.

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