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Human Story: मैं चाहता हूं कि अंकित बस एक बार सपने में आकर मुझसे बात कर ले

Human Story: मैं चाहता हूं कि अंकित बस एक बार सपने में आकर मुझसे बात कर ले

अंकित सक्‍सेना की इस साल फरवरी में गला रेतकर हत्‍या कर दी गई थी, क्‍योंकि जिस लड़की से उसे प्‍यार था, वो मुसलमान थी. अंकित के जाने के बाद कैसे जी रहे हैं उसके बूढ़े मां-बाप

  • News18Hindi
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    1 फरवरी की बात है. उस दिन ठंड बहुत थी. शाम का समय था. मैं घर पर नहीं था और मेरी पत्‍नी खाना बना रही थी. अंकित शाम को घर आया. अभी आकर ठीक से बैठा भी नहीं था कि कुछ दोस्‍त आए उसे बुलाने. उनकी आपस में जाने क्‍या बात हुई कि अंकित पानी का गिलास वहीं छोड़कर निकल गया. मां ने पीछे से आवाज लगाई, बेटा पानी तो पी जा. अंकित चला गया.

    कुछ देर बाद खबर आई कि बाहर सड़क पर हंगामा हो रहा है. उसकी मां को लगा कि किसी से लड़ाई-झगड़ा हुआ होगा. वो भागकर गई. तब तक मुझे भी खबर मिल गई थी. मैं भी दौड़ा-दौड़ा पहुंचा. हमने देखा कि अंकित को कुछ लोग घेरे हुए थे. उसकी मां ने भीड़ को चीरकर उस तक पहुंचने की कोशिश की, लेकिन जब तक वो कुछ समझ पाती अंकित धड़ाम से अपनी मां को पकड़कर गिर पड़ा. हमें तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि हुआ क्‍या है. अंकित बेहोश था और उसके गले से खून निकल रहा था. हमने ऑटो रोका और उसे लेकर अस्‍पताल भागे. अंकित का सिर उसकी मां की गोद में था. उसकी साड़ी, शॉल, स्‍वेटर, सब खून से लथपथ था. मां ने अंकित के गले पर हाथ रखा तो उसका हाथ भीतर धंस गया. उन लोगों ने किसी धारदार हथियार से उसका गला रेत दिया था. हम ऐसे जड़ मानो पत्‍थर. भयानक सर्दी थी, लेकिन हम पसीने से लथपथ थे. उसकी मां की जबान को मानो लकवा मार गया. हम अस्‍पताल पहुंचे, वो लोग तुरंत अंकित को आइसीयू में ले गए. उसकी मां बाहर बैठी कांप रही थी. हमें यकीन था कि सब ठीक हो जाएगा. अंकित को कुछ नहीं होगा.

    वो रात जैसे बीती है हम पर, हम बयां नहीं कर सकते. हमें लगा था कि हम मर जाएंगे.

    आखिरकार डॉक्‍टरों ने हमें वो सच बता दिया, जिसका सामना करने को हम तैयार नहीं थे. अंकित अब इस दुनिया में नहीं था. उसकी मां अस्‍पताल के फर्श पर बेहोश हो गई. मैं एक तरफ अपनी पत्‍नी को संभाल रहा था और दूसरी तरफ मेरा बेटा दुनिया छोड़कर जा चुका था.



    फिर भी आखिरी क्षण तक हम खुद को ये यकीन दिलाने की कोशिश करते रहे कि सब ठीक है. अंकित अभी घर लौटा ही नहीं है. अभी उसकी बाइक की आवाज सुनाई देगी. अभी दरवाजे की घंटी बजेगी और वो हंसता हुआ आकर अपनी मां से लिपट जाएगा. उसकी साड़ी के आंचल से अपना मुंह पोंछेगा. वो गुस्‍सा होने का नाटक करेगी, वो लडि़याएगा. अभी ये सब होने वाला है. मैं ये होते हुए देखूंगा. जो हो रहा है, वो तो सपना है. अभी आंख खुलेगी और पता चलेगा कि ये तो एक बुरा सपना था.
    लेकिन नींद टूटी नहीं. उस दिन के बाद अंकित की आंख खुली नहीं और हमारी बंद हुई नहीं.

