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मैं दिन के उजाले में ह्यूमन राइट्स लॉयर हूं और रात के अंधेरे में ड्रैग क्‍वीन

मैं दिन के उजाले में ह्यूमन राइट्स लॉयर हूं और रात के अंधेरे में ड्रैग क्‍वीन

ये कहानी है उस लड़के की, जो दिन के उजाले में ह्यूमन राइट्स लॉयर है और रात को ड्रैग. ड्रैग यानी ऐसा पुरुष, जो स्त्रियों के कपड़े पहनकर और मेकअप करके रात को स्त्री बन जाता है और स्त्रियों की तरह एक्‍ट करता है.

    ज्यादा पुरानी बात नहीं, जब मैं पहली बार लड़कियों के मेकअप का सामान खरीदने कॉस्मैटिक शॉप में गया. साथ में मेरा एक दोस्त भी था. पहले तो दुकान वाले ने सिर से पांव तक मुझे ऐसे घूरकर देखा, मानो चोरी करते पकड़ लिया हो. फिर देखकर अनदेखा करने की कोशिश की. मैं पहली बार औरतों के सामानों वाली किसी दुकान में गया था तो मैं भी कुछ कम घबराया हुआ नहीं था. लेकिन वहां पहुंचकर तो ऐसा लगा कि मैं क्रिमिनल हूं.

    उसने मेरी बात सुनने तक से इनकार कर दिया. उसके चेहरे पर साफ लिखा था- “तुमको नहीं बेचना सामान. तुम गंदे हो.”

    वो पहली और आखिरी ऐसी दुकान नहीं थी, जहां मुझे अपराधी जैसा महसूस हुआ. तकरीबन हर बार ये अनुभव इसी तरह दोहराया जाता रहा. हमने बहाने खोजे, थिएटर के लिए लेना है, गर्लफ्रेंड के लिए लेना है. मैंने इंटरनेट और यू-ट्यूब से मेकअप के बारे में काफी कुछ सीख लिया था. मुझे काजल, लिप्‍सटिक से लेकर मसकारा, आईलाइनर, ब्लश, आई शैडो सबके बारे में पता था, लेकिन ये जीवन में पहली बार था कि अपने किसी ज्ञान को लेकर मैं शर्मिंदा था. मैं दुकान वाले के सामने ऐसे दिखाता कि मानो मुझे कुछ पता नहीं. आप बताइए कि ये क्या होता है. लेकिन कुछ भी मेरे काम नहीं आया. शर्मिंदगी बढ़ती गई, डर गहरा होता गया. फिर हमने दुकानों में जाना छोड़ दिया और ऑनलाइन चीजें खरीदने लगे.

    घर, स्कूल और वो पढ़ाकू बच्चा
    मुझे बचपन में घर पर उतना ही प्यार-दुलार मिला, जितना इकलौते बच्चे को मिलता है. झारखंड के उस छोटे शहर में मेरे मां-पिता दोनों सरकारी नौकरी में थे. शहर में लोग उन्हें जानते थे. मुझे घर पर किसी ने कभी नहीं टोका कि ऐसे मत चलो, ऐसे मत बात करो, ये मत करो, वो मत करो. फिर भी बड़े होते हुए मुझे ये एहसास हो गया था कि मैं बाकी लड़कों से अलग हूं. उनकी तरह माचो नहीं. मुझे खेलकूद में कोई रुचि नहीं थी, मैं लड़कों की तरह मारपीट नहीं करता, बल्कि लड़कियों की तरह रोता था. सब मुझे चिढ़ाते भी. एक बार एक स्पोर्ट्स टीचर ने कहा, “स्टॉप एक्टिंग लाइक ए सिसि.” तब मुझे सिसि का मतलब नहीं पता था, लेकिन जाने क्यों ऐसा लगा कि ये कोई गंदी बात है. मैं खुद को और छिपाने लगा.
    इस पूरे दौरान जिस चीज ने मुझे बचाकर रखा, वो था मेरा पढ़ाई में अच्छा होना. मैं क्लास में, स्कूल में अव्वल था, इसलिए मेरा सिसि होना भी टीचर माफ कर देते थे.

