#HumanStory: इस मुसलमान के भीतर धड़क रहा है हिंदू दिल, मां से कहा- 'मेरे घर पूजा-पाठ करो'

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: July 1, 2019, 5:15 PM IST

दो हफ्ते बाद अस्पताल से लौटा. सीने में नया दिल लिए. तभी जाना कि मेरे भीतर एक 'हिंदू दिल' धड़क रहा है. डॉक्टर की रजामंदी के बाद सबसे पहले उसके गांव गया. जैसे-जैसे घर के करीब जा रहा था, मेरा नया-नवेला दिल अचानक जोरों से धड़कने लगा था. घर के सामने ही खिचड़ी बालों वाली एक औरत इंतजार कर रही थी. ये मेरी नई मां थी. सोहेल अब्दुल रहीम वोहरा वो शख्स हैं, जिनके भीतर एक हिंदू युवक का दिल लगा है.

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(गुजरात के आणंद में रहने वाले सोहेल का साल 2017 में हार्ट ट्रांसप्लांट हुआ. ये हार्ट नवसारी के अमित का था, जो एक हादसे में ब्रेन डेड हो चुका था. अस्पताल की कहानी यहां खत्म होती है और यहीं से शुरू होती है मजहब से ऊपर मुहब्बत की कहानी. इसमें अमित की मां सोहेल को अपना बेटा मान लेती है और सोहेल इसरार करता है कि वो उसके पास रहने आ जाएं. घर में खाना भी उनके तरीके का बनेगा और इबादत के साथ-साथ पूरे रीति-रिवाज से पूजा भी होगी.)

साल 2001 की बात है. मजहबी काम से अजमेर में था. एक रोज सीने में तेज दर्द उठा. लगा कि बाहर का खाने-पीने से बदहजमी हो गई होगी. मैं काम में लग गया, लेकिन एक-एक मिनट भारी पड़ रहा था. पसीने में नहाया हुआ जैसे-तैसे एक साथी के पास पहुंचा. फिर अस्पताल. वहां एक ऐसी खबर मेरा इंतजार कर रही थी, जो मेरी जिंदगी बदलने वाली थी.

डॉक्टर ने बताया- तुम्हारे दिल में खराबी है. तब समझ आया कि ये खाने की बदपरहेजी से कुछ ज्यादा है. मैं सामान समेटकर लौट आया.

दोबारा चेकअप हुआ और डॉक्टरों ने वही बात दोहराई. मैं बीमार था. चलता तो सांस फूलती. कुछ भी करता तो दम उखड़ने लगता. पक्का कारोबारी हूं, लेकिन जल्द ही मुझे अपनी एक शॉप बेचनी पड़ी. दूसरी शॉप में काम के लिए स्टाफ रखना पड़ा. मैं अपने ही घर में नजरबंद रहने लगा. दवाएं खाता और बीते वक्त के बारे में सोचा करता था. जब मैं ठीक लगता और जिंदगी को लेकर काफी सारी उम्मीदें थीं.

साल 2005 से 2017 तक मैं आणंद से बाहर नहीं गया. जा ही नहीं सकता था. लगता था कि निकला तो लौट नहीं सकूंगा.



कुछ महीनों पहले शादी हुई थी. नवेली पत्नी के ढेरों ख्वाब थे. मैं सामने पड़ने से कतराता. जैसे मैंने कोई जुर्म किया हो.
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फिर मैंने उसे अपनी बीमारी के बारे में बता दिया. मानकर चल रहा था कि वो रो पड़ेगी. लानतें देगी और शायद छोड़कर भी चली जाए. कमजोर दिल था लेकिन हर बात के लिए तैयार होकर सामने था. बताते हुए उसके चेहरे के बदलते रंग देख रहा था. अजमेर से अब तक का किस्सा ज्यों ही खत्म हुआ, उसके मेरी हथेली को अपनी हाथों में सहेज लिया. फिर वो रोई तो लेकिन न लानतें भेजीं और न छोड़कर गई. उसी की हिम्मत है जो मैं आज जिंदा हूं.

दिल की बीमारी सर्दी-बुखार से अलग है. सबसे बड़ी मुश्किल ये है कि इसमें सांस लेने के लिए कोशिश करनी होती है. मैं लगातार दवाओं पर था लेकिन अब ये भी बेअसर रहने लगी थीं. 32 साल की उम्र में मुझे पेसमेकर लगा. मैं वक्त से पहले बूढ़ों की जमात में आ चुका था लेकिन तब भी जिंदगी ट्रैक पर लौटने लगी थी. मैं कभी-कभार दुकान पर जाता. शहर घूमता. बाहर खाना भी खा पाता था. फिर एक रोज मेरी बीवी और मैंने सलाह करके एक बच्ची गोद ले ली. 6 महीने की बच्ची. हम प्यार से उसे हुमा बुलाते.

