#HumanStory: कहानी उस गांव की, जहां पानी के लिए मर्द करते हैं कई शादियां

डेंगनमल गांव. मुंबई से महज 150 किलोमीटर दूर होने के बावजूद एकदम कोरा. इसी गांव में एक घर है तुकाराम का. मिट्टी और बांस से बने घर में सजावट के नाम पर सिर्फ एक तस्वीर है. इसमें वे तीन औरतों के साथ बैठे हैं. एक-से कपड़ों में सजी-धजी ये औरतें तुका की बीवियां हैं. पहली बीवी से 6 औलादें हैं. वहीं 2 पत्नियों से कोई औलाद नहीं. ये इत्तेफाक नहीं. ये दोनों औरतें वॉटर वाइव्स हैं. यानी वे पत्नियां, जो तभी तक पत्नियां हैं, जब तक वे पानी लाएंगी. ठेठ बोली में इनके ओहदे का एक नाम है- पानीवाली बाई.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: July 5, 2019, 5:19 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: July 5, 2019, 5:19 PM IST
(तुकाराम और उनका 'त्रि-पत्नी परिवार' देश के कई सूखाग्रस्त हिस्सों के आने वाले कल की तस्वीर है. जहां एक मर्द की कई बीवियां होंगी, एक भीतरी काम संभालेगी तो दूसरी-तीसरी पानी लाया करेंगी.)

ये कहानी आज से कई-कई चांद पहले की है. तुकाराम की नई-नई शादी हुई थी. सबकुछ ठीक चल रहा था. वे काम के लिए घर से निकलते तो शाम ढले लौटते. पत्नी शांति झाड़ू-बुहारी करतीं. पानी लातीं. खाना पकातीं. फिर पानी लातीं. और तब पति के लौटने का इंतजार करतीं. कुछ वक्त बाद शांति के एक औलाद हुई. फिर दूसरी. फिर तीसरी...और फिर छठवीं. अब तुकाराम की परेशानी बढ़ गई. किलोमीटरों दूर जाकर पानी कौन लाए!



गांव में पानी के लिए कुआं तो है लेकिन गरीब की तिजोरी की तरह सूखा रहता है.

कोई नल या तालाब नहीं. गंदे पानी का कोई पोखर तक नहीं. सखा पानी लाएंगे तो पैसे कौन लाएगा! गांव के कई दूसरे मर्दों की तरह तुकाराम के पास भी हल था. वे पानीवाली बाई यानी एक और पत्नी ब्याह लाए.

भयंकर सूखे से जूझ रहे इस गांव में पानी के लिए शादी कोई अनोखी बात नहीं. तुकाराम याद करते हैं- जब दूसरी शादी की सोची, तब शांति कई दिनों तक नाराज रही. हमारा छठवां बच्चा आने वाला था. पहली पांच औलादों तक तो जैसे-तैसे उसने संभाल लिया था लेकिन अब मुश्किल हो रही थी. पूरे पेट के साथ हर मौसम में कई किलोमीटर चलना और फिर कुएं से पानी निकालना. बच्चों को एक-दूसरे के भरोसे छोड़कर जाती. लौटते हुए निढाल हो जाती.



मैं शाम को लौटता तो पता चलता कि घर में चूल्हा नहीं जला है. या रोटियां पकनी बाकी हैं. या फिर पीने तक को पानी नहीं है क्योंकि शांति जा नहीं पाई. गांव से कई मर्द दूसरी, तीसरी बीवियां करते हैं. मैं तो तब भी एक और पत्नी लाने जा रहा था. शांति के साथ मान-मनौवल का खेल खेला. फिर बस एक सुबह घर से निकला. लौटा तो दूसरी पत्नी साथ थी. पहली बच्चे संभालती. दूसरी पानी लाती. जरूरतें बढ़ीं और साथ ही तुकाराम का परिवार भी.
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आज लगभग 69 बरस के तुकाराम की तीन बीवियां हैं. तीनों एक साथ, एक ही छत के नीचे रहती हैं. सबके ओहदे अलग-अलग हैं और साथ ही जिम्मेदारियां भी बंटी हुई हैं.

साखी नाम की दूसरी बीवी पकी उम्र की औरत है. साखी दूसरी पत्नी बनने को कैसे राजी हुईं, ये समझना खास मुश्किल नहीं. साखी का पहला पति सालों पहले उसे छोड़कर चला गया था. गांव के बाहर एक कमरे के घर में रहती साखी झंगा (पानी का कलशा) भरकर पानी ला पाती थीं लेकिन रसोई में पकाने को कुछ नहीं होता था.

