Human Story: औरतों का डॉक्‍टर होना यानी देह के परे स्‍त्री को एक मनुष्‍य के रूप में देखना

ये कहानी है गाइनकॉलजिस्‍ट डॉ. पुनीत बेदी की, जो कहते हैं कि जब आप ब्रेस्‍ट, वेजाइना, पीरियड्स और चाइल्‍ड बर्थ के परे स्‍त्री को एक मनुष्‍य के रूप में देखते हैं तो स्‍त्री देह पर बने चुटकुलों पर हंस नहीं सकते

Manisha Pandey
Updated: September 17, 2018, 5:05 PM IST
Manisha Pandey
Updated: September 17, 2018, 5:05 PM IST
मैंने कभी नहीं सोचा था कि औरतों का डॉक्‍टर बनूंगा. मैं एमबीबीएस का स्‍टूडेंट था. दूर से देखने में लगता है कि मेडिकल की पढ़ाई कोई बड़ी तोप चीज होगी, लेकिन हकीकत में ऐसा होता नहीं. शुरू-शुरू में मेडिकल कॉलेज मुझे बड़ी अनइंटेलेक्‍चुअल टाइप की जगह लगी. वहां बी फॉर ब्‍वॉय टाइप पढ़ाई होती थी. हम जो भी सीख रहे थे, उसके कोई बड़े मायने नहीं थे. हालांकि वहां भी कुछ लोग ऐसे थे, जो बहुत समझदार और संवेदनशील थे. उनके लिए डॉक्‍टरी महज एक प्रोफेशन नहीं था. मैं पढ़ाई कर रहा था, लेकिन तब तक भी मुझे पता नहीं था कि स्‍पेशिएलिटी कौन सी लेनी है.

हालांकि पढ़ाई के दौरान ही मुझे कुछ चीजें समझ में आ गई थीं. जैसेकि कोई गंभीर बीमारी जैसे कैंसर, सर्जरी वगैरह मेरे बस की बात नहीं है. मैं बीमारी और मृत्‍यु को लेकर सहज नहीं था. इन चीजों का निजी तौर पर मेरे मन पर असर पड़ता. पेडीट्रीशियन एक अच्‍छा विकल्‍प हो सकता था, लेकिन सरकारी अस्‍पतालों की हालत खराब थी और इतने बच्‍चे मरते थे कि वो काम भी मेरे बस का नहीं था.

गाइनिकॉलजी ही इकलौती ऐसी जगह थी, जहां इतना तकलीफदेह माहौल नहीं था. हम जब भी वहां जाते, कोई न कोई बच्‍चा पैदा हुआ होता, लड्डू बंट रहे होते, खुशी का माहौल होता. हालांकि सरकारी अस्‍पतालों की हालत बहुत खराब थी और औरतों का चीखना-चिल्‍लाना, उनको तकलीफ में देखना एक बीस साल के लड़के के लिए बड़ी अजीब सी चीज थी. लेकिन बावजूद इन सबके आखिर में सब खुश होते और खुशी-खुशी बच्‍चा लेकर घर जाते. मुझे लगा कि ये काम मैं कर सकता हूं.





घर की औरतें बच्‍चा पैदा करते हुए मरीं
लेकिन कॅरियर के लिहाज से देखूं तो मेरे इस निर्णय पर खुश होने वाले लोग कम ही थे. दोस्‍त चिंता जाहिर करते कि पुरुषों के लिए गाइनिकॉलजी में कोई खास करियर नहीं है. उत्‍तर भारत में तब मर्द औरतों के डॉक्‍टर कम ही हुआ करते थे. बंगाल, महाराष्‍ट्र या दक्षिण में पारंपरिक रूप से पुरुष गाइनिकॉलजिस्‍ट की परंपरा रही, लेकिन उत्‍तर भारत इस मामले में बहुत दकियानूसी था. गाइनिकॉलजी औरतों का ही क्षेत्र माना जाता था. मेरे आसपास के लोगों को लगा कि ये कॅरियर सुसाइड की तरह है, ये कैसा मर्द है, जो औरतों का डॉक्‍टर बनना चाहता है.

लेकिन इस फैसले में मेरे पिता ने मदद की.
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मेरी दादी की मौत चाइल्‍ड बर्थ में हुई थी. मेरे पापा और चाचा के बाद तीसरी लड़की हुई और उसके जन्‍म के दौरान ही मां-बेटी दोनों की मौत हो गई. मेरे दादाजी की तीन शादियां हुईं और तीनों स्त्रियां बच्‍चा पैदा करते हुए मरीं, जबकि हम काफी समृद्ध परिवार से आते थे. उस जमाने में बहुत सारी औरतें जचगी के दौरान मर जाती थीं क्‍योंकि कोई डॉक्‍टर नहीं होता था. गांव में सिर्फ एक दाई थी. मेरे पिता बिन मां के पले थे और इस बात का दुख शायद उन्‍हें आजीवन रहा.

