Human Story: मेरी सबसे सुंदर फ्रॉक खून से लाल हो गई, उन्‍होंने धारदार चाकू से मेरा खतना किया

मासूमा राणा अल्‍वी सात साल की थीं, जब एक दिन धोखे से घुमाने के बहाने दादी उसे ले गईं और उसका खतना करवा दिया. 40 साल तक मासूमा ने इस बारे में बात नहीं की. अब वो इस कुप्रथा के खिलाफ लड़ रही हैं

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: November 23, 2018, 4:14 PM IST
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: November 23, 2018, 4:14 PM IST
मैं सात साल की थी. उस दिन दादी घर आई हुई थीं. दादी आती तो कपड़े, खिलौने, मिठाइयां आती. दादी आती तो खुशी आती. मैं दादी को बहुत प्‍यार करती थी.

उस दिन उन्‍होंने सुबह-सुबह मुझसे कहा कि आज वो मुझे घुमाने ले जाएंगी. मैं सुबह से घूमने के लिए तैयार बैठी थी. जाने का समय हुआ तो उन्‍होंने मुझे नई सुंदर फ्रॉक पहचाई, मेरे बाल संवारे और मैं खुशी-खुशी उनका हाथ थामे घर से निकल गई. घर से बाहर निकलना भर ही उस उम्र में उत्‍सव जैसी बात हुआ करती थी.

दादी मुझे भिंडी बाजार ले गईं. इतनी भीड़भाड़ भरी जगह मुझे कोई घूमने की जगह नहीं लगी. आसपास खिलौनों की दुकान भी नहीं थी जो मैं सोचूं कि वो मुझे खिलौने दिलाने के लिए यहां लेकर आई हैं. फिर मुझे लगा कि शायद हम किसी के घर जा रहे हैं. वहां मेरे जैसे बच्‍चे होंगे. मैंने दादी से पूछा कि हम कहां जा रहे हैं. वो मुझे बहलाती, पुचकारती बस यही कहती रहीं कि हम किसी के घर घूमने जा रहे हैं.

घुप्‍प अंधेरे से भरी संकरी, घुमावदार गलियों को पार करते हुए आखिरकार हम पुरानी से टूटी-फूटी इमारत के सामने पहुंचे. दादी मेरा हाथ पकड़कर सीढि़यां चढ़ने लगी. ऊपर जाकर एक फ्लैट का दरवाजा खटखटाया. एक दरमियाने कद की उम्रदराज सी दिखती औरत ने दरवाजा खोला. वो बड़ा अंधेरा, भुतहा सा फ्लैट था. वहां कोई बच्‍चा नहीं था. अब मुझे डर लगने लगा था. दादी जाने मुझे कहां ले आई हैं.

फिर वो औरत हमें उस घर के कोने में एक छोटे से सीलन भरे कमरे में ले गई. कमरे में बिलकुल अंधेरा था. खिड़की पर मोटे-मोटे पर्दे पड़े थे, जिनसे छनकर बड़ी मामूली सी रौशनी भीतर आ पा रही थी.

मेरी स्‍मृति में अंधेरे, सीलन और जमीन पर बिछी एक चटाई के सिवा मुझे कुछ याद नहीं. सिर्फ इतना याद है कि दादी ने मुझे लेटने को कहा. मैं उनसे लिपटकर रोने लगी. मैं बार-बार कहती रही कि मुझे डर लग रहा है, यहां से चलो, लेकिन उन्‍होंने मेरी एक नहीं सुनी. दोनों ने मिलकर मुझे जबर्दस्‍ती लिटा दिया. उस औरत ने मेरा फ्रॉक ऊपर उठाया और मेरी अंडरवियर उतार दी. उसने मेरे पैर चौड़े किए. दादी ने मेरे दोनों पैरों को कसकर पकड़ा हुआ था. उस औरत के हाथ में कोई धारदार हथियार था. मैं लेटी हुई थी, दादी मेरे ऊपर झुकी हुई थी, इसलिए मैं देख नहीं पाई कि वो क्‍या चीज थी, उसके हाथों में.

मुझे सिर्फ इतना याद है कि कुछ ही क्षणों में मेरे पैरों के बीच किसी धारदार हथियार ने छुआ और तेज दर्द हुआ. पैरों के बीच से खून बह रहा था. इसके बाद दोनों की पकड़ भी ढीली हो गई. उस औरत ने उस जगह कोई काले रंग का पाउडर लगाया, मुझे वापस जांघिया पहचाना और दादी से कहा, "हो गया."
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क्‍या हुआ, क्‍यों हुआ, किसलिए हुआ, मेरे साथ ही ऐसा क्‍यों हुआ, मुझे कुछ पता नहीं था.

7 साल की उस कच्‍ची नाजुक उम्र में मैं अचानक खुद को अपमानित और छला हुआ महसूस कर रही थी.
उसके बाद सिर्फ एक ही ख्‍याल मुझे ताउम्र परेशान करता रहा कि उस दिन दादी ने मुझसे झूठ बोला था कि वो मुझे घुमाने ले जा रही हैं. मां ने मुझसे झूठ बोला कि मैं दादी के साथ घूमने जा रही हूं. पिता ने मुझसे झूठ बोला, क्‍योंकि उन्‍होंने भी नहीं बताया कि ये लोग मेरे साथ क्‍या करने वाले हैं. वो तो मुझे इतना प्‍यार करते थे, फिर उन्‍होंने ये क्‍यों होने दिया.

वो छले जाने का एहसास था.
जीवन में पहली बार लगा कि मेरे पूरे परिवार ने मिलकर मुझे धोखा दिया था.

उम्र गुजरने के बाद मुझे समझ में आया कि उस दोपहर मेरे साथ जो हुआ था, वो क्‍या था और क्‍यों किया गया था.



बोहरा मुस्लिम समाज और औरतों का खतना
बोहरा मुस्लिम समाज में ये सदियों से चली आ रही एक प्रथा है. हमारे यहां लड़कियों का खतना किया जाता है. प्‍यूबर्टी तक पहुंचने से पहले लड़कियों के क्लिटