Human Story: मेरा आदमी बिना जूता, बिना दस्‍ताना सीवर में उतरा और डूबकर मर गया

अनिल की सीवर में डूबने से मौत हो गई, पीछे छूट गए तीन बच्‍चे और वो स्‍त्री, जिसके लिए अनिल जीवन में उम्‍मीद, खुशी और सहारे का दूसरा नाम था. पति उसे पीटता था, अनिल ने प्‍यार और सहारा दिया

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: September 28, 2018, 12:09 PM IST
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: September 28, 2018, 12:09 PM IST
14 सितंबर का दिन था. उस दिन सुबह से कोई काम नहीं आया था तो अनिल घर पर ही था. करीब 12 बजे के आसपास कोई बुलाने आया. बोला, ठेकेदार ने बुलाया है, गटर की सफाई करनी है. अनिल यही काम करता था. डाबरी में हम रहते हैं और यहीं आसपास के इलाकों में मेरा पति साफ-सफाई करने जाता था. उस दिन जब अनिल जा रहा था तो मुझे लगा नहीं था कि अब वो लौटकर नहीं आएगा. जब काफी देर हो गई और अनिल नहीं आया तो मुझे थोड़ी फिक्र हुई. मैंने उसके मोबाइल पर फोन लगाया, लेकिन मिला नहीं. मैंने अपनी चप्‍पल पहनी और जैसे कपड़ों में घर में बैठी थी, वैसे ही उसे ढूंढने निकल गई.
जाते हुए वो बताकर गया था कि अस्‍पताल के पास एक हलवाई की दुकान है, मैं वहीं सफाई करने जा रहा हूं. मैं वहां गई तो वहां कोई नहीं दिखा. मैं काफी देर तक आसपास भटकती रही, लेकिन कुछ पता नहीं चला. वहां कोई था भी नहीं कि जिससे पूछ सकूं. तभी थोड़ा आगे जाकर एक गेट दिखा. गेट के पास काफी भीड़ जमा थी. वहां एक जोड़ी जूते पड़े हुए थे. वो जूते मैंने पहचान लिए. वो अनिल के ही जूते थे. जूते पड़े थे, ढेर सारे लोग थे, लेकिन अनिल का कहीं पता नहीं था. मेरा जी घबरा रहा था. मैंने लोगों से पूछा कि क्‍या हुआ है तो उन्‍होंने बताया कि एक आदमी सीवर में डूबकर मर गया है.
जो मरा था, उसके जूते बाहर पड़े थे. वो अनिल के जूते थे. मेरा अनिल मर गया था.

अनिल की बॉडी से मैला टपक रहा था

मेरा जी बैठ रहा था, लग रहा था, सांस नहीं ले पा रही हूं. तब तक वहां पुलिस भी आ गई. जब गटर से अनिल को बाहर निकाला गया तो वो पैंट-शर्ट पहने हुए था. मुझे पता है, वो कभी कपड़े पहनकर सीवर में नहीं जाता था. कपड़े उतारकर, सिर्फ चड्ढी में ही सीवर में उतरता था. उस दिन वो पूरे कपड़ों में था. कपड़े कीचड़ और मैले में लिपटे थे. मुंह, बाल, गले, हाथ, पैर, सब मैले में सना हुआ था. आंख तक दिखाई नहीं दे रही थी. बाल और कपड़ों से मैला टपक रहा था. जब उसे बाहर निकाला तो जैसे तेज बदबू का झोंका आया हो. सब अपने मुंह पर कपड़ा रख लिए. पुलिस वाले भी नाक बंद करके अपने डंडे से अनिल के शरीर को हिलाकर देख रहे थे. उन्‍होंने डंडे से कोंचा, लेकिन कोई हरकत नहीं हुई. तब तक जान खत्‍म हो चुकी थी. मोबाइल, बटुआ सब उसकी जेब में से निकला. ऐसे कैसे हो सकता है कि वो बिना कपड़े उतारे, बिना बटुआ, मोबाइल बाहर रखे सीधे गटर में उतर जाए. पता नहीं, मेरे पति के साथ उस दिन क्‍या हुआ. मुझे लगता है कि उन लोगों ने उसके साथ कुछ किया था.