उस शाम उन्‍होंने मुझसे सिर्फ एक ही बात कही थी कि डॉक्‍टर एक व्‍यक्ति का इलाज करता है, एक व्‍यक्ति की जिंदगी बचाता है, लेकिन औरतों का डॉक्‍टर पूरे परिवार की जिंदगी बचा रहा होता है.

आखिरकार मुझे गाइनिकॉलजी करने की वजह मिल गई.



25 साल का लड़का, जो औरतों का डॉक्‍टर था
जब मैंने काम शुरू किया तो शुरू में कई तरह की चुनौतियां आईं. महिलाओं में एक किस्‍म का संकोच होता था. उन्‍हें खुलने, बात करने, सहज होने में वक्‍त लगता. सरकारी अस्‍पतालों में जो महिलाएं आतीं, उन्‍हें तो जो डॉक्‍टर वहां होता, उससे इलाज करवाना होता था, लेकिन प्राइवेट प्रैक्टिस में महिलाएं किसी महिला डॉक्‍टर के पास जाना ही पसंद करती थीं. एक पुरुष डॉक्‍टर के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है कि वो किसी महिला का भरोसा हासिल कर सके. हमारा इतिहास भी ऐसा रहा है कि हम मर्द और जो भी हों, लेकिन भरोसेमंद कभी नहीं रहे. जो भी स्त्रियां आतीं, चाहे वो अमीर घरों से हों या गरीब, सबको भरोसा करने में वक्‍त लगता. लेकिन एक बार अगर आप उनका विश्‍वास हासिल कर लें, एक बार उन्‍हें यह यकीन हो जाए कि आप मर्द नहीं हैं, आप जो कर रहे हैं, उनके भले के लिए कर रहे हैं तो आपको जितना सम्‍मान और स्‍नेह मिलता है, उसका कोई हिसाब नहीं है.

औरतों का डॉक्‍टर होकर औरतों को समझना
काम करते हुए मुझे एक बात समझ में आई कि अधिकांश औरतें, चाहे वह किसी भी परिवार और वर्गीय पृष्‍ठभूमि से आती हों, काफी तिरस्‍कृत होती हैं. उनका ठीक से ख्‍याल नहीं रखा जाता. वो खुद भी खुद का ख्‍याल नहीं रखतीं. जब तक बीमारी सचमुच गंभीर न हो, न वो खुद डॉक्‍टर के पास जाती हैं और न ही कोई उन्‍हें लेकर जाता है. यह सिर्फ उनकी फिजिकल हेल्‍थ ही नहीं, इमोशनल हेल्‍थ की भी बात है. औरतों को लगता है कि उनका कोई मूल्‍य नहीं है, उनकी बात कोई नहीं सुनता, उनकी परवाह कोई नहीं करता. और जब आप उनकी परवाह करते हैं, उनका इलाज करते हैं, उन्‍हें बेहतर महसूस कराते हैं तो कई बार वो बिलकुल फट पड़ती हैं. वो सबकुछ एक सांस में, एक बार में कह देना चाहती हैं. और उन्‍हें बदले में कुछ नहीं चाहिए, सिवा इसके कि आप सिर्फ उनकी बात सुन लें. सिर्फ ये भरोसा कि आप समझ रहे हैं, उनकी पीड़ा को महसूस कर रहे हैं, उनके साथ आपकी संवेदना है.

इतना कुछ है उनके भीतर दबा हुआ, बंधा हुआ, इतनी सारी बातें जिसे कहने की कोई और जगह नहीं. वो परिवार में, पति से, सास से, सहेली से, बच्‍चों से किसी से नहीं कह सकतीं कि उन्‍हें दुख क्‍या है. वो सारे दुख वो अकसर अपने डॉक्‍टर से कह लेती हैं.



औरतें सबसे ज्‍यादा असहज अपने शरीर के साथ हैं
औरतों का डॉक्‍टर होकर आप सिर्फ उनकी फिजियोलॉजी ही नहीं समझते, आप औरत होने के बड़े सामाजिक संदर्भ और अर्थ भी समझते हैं. मुझे लगता है कि स्त्रियों की जो भी मेंटल, इमोशनल प्रॉब्‍लम है, उसकी जड़ें हमारे समाज की संरचना में है. बचपन से उन्‍हें कभी एक संपूर्ण, स्‍वतंत्र मनुष्‍य के रूप में पाला ही नहीं जाता. जैसे लड़के बड़े होते हैं, अपना काम करते हैं, अपनी जिम्‍मेदारी लेते हैं, अपने फैसले करते हैं, उनके अंजाम निभाते हैं, वैसा लड़कियों के साथ नहीं होता. उनकी जिम्‍मेदारी उठाने, उनके फैसले लेने के लिए हमेशा कोई और होता है और सबसे बड़ा पहरेदार उनकी वर्जिनिटी पर बिठा दिया जाता है. पिता, भाई, रिश्‍तेदार और यहां तक कि अड़ोसी-पड़ोसी और जान-पहचान वाले भी लड़की की वर्जिनिटी के पहरेदार बन जाते हैं.

