Human Story: बाउंसर की बॉडी लड़ाई करने के लिए नहीं, लड़ाई रोकने के लिए है

नाइट क्‍लब से लेकर अस्‍पतालों तक में बाउंसर का काम कर चुके रिंकू की कहानी जो कहते हैं कि ये बॉडी, ये ताकत दूसरों पर इस्‍तेमाल करने के लिए नहीं है, अपना बचाव करने के लिए है

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: October 9, 2018, 12:10 PM IST
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: October 9, 2018, 12:10 PM IST
मैं बाउंसर हूं और मेरी बॉडी ही मेरा सारा सरमाया है. इसी को लेकर पैदा हुआ था, इसी को बनाया, इसी से काम मिला. इसी से घर चलता है. रोज जिम में दो घंटा बिताता हूं. मेहनत बहुत होती है, कितनी बार इतनी थकान कि मन नहीं करता जाने का. लेकिन अगर जिम जाना और बॉडी बनाना ही किसी की नौकरी हो तो मन है कि नहीं है, इस बात से क्‍या फर्क पड़ता है. काम तो करना ही होता है. जो दफ्तर में नौकरी करते हैं, वो भी तो कितनी बार मन के खिलाफ दफ्तर जाते होंगे. मैं भी जिम जाता हूं. कोई भी मौसम हो, कोई भी वक्‍त हो. बॉडी तो बनानी ही है.

मेरे पिता गरीब किसान थे, घर में ज्‍यादा जमीन नहीं थी. पढ़ाई मैं कर नहीं पाया तो क्‍या काम करता. हमारे गांव असोला फतेहपुरी बेरी से सालों पहले एक बाउंसर निकला था, फिर गांव के लड़कों को मानो एक रास्‍ता मिल गया. खेलने-कूदने, मेहनत करने में तो कम कभी पीछे नहीं थे. फिर जिम जाकर मेहनत करने लगे, बॉडी बनाई और बाउंसर बन गए. ये काम भी नहीं होता तो क्‍या होता. हमें कौन पूछता, कौन नौकरी देता. मैं अपने काम की बहुत इज्‍जत करता हूं. जिम जाना मेरे लिए फैशन नहीं, मेरी रोजी है. मैं उसकी बड़ी इज्‍जत करता हूं.

20 साल की उम्र में मुझे पहली नौकरी गुड़गांव के सहारा मॉल में मिली थी. मैं गांव का लड़का, मॉल, क्‍लब ये सब पहले कभी देखा नहीं था. इतनी रौशनी होती थी वहां. एक साथ इतने बल्‍ब जलते थे. हमारे गांव में तो वोल्‍टेज भी कम आता है. बिजली तो आ गई है, लेकिन इतनी तेज रौशनी कहां होती है. फिर उस मॉल की भीड़, उस क्‍लब में आने वाले लोग. कोई उन लोगों को, उस जगह को हमारी नजर से नहीं देखता. कभी नहीं पूछता कि हमें कैसा लगता है. हमें एक यूनीफॉर्म पहनाकर खड़ा कर दिया जाता है और हमारा काम होता है, लड़ाई-झगड़े को रोकना, ये देखना कि क्‍लब में शांति बनी रहे. हमें किसी से लड़ाई नहीं करनी होती, बाउंसर का काम लड़ाई को रोकना है. हम किसी पर हाथ नहीं उठा सकते, किसी को मार नहीं सकते.

