#HumanStory: अस्पताल में जोकर बनने के लिए इस औरत ने छोड़ी रुतबेदार नौकरी

औरत को जोकर देखकर पूरा माहौल फुसफुसाहटों से भर जाता है. बुरा तो लगता है लेकिन जैसे ही नाक चिपकाती हूं, बस जोकर रह जाती हूं.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: March 7, 2019, 12:55 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: March 7, 2019, 12:55 PM IST
(लाल चटकीली नाक लगाए और रंग-बिरंगे विग पहने हम धड़धड़ाते हुए घुसे. घुसते ही सांसें थम गईं. कमरे में दवाओं की तेज गंध पसरी हुई थी. सफेद बिस्तरों पर लेटे बच्चों के शरीर सुइयों और नलियों से गुदे थे. साइड टेबल पर अधखाए फल पड़े थे. कराहों और सुबकियों के बीच हमें 'परफॉर्म' करना था. सुनें शीतल अग्रवाल को, जो अस्पतालों में जोकर का काम करती हैं.)

कैंसर से लड़ रहे उस बच्चे से हम लगातार कई हफ्तों से मिल रहे थे. कीमोथैरेपी के बाद हमने उसके बालों को झड़ता देखा. हम देख रहे थे कि कैसे वो खुशमिजाज बच्चा एकदम से चिड़चिड़ा हो गया. इलाज के दौरान उसकी तबीयत बिगड़ने लगी. उस शनिवार भी हम हमेशा की तरह अस्पताल पहुंचे तो देखा कि बच्चा देख नहीं पा रहा था. वो हमारी आवाज सुन रहा था और हम उसका सुबकना. कुछ घंटों बाद अस्पताल से बाहर निकलते ही सबके-सब रो पड़े. ढाई सालों में ऐसे कई वाकये बीते.

कोई शायद ही अंदाजा लगा सके कि अस्पताल के ठंडे, उदास कमरे में एक बीमार बच्चे के सामने हंसना कितना मुश्किल है. लेकिन बॉल उठाने की कोशिश में बार-बार गिरते जोकर को देख वही बच्चा हंस दे तो जो सुकून मिलता है, वो हर मुश्किल भुला देता है.



औरत भला जोकर हो सकती है!
औरतें बहुत-कुछ हो सकती हैं लेकिन जोकर नहीं! खुद मैंने बचपन में सर्कस देखते हुए कभी किसी लड़की जोकर को नहीं देखा. लड़कियां हंसाने का काम नहीं कर सकतीं. उनपर चुटकुले तो बन सकते हैं लेकिन वे चुटकुले नहीं सुना सकतीं. मेरे लिए ये फैसला काफी बड़ा था. खासकर तब जब मैंने कभी जोकर बनने के बारे में नहीं सोचा था. सरकारी नौकरी में रिसर्चर की पोस्ट पर थी. पक्की नौकरी और बंधा-बंधाया रुटीन. पहली बार मेडिकल क्लाउनिंग के बारे में सुना तो सुनती ही रह गई. जोकर होना. अस्पताल जाकर बीमार बच्चों को गुदगुदाना!

नौकरी छोड़ दी तब सबको बताया. पहला रिएक्शन था- दिमाग तो नहीं खराब हो गया! मोटी कमाई वाली नौकरी छोड़ना और तिसपर जोकर का पेशा. वाकई! बहुतों ने टोका- अच्छी-खासी लड़की हो, क्या होगा जोकर बनकर. कोई नहीं मिलेगा. सब हंसेंगे. ये बात है साल 2016 की. एक पूरा साल मैंने सेविंग्स पर निकाला. बैंक अकाउंट ज़ीरो में जा रहा था और जोकर बनने का मेरा सपना ऊपर.
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मुश्किल है जोकर होना
सर्कस में कभी जोकर को देखा है! वो बार-बार कुछ करने की कोशिश करते हैं और बार-बार नाकामयाब होते हैं. कोई सामान उठाने जाते हैं तो धड़ाम से गिर जाते हैं. गिरे साथी को उठाने की कोशिश में खुद गिर जाते हैं. खाते हैं तो सेब मुंह की बजाए नाक में घुस जाता है. वो 'फेल' होते हैं और लोग हंसते हैं. वो लोगों को हंसाने के लिए फेल होते हैं. शुरुआत में ये काफी मुश्किल था. मैंने खूब प्रैक्टिस की. गिरने की. उठने की. चेहरे पर हरदम मुस्कान रखने की.

अस्पताल में जोकर क्यों!
शुरुआती दिनों की बात है, एक बार मैं अस्पताल के वॉशरूम में मेकअप धो रही थी. तभी एक औरत आई. थोड़ी देर देखते रहने के बाद बोल पड़ी- आपको अस्पताल वाले बुलाते होंगे क्योंकि आप सुंदर हैं. सुंदर लोग अच्छे लगते हैं जोकर बनके. मैं हंसने लगी. ये तो फिर भी भली-सी कमेंट थी. कई बार परेशान मां-बाप गालियां देने लगते. डॉक्टर गुस्से से देखते कि दवाएं अपना काम कर रही हैं, जोकर का अस्पताल में क्या काम? नर्सिंग स्टाफ चिड़चिड़ाए चेहरों से हमारा पुता चेहरा और रंगीन बाल देखता.