ये सिर्फ स्‍त्री के साथ ही होता है कि उसकी पूरी मनुष्‍यता का केंद्र उसके शरीर को बना दिया जाता है. सब वहीं से तय होता है. और विडंबना देखिए कि जो शरीर पूरे जीवन का केंद्र है, वही सबसे ज्‍यादा तिरस्‍कृत है. औरत का शरीर इज्‍जत की चीज होता है, लेकिन स्‍नेह, देखरेख, इलाज की नहीं. इसके नतीजे इतने भयावह होते हैं कि जिसे मैं रोज बतौर डॉक्‍टर महसूस करता हूं. स्त्रियां हर वक्‍त अपने शरीर को लेकर एक शर्मिंदगी में रहती हैं. वो सिर्फ इस शर्मिंदगी के चलते भीतर कितनी बीमारियां, कितने इंफेक्‍शन पाल रही होती हैं. वो खुद को स्‍वीकार नहीं करतीं, खुद के साथ कंफर्टेबल नहीं होतीं. मैं खुद दो बेटियों का पिता हूं और समझ सकता हूं कि ये कितनी तकलीफदेह बात है कि किसी इंसान को इस तरह बॉडी में रिड्यूस कर दिया जाए और वो खुद उस बॉडी तक को आदर से न देखे.

औरतों का मर्द डॉक्‍टर और दुनिया के मर्द
इतने साल हो गए प्रैक्टिस करते हुए. अब तो मुझे मर्दों से एक किस्‍म की चि़ढ़ सी हो गई है. जब कोई आदमी अपनी पत्‍नी को लेकर मेरे पास दिखाने आता है तो मेरी डील ये होती है कि तुम चुप बैठोगे. मर्दों के पूरे व्‍यक्तित्‍व, बॉडी लैंग्‍वेज में एक अजीब किस्‍म का अहंकार होता है. वो औरतों को बोलने ही नहीं देते. ये स्त्रियों के प्रति उनकी केयर भी नहीं है, ऐसा भी नहीं कि उन्‍हें उनके बारे में सब मालूम है. ये सिर्फ अहंकार होता है, जो हर चीज पर अपना कंट्रोल चाहता है. मैं उन्‍हें चुप करा देता हूं. कहता हूं, बाहर बैठो या मुंह बंद रखो. औरत के पेट में कहां, कितना, कैसा दर्द है, ये आदमी कैसे बता सकता है. सिर्फ पति ही नहीं, कई बार स्त्रियां अपनी सास, जेठानी, ननद के साथ भी आती हैं. मैं उन्‍हें भी चुप बैठने को बोलता हूं और सिर्फ मरीज की बात सुनता हूं.

ब्रेस्‍ट, वेजाइना, पीरियड्स और चाइल्‍ड बर्थ के परे स्‍त्री एक मनुष्‍य
मेरी चार बहनें हैं. पिता घर में होते नहीं थे. एक तरह से मेरा पूरा बचपन मां और चार बहनों के बीच बीता. शादी हुई तो मेरी दो बेटियां हुईं. घर में भी पत्‍नी और दो बेटियां और मैं अकेला पुरुष. काम की जगह पर भी हर वक्‍त चारों ओर औरतें ही होती हैं. यूं देखा जाए तो मेरा पूरा जीवन ही हर वक्‍त स्त्रियों से घिरा हुआ है. मैं अकसर देखता हूं, अपने पुरुष सहकर्मियों, दोस्‍तों और आसपास के मर्दों को कि वो किस तरह अपनी निजी महफिलों में स्त्रियों के बारे में बात करते हैं, उनके शरीर पर टिप्‍पणियां करते हैं. मुझे बहुत विचित्र लगता है. ऐसी कोई भी बात सुनकर, देखकर मुझे हमेशा अपनी बेटियां याद आती हैं. आपने अकसर लोगों को मजाक करते सुना होगा कि एक मर्द गाइनिकॉलजिस्‍ट के कितने मजे होंगे. मेरे लिए ये चुटकुले तकलीफदेह हैं. स्त्रियों का डॉक्‍टर होना उनके साथ आत्‍मा से जुड़ना है. जब आप ब्रेस्‍ट, वेजाइना, पीरियड्स और चाइल्‍ड बर्थ के परे स्‍त्री को एक मनुष्‍य के रूप में देखते हैं, उसकी आत्‍मा से जुड़ते हैं तो आप इन चुटकुलों पर हंस नहीं सकते, आप स्‍त्री देह का मजाक उड़ाते चुटकुलों पर खुश नहीं हो सकते.

स्त्रियों का डॉक्‍टर होना बेहतर मनुष्‍य होने की गारंटी तो नहीं, लेकिन जिंदगी आपको बेहतर मनुष्‍य होने का मौका जरूर देती है. स्त्रियों का डॉक्‍टर बनकर आप खुद भी थोड़े और स्‍त्री हो जाते हैं. स्‍त्री होना बेहतर मनुष्‍य होना है.

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