वो हमारी जिंदगी का सबसे खुशनुमा फैसला रहा. हर बात पर सांस फूलने की शिकायत करने वाला उसका ये अब्बा अब उसकी हर खिलखिलाहट पर हंस पड़ता. औलाद का हमारा सपना पूरा हो चुका था.



जल्द ही हालांकि मैं ज्यादा बीमार रहने लगा. अहमदाबाद पहुंचे. वहां डॉक्टरों ने बताया कि हार्ट ट्रांसप्लांट ही जान बचा सकता है. हम बिना जवाब दिए लौट आए. मेरा वजन लगातार गिर रहा था. कुछ कदम भी बिना सहारे के, या बगैर गिरे चल नहीं पाता था. हर महीने कई-कई दिनों के लिए एडमिट होना पड़ता था. आखिरकार हम दोबारा अस्पताल पहुंचे. और फिर जुलाई 2017 में मेरे बीमार दिल को हटाकर एक नया, जवान दिल लगा दिया गया.

घर लौटने के बाद की बात है. एक रोज मुझे चाचू ने बताया कि मेरे भीतर 'किसी' अमित का दिल है. कौन अमित? उसके साथ क्या हुआ था? क्या उसके घरवाले मुझे जानते हैं?

उसके बाद से मैं अमित के बारे में सोचने लगा. वो लड़का जिसका दिल मेरे भीतर टिकटिक कर रहा है. धीरे-धीरे अमित की जगह उसकी मां ने ले ली. मैं लेटे-लेटे सोचा करता, उस मां के बारे में जिसने अपनी जवान औलाद खोई थी. सोता तो अजीबोगरीब सपने आते. कि मैं अमित के घर हूं. उसकी मां मेरे घर हैं. बिना हांफे सारे काम निबटाता तो भी उन्हीं का तसव्वुर रहता. मैंने जिद पकड़ ली. डॉक्टर की हां के बाद घर से निकला तो लंबी ड्राइव के बाद हम सीधे उसके गांव पहुंचे.

मैं उसकी मां को तसल्ली देना चाहता था. बताना चाहता था कि उसका अमित किसी दूसरी शक्ल और नाम के साथ जिंदा है.

फिल्मों में देखा है कि कहीं जाकर आपको लगे, आप पहले भी वहां आए हुए हैं. कोई चेहरा आपको एकदम जाना-पहचाना लगे. मेरे भीतर वही Déjà vu चल रहा था. गांव में घुसते ही हमारी कार को लोगों ने घेर लिया. लोग मुझे अमित बुला रहे थे. झुरझुरी-सी छूट गई. हाथ-पैर ठंडे पड़ने लगे थे. एकाध बार मोबाइल पर चुपके से अपना चेहरा देखा.



लग ही नहीं रहा था कि पहली बार वहां आया हूं. हम पैदल ही अमित के घर की तरफ बढ़े. पूरा गांव हमारे साथ अमित के घर तक आया.

दो कमरों के छोटे-से उस घर की छत मेरे सिर को छू रही थी. फिर मां आई, जिससे मिलने के लिए मैं यहां तक आया था. खिचड़ी बाल. जवान बेटे की मौत ने वक्त से पहले कमर झुका दी थी. डगर-मगर करती वो मुझ तक पहुंची. मैं देखे ही जा रहा था और उसने तपाक से मुझे सीने से लगा लिया. जैसे खोया हुआ छोटा बच्चा मिल जाए, वो रोए जा रही थी. उसे थामे हुए मैं भी रो रहा था.

संभलने के बाद जितनी देर बातें हुईं, उसने मुझे अमित ही पुकारा. उस घर में जितनी देर रहा, मैं खुद सोहेल नाम भूला रहा.

अब तक कईयों बार अमित के गांव जा चुका हूं. अम्मी को हर हफ्ते फोन करता हूं. किसी हफ्ते काम में भूला रहूं तो बीवी याद दिला देती है. हुमा उन्हें दादी बुलाती है. बीते दिनों उनके घर पर एक और हादसा हो गया. अब वो एकदम अकेली है. चाहता हूं कि अब वो हमारे पास रहें. जब भी आएं, वो किसी मुसलमान के नहीं, अपने बेटे के घर आएंगी.

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First published: July 1, 2019, 10:52 AM IST
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