जब पुलिस आई तो और भीड़ जमा हो गई. सब लोग अनिल की बॉडी को घेरकर खड़े थे, लेकिन किसी ने मुझे उसके पास नहीं जाने दिया. पुलिस ने मेरे कंधे को डंडे से कोंचा और लाश से दूर रहने को कहा. मैं रोती रही कि ये मेरा आदमी है, मेरे बच्‍चे का बाप है, लेकिन उन लोगों ने मेरी एक नहीं सुनी. मैले में लिपटी लाश को कोई हाथ नहीं लगा रहा था और मुझे उन्‍होंने हाथ लगाने नहीं दिया. पुलिस डंडे से छू रह थी और उसी डंडे से मेरा हाथ कोंचकर मुझे दूर भगा रही थी. अस्‍पताल की गाड़ी आई और मेरे सामने वो उसकी लाश को उठाकर ले गए. मैं दूर से सब देखती रही, उसे जाते हुए आखिरी बार छू भी नहीं पाई.
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छह दिन के भीतर ये घर में दूसरी मौत थी
6 दिन के भीतर ये घर में दूसरी मौत थी. मई में मेरा लड़का पैदा हुआ था. वो बहुत कमजोर था. वो चार महीने का था. बारिश के दिन थे, दो-तीन से लगातार बारिश हो रही थी. सारे कपड़े भीग गए थे, मैं सुखा नहीं पाई और बच्‍चे को ठंड लग गई. 8 तारीख, शनिवार को उसकी मौत हो गई. मेरा बच्‍चा मेरी गोदी में पड़े-पड़े मेरी आंख के सामने दुनिया से चला गया. मैं कुछ नहीं कर पाई. तब अनिल ने मुझे संभाला. मैं रात-रात भर रोती रहती तो वो मेरे सिरहाने बैठा रहता था. मेरा ख्‍याल रखता. मेरे लिए खाना भी बनाता था. अब वो भी मुझे छोड़कर चला गया, अब मेरा ख्‍याल रखने वाला कोई नहीं.



पहला पति बहुत मारता था
अनिल से मेरी शादी नहीं हुई थी. मेरा पहला पति मनोहर मुझे बहुत मारता था, बच्‍चों को मारता था. रोज शराब पीकर आता, मेरे कपड़े फाड़ देता, डंडे से मेरी पिटाई करता. खाने में थूक देता, कई बार तो खाने में ही पेशाब कर देता. घर का सामान तोड़ना, सारे कपड़े पानी डालकर गीले कर देना, ये सब उसका रोज का काम था. कई बार तो बच्‍चों और मेरे पहनने के लिए सूखे कपड़े भी नहीं होते थे. वो रोज रात में जबर्दस्‍ती मेरे साथ सोता था, अगर कभी मुझे बुखार हो, मेरी तबीयत ठीक न हो और मैं मना करूं तो उसी हालत में मेरी पिटाई करता था. मेरे तीन बच्‍चे थे. एक कमरे का छोटा सा घर था. उसी में सब लोग रहते थे और कई बार उसे इतनी ठरक होती कि बच्‍चों के सोने का इंतजार भी नहीं करता था. उनके सामने ही मेरे कपड़े उठा देता, पकड़ लेता. या आधी रात बच्‍चों को कमरे से बाहर निकालकर सेक्‍स करता. बच्‍चे रात में सड़क पर पड़े रहते थे. अगर मैं मना करती तो वो मुझे भी पीट-पीटकर रात में घर से बाहर निकाल देता था. मैं पूरी रात कभी गर्मी, कभी ठंड में बच्‍चों के साथ सड़क पर पड़ी रहती थी.
जब मेरे साथ ये सब हो रहा था, तब मेरा एक ही सहारा था- अनिल. अनिल मेरी बहन का लड़का था और कई बार हमारे साथ भी रहता था. मनोहर जब भी मुझे पीटता, वो मुझे बचाता था. मेरे शरीर पर घाव होता तो वो दवाई लेकर आता और दवाई लगाता. बुखार हो तो गोली लाकर देता. वो मुझे हमेशा कहता था कि इस आदमी को छोड़ दो, लेकिन मेरी हिम्‍मत नहीं होती थी. आदमी को छोड़कर मैं कहां जाती. अनिल कहता था कि वो हमेशा मेरा ख्‍याल रखेगा. बच्‍चों की जिम्‍मेदारी उठाएगा. वो मुझसे बहुत प्‍यार करता था. एक रात मनोहर ने मुझे बहुत मारा, लोहे की रॉड से मारा, दीवार पर मेरा मुंह पटक दिया और मेरे दांत टूट गए. अनिल उस रात वहां नहीं था.

