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Human Story: जिस उम्र में लड़कियों के मन में प्रेम के अंकुर फूटते हैं, मुझे शिव से प्रेम हो गया

Human Story: जिस उम्र में लड़कियों के मन में प्रेम के अंकुर फूटते हैं, मुझे शिव से प्रेम हो गया

लखनऊ के मनकामेश्‍वर मंदिर की पहली महिला महंत देव्‍या गिरी की कहानी किसी रूमानी प्रेमकथा की तरह है. पैथॉलॉजिस्‍ट अरुणिमा सिंह कैसे एक दिन अचानक शिव का स्‍पर्श और संग पाकर संसार छोड़ साध्‍वी हो गईं

    उस नादान उम्र में जब लड़कियों के मन में प्रेम के पहले अंकुर फूटते हैं, मुझे शिव से प्रेम हो गया था. मैं प्रेम के लिए समूचा जीवन कुर्बान कर दिया.

    मुझे आज भी याद है वो दिन. मेरी पैथोलॉजी की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी. अगले हफ्ते हम मुंबई जाने वाले थे. वहां अपना पैथ लैब शुरू करने की योजना थी. मैं ननिहाल में ही पली-बढ़ी थी. नानी के कहा कि मुंबई जाने से पहले एक बार मनकामेश्‍वर मंदिर के दर्शन कर लिए जाएं. पूरा परिवार लखनऊ आया और हम मनकामेश्‍वर मंदिर में शिवजी के दर्शन करने गए. वह क्षण बयान के परे है. वहां मैंने पहली बार गर्भगृह में प्रवेश किया. जब शिवलिंग को अपने दोनों हाथों से छुआ तो ऐसा लगा मानो पृथ्‍वी चलते-चलते अचानक रुक गई हो. पूरा संसार स्थिर हो गया हो, चारों ओर शून्‍य. लगा कि वह शिवलिंग भी वहां नहीं है. अचानक अपनी देह का, अपने होने का एहसास भी खत्‍म हो गया. शरीर इतना हल्‍का मानो रूई. कोई वजन ही नहीं. उस दिन मुझे एक दिव्‍य शक्ति के दर्शन हुए थे.

    मेरा जीवन वहां उस एक क्षण में रुक गया. मुझे पता था कि अब यही मेरा घर है, यही मेरी यात्रा का अंतिम पड़ाव.

    जब मैं घर से भाग गई
    मेरे मन में क्‍या चल रहा है, ये किसी और को तो पता नहीं था. मुंबई जैसे शहर में पैथ लैब शुरू करने की बात कोई मामूली बात नहीं थी. इसमें पैसा लग रहा था, मेहनत लग रही थी, घरवालों के सपने और महत्‍वाकांक्षाएं इसके साथ जुड़ी थीं और ये सब पूरा करने का दारोमदार मेरे कंधों पर था. लेकिन मेरी तो राह ही बीच राह मुड़ गई. अब वापस लौटने की कोई जगह नहीं थी.

    उस दिन मंदिर से जब मैं घर लौटकर गई तो मेरा किसी काम में मन न लगे. मैं बार-बार बहाने ढूंढ रही थी कि कैसे फिर से उस मंदिर में जा सकूं. मैंने नानी से कहा, उन्‍होंने मुझे डांटकर चुप बिठा दिया. उसके बाद मेरे व्‍यवहार में आए बदलाव से भी घरवालों को कुछ अंदेशा तो हो गया था कि सबकुछ ठीक नहीं है. वो मुझ पर और नजर रखने लगे. लेकिन एक दिन मैं मौका देखकर घर से भाग गई. मनकामेश्‍वर मंदिर पहुंची. वहां जो पुजारी थे महंत केशव गिरी, उन्‍होंने भी मुझे डांटकर भगा दिया. मैंने उनसे विनती की कि मुझे मंदिर में शरण दे दें. लेकिन वो नहीं माने. मैं घर वापस नहीं जा सकती थी. तो वहां से वैष्‍णो देवी चली गई. वही एक जगह ऐसी थी, जहां मैं पहले भी एक बार जा चुकी थी. वो मेरी पहचानी हुई जगह, पहचाना हुआ रास्‍ता था.