ऐसे हुई शुरुआत
साल 2016 में जब मेडिकल क्लाउनिंग यानी अस्पताल में जोकर का काम करने का इरादा किया, दिल्ली में किसी ने नाम नहीं सुना था. विदेशों में ये काफी लोकप्रिय है. मुझे सरकारी अप्रूवल चाहिए था. सबसे पहले हेल्थ मिनिस्ट्री को चिट्ठी लिखी. कुछ हफ्तों बाद मीटिंग के लिए बुलावा आया. सवाल ही सवाल थे और पूछनेवालों के चेहरों पर ठंडा-सा भाव मानो वे पहले ही नतीजा जानते हों. जैसे-जैसे मैंने जवाब देना शुरू किया, भाव बदलते चले गए. मैं पूरी तैयारी के साथ गई थी. रिसर्चर होना यहां काम आया. उनकी हां के बाद मुझे पहला सरकारी अस्पताल मिला- चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय. मुलाकात के बाद वहां प्रयोग की तरह इजाजत मिल गई लेकिन शर्त थी कि अकेले नहीं, जोकरों का पूरा जत्था होना चाहिए. मैंने फेसबुक पर लिखा. 33 लोगों ने हां कहा और आखिर में मुझे मिलाकर कुल 5 लोगों ने पहली परफॉर्मेंस दी.

उनकी हंसी से बड़ी खुशी नहीं
अस्पताल का स्टाफ घबराया हुआ था कि हम हल्ला-गुल्ला मचाएंगे, बच्चे तंग होंगे. कुछ नहीं होगा. बेकार. हमने मेकअप किया. चेहरे पर कई रंगों का फेस पेंट लगाया. गालों में गहरा लाल रंग गोल-गोल पोतकर उसपर स्माइली बनाई. अलग-अलग रंगों की नाक लगाई. कोई विग पहना तो किसी ने बालों की ढेर की ढेर चोटियां गूंथ लीं. जोकर के काम की प्रैक्टिस की. कठपुतलियां साथ रखीं और खूब सारे बॉल्स, गुब्बारे और दूसरे खिलौने. जुलाई का दूसरा शनिवार था. हम बच्चों के वॉर्ड में घुसे. घुसते ही कुछ पलों के लिए जैसे दिमाग ने काम करना बंद कर दिया. कमरे में मानो मौत का इंतजार हो रहा था और कहां से रंगीन पुतले आ टपके! सबके मुंह खुले हुए थे. हम बेआवाज नाच रहे थे. हंस रहे थे, रोने की एक्टिंग कर रहे थे.



आखिर-आखिर के वक्त तक बच्चों के चेहरे बदलने लगे. वे मुस्कुरा रहे थे. कुछ खिलखिलाने लगे. एक बच्चा हाथ मिलाने आया मैंने चट से हाथ हटा लिया, ये कहते हुए कि हाथ तो मिल ही नहीं पा रहा. बच्चा हाथ मिलाने के उछल-कूद मचाने लगा. बहुत दिनों बाद उस बच्चे के घरवालों ने उसे हंसता देखा था. पांच घंटे बीते- बच्चे हंस रहे थे और सारी मांओं की आंखें गीली थीं. यही करते हुए ढाई साल हो गए.

बनाए हैं कायदे
हॉस्पिटल में जाने के लिए हमने कई नियम बना रखे हैं. जैसे एक है नो-टच रूल. यानी हम बच्चों से हाथ मिलाने के अलावा उन्हें कहीं भी छू नहीं सकते. ये उन्हें इंफेक्शन से बचाने के लिए है. चाइल्ड सेक्शुअल एब्यूज भी बड़ी वजह है. कहीं ऐसा न हो कि अच्छा काम करने की कोशिश में हमसे कुछ बुरा हो जाए. दूसरा कायदा है वॉल्यूम कंट्रोल. हम बेआवाज गाते हैं. कोशिश रहती है कि सिर्फ बच्चों की हंसी गूंजे, शोर नहीं. ढेर सारी एक्टिविटीज करते हैं. जोकर फेल होकर भी कोशिश करते हैं. तो हम जो भी करें, उसे पूरा नहीं होने देते. कहीं न कहीं गड़बड़ होनी ही चाहिए. ये करना काफी मेहनत मांगता है.



जोकर हूं लेकिन सर्कस में नहीं
सर्कस में लोग हंसने के लिए आते हैं. अस्पताल का माहौल अलग रहता है. हमें देखकर कई बार लोग भड़क जाते हैं. ऐसे में हम चुपचाप चले जाते हैं. बच्चा बहुत दर्द में हो तो उसके आसपास भी नहीं रहते. एक बार मैंने एक बच्चे को अपने सामने दम तोड़ते देखा. बहुत बार बच्चों के ठीक होकर घर लौटने की हमने मिठाई भी खाई है. एक निजी अस्पताल में सिर्फ कैंसर के मरीज बच्चों के लिए जाती हूं. हर हफ्ते वो अनुभव अगले पूरे हफ्ते की मेरी हंसी सोख लेता है. इस सबके बावजूद मैं यही करना चाहती हूं.

कई बार अकेले परफॉर्म करना पड़ जाता है. औरत को जोकर देखकर पूरा आसपास फुसफुसाहटों से भर जाता है. झिझक होती है लेकिन जैसे ही नाक चिपकाती हूं, जोकर ही रह जाती हूं. जोकर के नाते मेरे पास छूट भी है, जैसे बुरा लगे तो जीभ चिढ़ाना. मैं यही करती हूं.

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