क्‍लब में अकसर झगड़ा-फसाद हो जाता है. लोग गलत व्‍यवहार करते हैं. बहुत सारे बड़े अमीर घरों के होते हैं. पैसे का नशा होता है, फिर क्‍लब में आकर इतनी दारू पी लेते हैं कि उसका नशा पैसे के नशे के साथ मिलकर और सिर चढ़ जाता है. क्‍लब में होने वाले झगड़े इगो के ज्‍यादा होते हैं. लड़की अपने ब्‍वॉयफ्रेंड के साथ आई है, दारू पी है, फ्लोर पर डांस कर रही है. अगर डांस करते हुए किसी से टच भी हो गया तो इस पर वो भड़क जाती है. लड़की साइड हो जाती है और लड़के आपस में लड़ाई करने लगते हैं. ऐसे में हमें बीच-बचाव करना होता है, उन्‍हें रोकना होता है. कुछ लोग बड़े जिद्दी होते हैं, वो मानते नहीं तो हम उन्‍हें उठाकर बाहर कर देते हैं. कुछ लोग तो ऐसे होते हैं कि बाउंसर से भी बदतमीजी कर देते हैं. बाउंसर के ऊपर हाथ उठा देते हैं, लेकिन हमें सिखाया जाता है कि हमें तब भी शांत रहना है. कोई मुझे मारे तो मैं उसे पलटकर नहीं मार सकता. सच बताऊं तो गुस्‍सा तो बहुत आता है. कई बार दिल करता है वहीं पटककर धो दूं. लेकिन फिर नौकरी चली जाएगी. काम के कुछ उसूल होते हैं, उन पर चलना होता है.



लेकिन एक बार मेरे साथ ऐसा हुआ कि मैं आपा खो बैठा. ये सहारा मॉल की बात है. कुछ लोगों के साथ क्‍लब में विवाद हो गया था. उसने मेरे ऊपर हाथ उठाया, मैंने हाथ तो नहीं उठाया, लेकिन जबर्दस्‍ती उसे उठाकर क्‍लब से बाहर कर दिया. फिर जब रात में मॉल बंद हुआ और हम बाहर निकले तो चौराहे के पास 10 लड़के खड़े थे हमें मारने के लिए. वो 10 और हम सिर्फ 5. हमने फोन करके और लड़कों को बुलाया. काफी झगड़ा हुआ. उसके बाद क्‍लब कुछ दिनों के लिए बंद हो गया था और मेरी नौकरी भी चली गई.
उस घटना से मैंने जिंदगी का बड़ा सबक सीखा. चाहे कुछ भी हो जाए, अपना धैर्य नहीं खोना है. ये आसान नहीं है. जब कोई अपने पैसे और ताकत के नशे में आपको सिर्फ इसलिए अपमानित करे कि आप अपना काम कर रहे थे और आप पलटकर जवाब भी न दे पाएं. ये आसान नहीं है. लेकिन हमें करना पड़ता है.
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मैंने क्‍लब के अलावा एम्‍स ट्रॉमा सेंटर में भी बाउंसर का काम किया है. उसके बाद एक प्राइवेट अस्‍पताल में भी काम किया. नाइट क्‍लब की नौकरी तो रात की होती है, लेकिन अस्‍पताल में पूरे दिन की ड्यूटी होती है. अस्‍पताल में कई बार झगड़े-फसाद हो जाते हैं तो हमें बीच-बचाव करना होता है. बल्कि वहां तो क्‍लब से ज्‍यादा ये सब होता है. किसी की मौत हो जाए तो घरवाले अस्‍पताल में हंगामा कर देते हैं. अब इसमें डॉक्‍टर की क्‍या गलती. वो इलाज कर सकता है. जिंदगी और मौत उसके हाथ में थोड़े न है.

इंसानों में गुस्‍सा बहुत है. बात-बात पर तो लड़ाई पर उतर आते हैं. वो लड़ते हैं, इसलिए हमारी नौकरी चलती है. कोई झगड़ा न करता तो बाउंसर की जरूरत ही क्‍या थी. लेकिन बाउंसर होने का सबसे बड़ा सबक यही है कि ये बॉडी, ये ताकत दूसरों पर इस्‍तेमाल करने के लिए नहीं है, अपना बचाव करने के लिए है, अपनी सुरक्षा के लिए है. अगर कोई ताकत का इस्‍तेमाल दूसरों पर अधिकार जमाने, उनको दबाने के लिए करने लगे तो वो खतरनाक है.

ताकत का इस्‍तेमाल अपनी और दूसरों की रक्षा के लिए करना चाहिए. बाउंसर का भी यही काम है.

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