    ड्रैग क्‍वीन आयुष्‍मान
    ड्रैग क्‍वीन आयुष्‍मान


    मां का मेकअप और मेरा ड्रैग
    मुझे याद है बचपन में जब भी मां सजती-संवरती थी तो मैं बहुत ध्यान से उन्हें देखा करता था. वहीं बगल में आईने के सामने खड़े होकर. मां की मदद भी करता था. छोटा बच्चा था तो उन्हें अच्छा भी लगता था. मां बहुत सुंदर लगती. मैं उस सुंदरता के प्रति एक अजीब सा आकर्षण महसूस करता. मां के हाथ नाजुक हैं, चेहरा कोमल है, हंसती है तो कितनी प्यारी लगती है. मर्दों के हाथ नाजुक नहीं होते और न ही उनमें कोमलता होती है. मुझे स्त्री होना आकर्षित करता.
    आज जब मैं खुद स्त्री की तरह तैयार होता हूं तो अपने ही प्रेम में पड़ जाता हूं. स्त्री होना कितनी सुंदर बात है. अब तो मुझे मेकअप के बारे में काफी समझ आ चुकी है. मैं एक्सपर्ट हो गया हूं. मेरा मन करता है, एक दिन मां का मेकअप करूं. उन्हें खूब सजाउं और ट्रांसफॉर्म कर दूं. लेकिन डर लगता है, उन्हें शक हो जाएगा कि इसे लड़कियों के मेकअप के बारे में इतना सब कैसे मालूम.

    क्या मैं एक स्त्री हूं
    मुझे कभी ये ठीक-ठीक पता नहीं था कि मैं क्या हूं. मां ने बेटा समझकर ही पाला, स्कूल में भी लड़का था, मोहल्ले और आसपास की दुनिया में भी सबको यही पता था कि मैं लड़का हूं. और मुझे सिर्फ इतना पता था कि मैं जो भी हूं, इस दुनिया का नहीं हूं. मैं हर जगह मिसफिट हूं. स्कूल में, कॉलोनी में, घर में, दोस्तों और रिश्तेदारों के बीच. जब आपको ये पता चल जाए कि जिस दुनिया में आप हैं, वो आपकी दुनिया नहीं है, लेकिन ये न पता हो कि फिर आपकी दुनिया है कौन सी तो किस तरह का निर्वासन महसूस होता है. भीड़ से घिरे हुए भी आप भीतर से कितने अकेले होते हैं. मेरा यही हाल था.
    एकांत में मेरी अपनी एक दुनिया थी. कल्पना में मेरा एक अलग संसार था, जिसमें ऐसे लोग थे, जिनके साथ मैं “मैं” हो सकता था, जहां मुझे किसी आवरण की जरूरत नहीं थी, जहां अभिनय नहीं करना पड़ता, जहां मेरे दो चेहरे, दो शरीर, दो जिंदगी नहीं थी.

    ह्यूमन राइट्स लॉयर आयुष्‍मान
    ह्यूमन राइट्स लॉयर आयुष्‍मान


    कानून और इंसानी अधिकार
    मैंने नेशनल लॉ स्कूल, कोलकाता से पांच साल कानून की पढ़ाई की. कानून की पढ़ाई ने भी मुझे मेरे मानवीय और नागरिक अधिकारों की समझ दी. बाहर की दुनिया में गया तो लगा कि सिर्फ मैं ही आउटकास्ट नहीं हूं. कोई अपनी जाति, कोई अपने धर्म, कोई अपने जेंडर, कोई अपनी चमड़ी के रंग तो कोई अपने विचारों के कारण भी समाज से आउटकास्ट है. मैं समाज में बड़े पैमाने पर फैले अलगाव और भेदभाव का बस एक छोटा सा हिस्‍सा था.
    लॉ की पढ़ाई करके दिल्ली आ गया. कॉरपोरेट लॉ में मेरी रुचि नहीं थी, मुझे लगा कि कुछ ऐसा करूं कि जिससे समाज को बदलने में मेरी छोटी सी हिस्सेदारी हो सके. मैंने ह्यूमन राइट्स लॉयर बनना तय किया. जब आपके इंसानी अधिकारों की इज्जत नहीं होती तो आपको दूसरों के छिने हुए अधिकार ज्यादा साफ दिखाई देते हैं. अपना दुख वृहत्तर दुख के साथ जोड़ता है.