ऐसे में तुकाराम का 'उदार प्रस्ताव' मिला. साखी तुरंत राजी हो गईं. अब शांति घर पर खाना पकातीं और साखी मटके भर-भरकर पानी लातीं.

साखी रोज लगभग 60 लीटर पानी लाया करतीं. इस काम में उन्हें सुबह से शाम हो जाती. वक्त के साथ वो बीमार रहने लगीं. ऐसे में तुकाराम को तीसरी शादी करनी पड़ी. तीसरी पत्नी रमा विधवा थी. तुकाराम ने रमा को समझाया- तुम्हारा काम सिर्फ और सिर्फ पानी लाना है. मेरे लिए. मेरी दो बीवियों के लिए. बच्चों के लिए. और खुद अपने लिए.



शांति अब भी घर पर खाना पकातीं और बाकी के काम करती हैं. साखी के पास नया काम है, वो खेतों में मजदूरी करती हैं. वहीं तकरीबन 10 साल पहले आई तीसरी पत्नी रमा पानी लाती हैं. गांव की पंचायत को मर्दों की कई-कई शादियों पर कोई एतराज नहीं.

तुकाराम कहते हैं- मैं कमउम्र, जवान औरतों को ब्याहकर नहीं लाया. मेरे साथ वो औरतें आईं, जो बेसहारा थीं. पंचायत भी मानती है कि मैंने उनका घर दोबारा बसा दिया (मुख्यधारा से अनजान तुकाराम 'पुनर्वास' शब्द इस्तेमाल नहीं करते).

मेरे अलावा गांव के ज्यादातर मर्दों ने दो-दो शादियां की हैं. इसमें न कुछ नया है और न ही कुछ गलत.

तीसरी और आखिरी (!) पत्नी रमा रोज लगभग 5 से 7 किलोमीटर चलकर गांव के बाहरी कुएं तक जाती है. लौटते हुए उसके सिर पर लगभग 15 लीटर के स्टील के दो झांगे होते हैं. 30 लीटर पानी सिर में संभालने के साथ उसके एक हाथ में भी पानी-भरा कोई बर्तन होता है. एक खाली हाथ से वो सिर पर सहारा दिए रहती हैं. लौटती हैं तो घर के बच्चे दूर से ही आवाज लगाते हैं. पहली पत्नी तुकी बाहर आती हैं. हाथ देकर भरे बर्तन नीचे उतारे जाते हैं. ये करते हुए खास एहतियात बरती जाती है कि एक बूंद पानी न छलके.

लौटने के बाद रमा खाली बर्तन लेकर एक बार फिर निकल पड़ती हैं. किसी-किसी रोज उन्हें पानी के लिए तीन चक्कर भी लगाने पड़ जाते हैं. आखिरी फेरे के बाद एक ही आसरा होता है कि रोटी पकी-पकाई मिलेगी और सोने के लिए छत.

हालांकि हर मौसम में दिन के 10 से 12 घंटे चल रहीं रमा के सिर के बाल झड़ने लगे हैं. गर्दन और कमर में हर वक्त दर्द रहता है. और उन्हें बच्चा पैदा करने की भी इजाजत नहीं.



क्यों?

तुकाराम के पास इसका भी जवाब है. 'अगर वे भी बच्चा लाएंगी तो पानी कौन लाएगा?'

पानी के लिए सालों से जूझ रहे तुका की आंखों में नाउम्मीदी है. कहते हैं- साल 2013 में हमारे गांव के हर घर को 'सरकारी' बर्तन मिले. एलुमिनियम के बड़े-बड़े बर्तन ताकि पानी जमा किया जा सके. लेकिन बर्तन देने वाले ये नहीं बता सके कि जमा करने के लिए पानी आएगा कहां से.

खेती किया करता था. हाथ-पैर गीली मिट्टी में सने होते. आंखें हरियाली देखने की आदी थीं. अब हफ्ते में एक बार पास के एक गांव 'कसारा' जाता हूं. वहां थोड़ी सब्जी-तरकारी खरीदता हूं. उतनी ही हरियाली अब देख पाता हूं. रोज शाम को मजदूरी के बाद लौटता हूं. आंगन में बच्चे धूल से सने खेलते होते हैं. पीने-पकाने को पानी मुश्किल से जुटता है. ऐसे में रोज कौन नहाए-नहलाए!

(पश्चिमी महाराष्ट के ठाणे में आने वाले इस गांव के चरित्रों के नाम बदल दिए गए हैं.)

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