    अब तक तो घर पर काफी बवाल हो चुका था. मेरे घरवालों ने भी लखनऊ के उस मंदिर में जाकर काफी तमाशा किया. लेकिन मैं तय कर चुकी थी. अब मुझे लौटना नहीं था. वापस आकर भी मैं वहीं मंदिर में डेरा डाल दिया.

    आखिरकार महंत केशव गिरी का दिल पिघल गया. उन्‍हें लगा कि जो लड़की इतने डराने-धमकाने और घरवालों के इतने विरोध के बावजूद अपने फैसले से डिगने को तैयार नहीं है, शायद वही शिव की साधना का सुपात्र है.

    उन्‍होंने मुझे दीक्षा देना स्‍वीकार किया और उस दिन से मैं अपने भोले की साधक हो गई.



    घर, बचपन और सपना
    बाराबंकी के एक समृद्ध परिवार में मेरा जन्‍म हुआ था. ज्‍यादातर समय ननिहाल में ही गुजरा. मैं पढ़ने में अच्‍छी थी. घरवालों को मेरी पढ़ाई और कॅरियर से काफी उम्‍मीदें थीं. स्‍कूल और कॉलेज का पूरा समय मैं एक सीधी, पढ़ाकू टाइप की लड़की थी, जो सिर झुकाकर कॉलेज जाती और सिर झुकाकर वापस आती थी. बाकी समय किताबों में सिर गाड़कर पढ़ती रहती थी. अवध विश्वविद्यालय के जवाहरलाल नेहरू कॉलेज से मैंने बीएसी किया. फिर पैथोलॉजी पढ़ने के लिए दिल्ली चली गई. वहां आईपीएस इंस्टीट्यूट से पैथालॉजी में टॉप किया. घरवाले मुंबई में पैथ लैब खुलवाने वाले थे, लेकिन मैंने उनके सारे सपनों पर पानी फेर दिया क्‍योंकि मेरे सपने में तो भगवान शिव आने लगे थे.

    शिव के घर में शरण मिली तो मानो जिंदगी को ठिकाना मिल गया हो. लेकिन असली चुनौतियां तो उसके बाद खड़ी हुईं. यह एक पुरुष प्रधान पीठ थी, चारों ओर मर्दों का ही बोलबाला था. ऐसे में मंदिर परिसर में एक औरत की मौजूदगी न मंदिर को बर्दाश्‍त थी, न समाज को और न ही श्रद्धालुओं को. सबने तरह-तरह की बातें बनाईं. मेरे चरित्र पर लांछन लगाए. शिव की निकट रहने का मेरे लिए जो आत्मिक मूल्‍य था, वो कोई नहीं समझता था. लोग कहते कि कोई ऐसे थोड़े न मंदिर में आता है. इसके पति ने छोड़ दिया होगा या इसकी शादी नहीं हो रही होगी या बच्‍चे नहीं हो रहे होंगे. तभी ये गृहस्‍थ जीवन का सुख छोड़कर यहां मंदिर में पड़ी हुई है.



    एक बार ऐसा हुआ कि मंदिर के बाहर कोई एक नवजात शिशु को छोड़ गया. हमने पता लगाने की कोशिश की कि ये बच्‍चा किसका है, कुछ पता नहीं चला. महंत केशव गिरी जी ने कहा कि इस बच्‍चे का पालन-पोषण अब यहां मंदिर में ही होगा. लखनऊ के कुछ मानवाधिकार वालों ने कोर्ट में केस कर दिया. केशव गिरी बच्‍चे को कानूनी तौर पर गोद लेना चाहते थे, लेकिन उनकी बड़ी उम्र को देखते हुए कोर्ट ने इसकी इजाजत नहीं दी. फिर मैंने उस बच्‍चे को गोद लेने का फैसला किया. न्‍यायलय की अनुमति मिल गई. सब जानते थे कि हकीकत क्‍या है. एक अनाथ बच्‍चे को अपने हृदय से लगाकर मैंने मां का प्‍यार दिया था, लेकिन लोगों ने इसे लेकर भी बहुत सारी अफवाहें उड़ाईं. उन्‍होंने ऐसी बातें की कि ये बच्‍चा केशवगिरी और मेरा है. मैं रोज सुबह उठकर अपने भोले से प्रार्थना करती कि वो मुझे और बल दें ताकि मैं ये लड़ाई लड़ सकूं. मैं रोज टूटती और अपने भगवान का हाथ पकड़कर रोज फिर से उठ खड़ी होती.