जब सुबह उसे पता चला तो वो आया. उस दिन मैंने एक गठरी में अपने और बच्‍चों के कपड़े बांधे और मनोहर का घर छोड़ दिया. हम दूसरे मुहल्‍ले में जाकर रहने लगे. मैं, अनिल और मेरे तीन बच्‍चे. पहली बार जिंदगी में लगा कि मुझे कोई खुशी मिली है.



मेरे पैर दबाने, मुझे प्‍यार करने वाला
अनिल जैसा आदमी मैंने दूसरा नहीं देखा. वो मुझे बहुत प्‍यार करता था. बच्‍चों को बहुत प्‍यार करता था. जब तक बच्‍चे खाना न खा लें, वो खाना नहीं खाता था. मुझे भी कई बार कौर-कौर अपने हाथ से खिलाता था. मुझसे कभी पैर नहीं दबवाया, उल्‍टे खुद मेरे पैर दबाता था. उसने कभी मेरे ऊपर हाथ नहीं उठाया, कभी बुरा सुलूक नहीं किया. मेरे बच्‍चे भी अनिल से बहुत प्‍यार करते थे, जबकि अपने बाप को देखकर कांपते थे. मुझे जिंदगी में किसी से इतना प्‍यार नहीं मिला, जितना अनिल से. मुझे पैदा करने वाले मां-बाप ने भी कभी प्‍यार नहीं किया, होश संभालने से पहले एक उमरदार आदमी से ब्‍याह कर दिया, वो भी मुझे बहुत पीटता था. उससे बच्‍चा भी हुआ था. उन दोनों को छोड़कर मैं गांव से भाग गई, यहां मनोहर मिला, उसने ब्‍याह किया, तीन बच्‍चे पैदा किए, लेकिन प्‍यार कभी नहीं किया. हमेशा पैर की जूती बनाकर रखा. अनिल से मैंने जाना कि प्‍यार क्‍या होता है. आसपास की औरतें भी बैर करती थीं कि देखो, इसका आदमी इसको कितना प्‍यार करता है.



मैं मना करती थी सीवर मत साफ करो
इस बात पर कई बार हमारे बीच झगड़ा हुआ. मैं कहती थी कि ये काम छोड़ दो. कोई और धंधा कर लो, मजदूरी कर लो, रिक्‍शा चला लो, कुछ भी और कर लो, लेकिन उसने मेरी एक नहीं सुनी. उसे भी अपना काम पसंद तो नहीं था, लेकिन कहता था कि 300-400 रु. दिन के मिल जाते हैं. जिस दिन काम नहीं होता तो ये भी नहीं मिलता था. वो कहता था कि अपने बच्‍चों को स्‍कूल में पढ़ाऊंगा ताकि उन्‍हें कभी मैला साफ करने का काम न करना पड़े. उस दिन के पहले तो वो कभी इतने गहरे गटर में गया भी नहीं था. सिर्फ कमर तक अंदर जाता था और हाथ से पत्‍थर, कचरा, गंदगी निकालकर सफाई करता था. उसके पास कोई औजार नहीं था, आंख, पैर, मुंह, हाथ ढंकने के लिए भी कुछ नहीं था. वो सिर्फ चड्ढी पहनकर नंगे पांव सीवर में घुसता था. हमें बड़ा गंदा लगता था. हम मना करते, लेकिन वो नहीं सुनता. अगर उसने बात मान ली होती तो आज मेरा अन‍िल मेरे पास होता.

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