#HumanStory: कहानी- कश्मीर की पहली महिला फुटबॉलर की, जो पत्थरबाज़ी की वजह से सुर्खियों में आई

मैं फुटबॉल ही खेलती थी, बस उस एक रोज मैंने पत्थर उठा लिया था. वो गुस्सा उसी लम्हेभर का था. मैं नहीं चाहती कि उसकी वजह से मुझे पहचाना जाए, लोग मुझे पहचानें तो मेरे खेल की वजह से.

News18Hindi
Updated: March 15, 2019, 10:57 AM IST
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Updated: March 15, 2019, 10:57 AM IST
(फुटबॉल लेकर मैदान में पहुंचती तो सारी आंखें मुझपर गड़ी होतीं. इतने सारे लड़कों के बीच अकेली लड़की क्यों है! लड़की के हाथ में फुटबॉल क्यों है! तब कश्मीर में लड़की का फुटबॉल खेलना अजूबा ही था. घर से चोरी-छिपे निकलती. डैड ने रोका, मारा-पीटा. आज मैं इंडिया की जर्सी पहनकर फुटबॉल खेल रही हूं. पढ़ें, 23 साल की अफ्शां आशिक को, जो कश्मीर की पहली महिला फुटबॉलर मानी जाती हैं.) कश्मीर में लड़कियों को खेल के नाम पर थोड़ी-बहुत जो छूट थी, वो थी क्रिकेट खेलने की. मैं भी क्रिकेट खेलती लेकिन सारा ध्यान दूसरी तरफ फुटबॉल खेल रहे लड़कों पर होता. मैं फुटबॉल में हाथ आजमाना चाहती थी. घर पर बात की तो तपाक से मना हो गया. फुटबॉल लड़कियों का खेल नहीं! मैं वापस क्रिकेट खेलने तो लगी लेकिन फुटबॉल खेलने की चाह बढ़ती गई. मैंने तय किया कि एकबार आजमाकर तो देखूंगी, फिर चाहे जो हो.

मैंने ऐसी जिद ठानी थी, जिसमें कश्मीरी लड़कियों के लिए तो कोई स्कोप नहीं था. मुझे सिखाता कौन. पहले-पहले साथ पढ़ने वाली लड़कियों को मनाना शुरू किया कि वो साथ प्रैक्टिस करें. कोई तैयार नहीं हुआ. फिर मैंने अकेले ही स्टार्ट किया. फुटबॉल कोच के पास गई. शुरुआती वक्त कड़ी आजमाइश से भरा हुआ था. घर पर फुटबॉल खेलने की सख्त मनाही थी. मैं एकदम सुबह-सुबह अंधेरे में बाहर निकलती और डैड के जागने से पहले लौट आती.

मुझे दो-दो जगहों पर खुद को साबित करना था. घर पहला फ्रंट था. पता चलने पर रोज टोकने लगे. ये खेल अभी बंद कर दो. घर से बाहर मत निकलना. यहां नहीं जा सकती. वहां नहीं खेल सकती. मैं सुनती और सुनकर रोज सुबह दोबारा निकल जाती. लौटती तो फिर वही बातें मेरा इंतजार करती होतीं. डैड ने बहुत मना किया. मारा-पीटा. मैं तब भी खेलती रही. दरअसल फुटबॉल कॉन्टैक्ट गेम है. इसमें जख्मी होने का डर किसी भी दूसरे खेल से ज्यादा होता है. डैड को डर था कि कहीं ज्यादा चोट लग गई तो मुझसे शादी कौन करेगा. मेरी असल जिंदगी का क्या होगा! यही वजह थी कि कश्मीर में लड़कियां फुटबॉल नहीं खेलती थीं. दूसरी जगह थी खेल का मैदान, जहां मुझे खुद को साबित करना था. लड़कियां तो थी नहीं, तो कोच ने मुझे लड़कों के साथ ट्रेनिंग देना शुरू किया. लड़के पहले कतराते. धीरे से बॉल फेंकते कि लड़की को चोट न लगे. एक दिन कोच ने मुझे गोलपोस्ट में भेजा और लड़कों को गोल करने को कहा. वो 6 लड़के थे. कोई भी ठीक से गोल नहीं कर रहा था, जबकि रोज वे बहुत अच्छा खेलते थे. कोच ने बुलाकर डांटा कि कोई भी आज ठीक से क्यों नहीं खेल रहा तो एक लड़के ने झिझकते हुए कहा क्योंकि गोलकीपर लड़की है. धीरे-धीरे उनका डर और मेरी झिझक दोनों चले गए. मैं लड़कों के मैच में कीपिंग करने लगी.
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खेल के पैशन के बीच मैं पहली बार सुर्खियों में आई लेकिन वो खेल की वजह से नहीं, बल्कि पत्थरबाज़ी में शामिल होने की वजह से. कॉलेज के अपने दोस्तों के साथ मैं कश्मीर पुलिस पर पत्थर उछाल रही थी. मैं एकाएक पोस्टर गर्ल बन गई. मुझे लोग पत्थर फेंकने वाली फुटबॉलर की तरह पहचानने लगे. हालांकि वो चैप्टर बीत चुका है. मैं फुटबॉल ही खेलती थी, बस उस एक रोज मैंने पत्थर उठा लिया था. वो गुस्सा उसी लम्हेभर का था. मैं नहीं चाहती कि उसकी वजह से मुझे पहचाना जाए, लोग मुझे पहचानें तो मेरे खेल की वजह से. खेल के दौरान कई उतार-चढ़ाव आए. एक बार मेरे एक कोच ने कहा था कि मैं कभी फुटबॉलर नहीं बन सकूंगी, मैंने खेल शुरू करने में बहुत देर कर दी. मैं आज इंडियन वीमन्स लीग में हिस्सा ले रही हूं. कश्मीरी लड़कियों को ट्रेनिंग देती हूं. मुंबई के एक क्लब की तरफ से खेलती हूं. लेकिन मेरे लिए सबसे गर्व की बात होती है इंडियन जर्सी पहनकर मैदान में उतरना. सच कहूं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं. उस नाम की जर्सी पहनने के बाद लगता है, यही अकेली सच्ची चीज है, बाकी कुछ भी नहीं.
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