    शरीर पुरुष का और मन स्त्री का
    दिन में मैं कभी पैंट-शर्ट तो कभी जींस-टी शर्ट में कानून की किताबों में सिर खपा रहा होता हूं, बस मेट्रो, ऑटो में घूम रहा होता हूं, दिन भर के जिंदगी के कामों में मसरूफ होता हूं. जैसे-जैसे रात घिरती है तो मेरे भीतर से एक स्‍त्री जन्‍म लेती है. मैं स्त्रियों के कपड़े पहनता हूं. मेरी छातियां और नितंब मर्दों जैसे हैं, जिन्‍हें मैं प्रोस्‍थेटिक की मदद से स्‍त्री का आकार देता हूं- पैडेड ब्रा और पैंटी. मैं अपनी आंखों में काजल लगाता हूं, होंठों को रंगता हूं. ऊंची एड़ियों वाली सैंडल में मेरी चाल में एक अदा होती है. अपनी देह पर हाथ फिराते मैं खुद उस कमनीयता को महसूस करता हूं, स्‍त्री होने के एहसास को. मेकअप एक लंबी प्रक्रिया है. जैसे-जैसे पूरी होने के कगार पर आती है, मैं ट्रांसफॉर्म हो चुका होता हूं. आयुष्‍मान के भीतर एक स्‍त्री जन्‍म ले चुकी होती है.



    प्रेम, सेक्स और सेक्सुएलिटी
    कई बार ऐसा होता है कि जब मैं स्‍त्री का रूप धारण कर लेता हूं तो आसपास के पुरुष मेरे प्रति वैसे ही आकर्षित होते हैं, जैसे किसी स्‍त्री के प्रति होते होंगे. लेकिन जरूरी नहीं कि इस आकर्षण में स्‍त्रीत्‍व का आदर भी हो. मुझसे कई बार लोगों ने पूछा तो क्‍या स्‍त्री बनकर मैं भी पुरुष के प्रति स्‍त्री की तरह आकर्षित महसूस करता हूं. शायद नहीं. मेरी सेक्‍सुएलिटी क्‍या है, मैं स्त्रियों के प्रति आकर्षित हूं या पुरुषों के प्रति. मुझे इस सवाल का अभी भी ठीक जवाब नहीं पता. मेरी उम्र 25 साल है, लेकिन मैं वर्जिन हूं. किसी मनुष्‍य देह से अंतरंग होने का कभी संयोग नहीं हुआ. मेरे भीतर प्रेम बहुत रूपों में उभरता है. मैं बहुतों के प्रति कभी आकर्षण, कभी प्रेम, कभी दुलार, कभी लगाव महसूस करता हूं, लेकिन यौनिकता का सवाल अब तक अनुत्‍तरित ही है. घरवाले शादी का दबाव बनाते हैं. मुझे पता नहीं कि मैं शादी करना चाहता हूं या नहीं. मेरे लिए प्रेम बड़ा है. शादी से ज्‍यादा बड़ी है कंपैनियनशिप. बिना किसी अपेक्षा, बिना किसी दबाव के किसी को सिर्फ प्रेम करना.

    स्‍त्री होना ही शर्मिंदगी का सबब है
    क्‍या सिर्फ मेरे भीतर की स्‍त्री ही शर्मिंदगी की सबब है? क्‍या स्‍त्री होना ही अपने आप में शर्मिंदगी नहीं? ये समाज सिर्फ मुझे ही इसलिए अपमानित नहीं करता क्‍योंकि मैं स्त्रियों की तरह सजता और महसूस करता हूं. जो पूरी तरह स्त्रियां हैं, ये समाज उन्‍हें भी अपमानित करता है, उनके साथ हिंसक और क्रूर होता है. औरतों के साथ हिंसा का लंबा इतिहास है, जिस स्‍त्री देह के प्रति पुरुष आकर्षित है, जिसकी कामना करता है, उसके साथ कितने अमानवीय, कितने बर्बर तरीके से पेश आता है. आए दिन रेप की खबरों से अखबार भरे रहते हैं. भरी सड़क पर हर वक्‍त पुरुष स्त्रियों को अपमानित कर रहे हैं. मेरे भीतर की स्‍त्री का निरादर उसी व्‍यापक अपमान और निरादर का एक हिस्‍सा भर है.