    बेटा, जो आंखों की रौशनी था
    अंकित को देखते थे तो यकीन नहीं होता था कि वो हमारा ही बेटा है. इतना सुंदर कि कोई देखे तो देखता ही रह जाए. मैं भी उसे आंख भरकर देखता तो मेरी आंखें भीग जाती थीं. ये बेटा किस जन्‍म के पुण्‍यों का फल है. हमारे पास उसे किसी बड़े कॉलेज में पढ़ाने के पैसे तो थे नहीं, लेकिन उसने अपने बल पर इतना हुनर हासिल कर लिया था. वो बहुत अच्‍छी फोटो खींचता था और कंप्‍यूटर पर तो उसकी उंगलियां ऐसे चलती थीं, जैसे मक्‍खन पर फिसल रही हूं. वो फिल्‍में बनाता था, खुद ही उसकी एडिटिंग करता था और यू-ट्यूब पर डालता था. उसने अपना एक यू-ट्यूब चैनल बनाया था. वो अपने काम से पैसे भी अच्‍छे कमा लेता था. रोज जिम जाता था और उसने इतनी अच्‍छी बॉडी बनाई थी. उसकी मां को तो वो किसी हीरो से कम नहीं लगता था. वो हमारा हीरो था. मैं बड़ा मामूली, गरीब आदमी. जिंदगी भर ऐसे काम किया कि रोज कमाया, रोज खाया. रोज कुआं खोदा, रोज पानी पिया. इतनी कमाई थी ही नहीं कि कुछ बचा पाता. लेकिन अंकित का काम ऐसा था कि कई बार एक फोटो शूट के उसे 50-50 हजार तक मिल जाते थे.



    मैं कई बार डरकर पूछता कि बेटा, इतने पैसे कोई फोटो खींचने के क्‍यों देगा तो वो बताता था आजकल बड़ी-बड़ी शादियों में इससे भी ज्‍यादा पैसे मिलते हैं. वो बहुत मेहनती लड़का था. पूरी-पूरी रात जागकर काम करता. आज फोटो खींचकर लाया और अगले दिन ही उसे एडिट करके क्‍लाइंट को दे देता. इसी कारण उसे काम भी मिलता था. सब उसे बहुत प्‍यार करते थे, वो अपने दोस्‍तों की जान था. मेरा बेटा एक कमरे के इसी घर में पैदा हुआ और जवान हुआ. हमेशा कहता था कि पापा, एक दिन मैं आपको एक बड़े घर में ले जाऊंगा. फिर आपको काम भी नहीं करना पड़ेगा. मैं अच्‍छा कमाने लगूंगा तो मां को घर का कोई काम नहीं करने दूंगा. जीवन ने बहुत दुर्दिन दिखाए थे, बड़ी तकलीफें सहीं, मेहनत की, लेकिन दिन नहीं फिरे. अभी उम्र ही क्‍या थी उसकी. 23 साल कोई उम्र होती है. 23 साल तक उसे पाल-पोसकर बड़ा किया, अपने खून से सींचा और 23 साल की फसल तीन सेकेंड में खत्‍म हो गई. अंकित ही हमारी आंखों की रौशनी थी. भगवान को हमारी खुशी से जाने क्‍या बैर था, उन्‍होंने हमारी आंखों की रौशनी ही छीन ली.

    मेरे बेटे को मुसलमान ने नहीं, नफरत ने मारा
    मैं उस लड़की के बारे में कुछ नहीं जानता था. बस इतना पता था कि वो उसकी दोस्‍त है. अंकित ने हमें कभी इससे ज्‍यादा कुछ बताया नहीं. कई बार लगा था कि वो कुछ बताना चाहता है, शायद बात करना चाहता है, लेकिन उसकी मौत से कुछ ही दिन पहले मुझे हार्ट अटैक आया था. उसके बाद मैं काफी कमजोर हो गया था. शायद इस डर से उसने न बताया हो कि मुझे धक्‍का लगेगा. हम ये बर्दाश्‍त न कर पाएं कि जिस लड़की से वो प्‍यार करता है, वो मुसलमान है. मैं बार-बार सोचता हूं कि काश उसने हमें सब पहले ही बता दिया होता. काश उसे इस बात का डर न होता कि लड़की मुसलमान है. मेरे लिए तो जैसे वो मेरा बच्‍चा, वो भी मेरी बच्‍ची. इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं, मुहब्‍बत से बड़ा कोई धर्म नहीं. अगर वो उससे प्‍यार करता ही था तो हम उसे कभी नहीं रोकते. जो हमारे बेटे को प्‍यारा है, हमें भी प्‍यारा है. हमारे घर में उसका स्‍वागत था. लेकिन लड़की के घरवाले ऐसा नहीं सोचते थे. उनके दिल में नफरत थी. नफरत ने मेरे बेटे की जान ले ली. अगर उनके भी दिल में प्‍यार होता तो आज मेरा बेटा मेरे पास होता.