    जीवन कभी आसान नहीं रहा. जीवन कभी आसान होता भी नहीं. लेकिन अगर आपकी आत्‍मा में विश्‍वास है, आपको किसी पर भरोसा है तो उस भरोसे के सहारे जीवन गुजर जाता है.
    चाहे कितनी भी तकलीफें आई हों, मेरे ईश्‍वर से मेरा भरोसा कभी नहीं डिगा.



    मनकामेश्‍वर मंदिर की पहली महिला महंत
    केशव गिरी फैसला कर चुके थे कि उनके बाद मुझे ही मंदिर का महंत बनाया जाएगा. कोई इस फैसले के पक्ष में नहीं था. इस मंदिर के इतिहास में कभी ऐसा नहीं हुआ कि इतना बड़ा दायित्‍व किसी स्‍त्री को सौंपा गया हो. लेकिन उन्‍होंने सारे विरोधों के बावजूद सत्‍य का साथ दिया और उस स्‍त्री का, जो शिव की सच्‍ची साधक थी. 2008 में मैं इस मंदिर की पहली महिला महंत बनी. अचानक मेरे कंधों पर इतना बड़ा दायित्‍व आ पड़ा, लेकिन उस दिन से मैं अपनी समूची शक्ति से इस दायित्‍व को निभा रही हूं.

    लोग आज भी बातें करते हैं. मैं आज भी रोज लड़ती हूं. कभी समाज से, कभी इस मर्दवादी व्‍यवस्‍था से, तो कभी अपने आप से.

    क्‍या कभी मेरे मन में लौट जाने का ख्‍याल आता है? क्‍या कभी लगता है कि इस राह गए ही क्‍यों? बाकी स्त्रियों की तरह घर-गृहस्‍थी की सुंदर, सुरक्षित दुनिया क्‍यों न चुनी? एक पति होता, जो प्रेम करता. बच्‍चे होते, जो मां कहकर बुलाते. कई बार स्त्रियां पूछती हैं इस तरह का सवाल. मैं खुद भी पूछती हूं खुद से ये सवाल.

    और उत्‍तर हर बार एक ही होता है, "जो हुआ, वो मेरा चाहा हुआ नहीं था. वो खुद शिव ने चाहा था. मैं यहां आई क्‍योंकि उन्‍होंने ही मुझे बुलाया था. उनके बुलाने में इतना प्रेम, इतना सम्‍मोहन, इतनी शक्ति थी कि संसार का सारा बल एकजुट हो जाता तो भी शिव की पुकार मुकाबला नहीं कर सकता था."
    "इतना बल होता है मनुष्‍य की आत्‍मा में, इतना बल होता है प्रेम में."
    "ये वही समझ सकते हैं, जिन्‍होंने शिव को छूकर महसूस किया है."

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    प्‍यार नहीं, सबको सिर्फ सेक्‍स चाहिए था, मुझे लगा फिर फ्री में क्‍यों, पैसे लेकर क्‍यों नहीं
    एक अंजलि गई तो उसके शरीर से पांच और अंजलियां जिंदा हो गईं
    मैं दिन के उजाले में ह्यूमन राइट्स लॉयर हूं और रात के अंधेरे में ड्रैग क्‍वीन
    'मैं बार में नाचती थी, लेकिन मेरी मर्जी के खिलाफ कोई मर्द मुझे क्‍यों हाथ लगाता'
    घर पर शॉर्ट स्‍कर्ट भी पहनना मना था, अब टू पीस पहनकर बॉडी दिखाती हूं

    इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human stories पर क्लिक करें.

    Tags: Human story, Lucknow news, Uttar Pradesg

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