    घरवाले नहीं जानते मेरा सच
    मेरे माता-पिता को मेरे ड्रैग क्‍वीन वाले काम के बारे में कुछ नहीं पता. इसलिए मैं लोगों से बात करते या इंटरव्‍यू देते हुए उनकी पहचान भी छिपाकर रखता हूं. हालांकि हमने इस बारे में कभी खुलकर बात नहीं की, लेकिन जाने क्‍यों मुझे लगता है कि शायद उन्‍हें थोड़ा अंदाजा है. मैं उन्‍हें इसलिए नहीं बताना चाहता क्‍योंकि मुझे डर है कि इससे उन्‍हें दुख पहुंचेगा. एक डर और भी है. अपने जिस काम, जिस रूप का मैं इतना आदर करता हूं, जिससे मुझे इतना प्रेम है, कहीं वो उनके लिए शर्मिंदगी न बन जाए. बहुत वक्‍त लगा मुझे अपने भीतर की स्‍त्री को प्‍यार करने, उसका सम्‍मान करने में. अब मैं उसका किसी भी रूप में तिरस्‍कार नहीं देख सकता.

    मुझे प्‍यार करना मेरी जिम्‍मेदारी
    ये सब अब बोलने में कितना आसान लगता है. हां, मैं पुरुष के शरीर में हूं, लेकिन पूरी तरह पुरुष भी नहीं. मेरे भीतर एक स्त्री है, जिसे मैं दिन के उजाले में छिपाकर रखता हूं. दुनिया से और खुद से भी. उसके बिना मैं अधूरा हूं. ज्यादातर वक्त ऐसा ही होता है कि मैं अधूरी जिंदगी जी रहा होता हूं. लेकिन जब मैं अकेला होता हूं और उस स्त्री से मिलता हूं तो लगता है कि पूरा हो गया. जब मैं पहली बार दिल्‍ली में अपने जैसे लोगों से मिला, उनके सामने खुलकर खुद को स्वीकार कर पाया तो उस दिन लगा कि मैंने ठीक से सांस ली है. डरकर जीने से बड़ा दुर्भाग्य कोई और नहीं, खुद से झूठ बोलने, खुद को स्वीकार न करने, खुद अपना ही हाथ पकड़ने से इनकार कर देने से बड़ा धोखा और क्या होगा.



    मैं अब तक खुद को धोखा देता रहा ताकि अपने आसपास की दुनिया में फिट हो सकूं. फिर एक दिन ऐसा हुआ कि मुझे अपने जैसे लोग मिले. वो भी खुद को धोखा दे रहे थे ताकि दूसरों का प्यार, उनकी स्वीकृति पा सकें. हम मिले तो हमें एक दूसरे के चेहरे में अपना अक्स दिखाई दिया. एक दूसरे के झूठ में अपना झूठ, उनके धोखे में अपना धोखा.

    दुनियादारी का पर्दा इतना मोटा था कि अब तक तो अपना झूठ दिखाई भी नहीं देता था. लेकिन अब दिख रहा था. झूठ भी दिख रहा था और ये भी कि ये झूठ हमें भीतर से खाए जा रहा था. हमें पहली बार लगा कि कोई तो जगह है, जहां हम अपने साथ, दूसरे के साथ सच्चे हो सकते हैं. हम हम हो सकते हैं.
    अब मुझे किसी को खुश करने की परवाह नहीं है. मैं सिर्फ एक ही व्यक्ति की खुशी के लिए जिम्मेदार हूं और उस जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी से निभाना चाहता हूं और वो हूं मैं.

    Tags: Human story

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