    अंकित सक्‍सेना के पिता यशपाल सक्‍सेना
    अंकित सक्‍सेना के पिता यशपाल सक्‍सेना


    अंकित की रूह हमसे मिलने आती है
    कहने को हम जिंदा हैं, लेकिन अंदर से हम मर चुके हैं. हमारी आत्‍मा, हमारा ह्दय सब पत्‍थर हो गया है. कई-कई दिन गुजर जाते हैं, उसकी मां के मुंह से एक शब्‍द तक नहीं निकलता. चेहरे पर कोई भाव नहीं. न वो हंसती है, न बात करती है. बस आंखें हर वक्‍त टपकती रहती हैं. उसकी तबीयत दिन पर दिन खराब होती जा रही है. मैं तो मर्द हूं, फिर भी अपने मन को संभाल लेता हूं. उसकी मां का क्‍या करूं, जिसकी आंखें हर वक्‍त मुझसे ये सवाल पूछती हैं कि उसका बेटा क्‍यों चला गया. अंकित रात को अकसर देर से लौटता था. देर रात जब मैं बाथरूम जाने के लिए उठता तो कई बार अंकित नीचे अपनी बाइक खड़ी करके घर की सीढि़यां चढ़ रहा होता था. मैं इतना ही कहता, “आ गए बेटा.” वो मुस्‍कुराकर कहता, “हां पापा, आप सो जाइए.” कैसा संजोग था कि मेरी आंख उसी वक्‍त खुलती, जब उसकी बाइक की आवाज आती थी. आज भी जब मैं आधी रात बाथरूम जाने के लिए उठता हूं तो काफी देर तक वहीं सीढि़यों पर खड़ा रहता हूं. लगता है, अभी बाइक की आवाज सुनाई देगी और अंकित सीढि़यां चढ़ते हुए ऊपर आएगा. अभी दो दिन पहले की ही बात है. उस रात मुझे सचमुच लगा था कि वो आया था. उसकी एक झलक दिखी. उसके बाल खुले थे और वो मुस्‍कुरा रहा था. मैंने उसकी मां से कहा कि कल रात मैंने सीढि़यों पर अंकित को देखा था. वो मुझे बताती नहीं, लेकिन मैं जानता हूं कि वो भी उसे देखती है. उसकी रूह अपनी मां से मिलने आती है. लेकिन जब से वो गया है, एक भी बार हमारे सपने में नहीं आया. मैं चाहता हूं, वो सपने में आकर एक बार हमसे बात कर ले. बस एक बार बता दे कि वो ठीक है.

    इस जीवन का कोई क्‍या करे. मिला है तो जीना ही होगा. जब तक खत्‍म नहीं होती, तब तक चलाते रहना होगा. मेरे लिए अब जीने का कोई मकसद बचा नहीं है. लोगों ने तब बड़ा हिंदू-मुसलमान किया, मेरे बेटे की मौत पर सियासत करने की कोशिश की, मैंने हाथ पीछे खींच लिए. मेरे बच्‍चे की लाश पर राजनीति नहीं होगी. उसे मुसलमान ने नहीं मारा, उसे नफरत ने मारा. वो प्‍यार करता था, प्‍यार कोई अपराध नहीं है. अच्‍छे-बुरे लोग हर कौम में हैं. नफरत उधर भी है, नफरत इधर भी है, मुहब्‍बत उधर भी है, मुहब्‍बत इधर भी है. जो सब तरफ मुहब्‍बत हो तो इतना खून ही क्‍यों बहे. अपराधी को सजा दो, जिन्‍होंने मेरे फूल जैसे बच्‍चे के गले पर चाकू चलाया, उन्‍हें फांसी पर लटका दो, लेकिन हिंदू-मुसलमान का खेल मत करो.

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    Tags: Human story

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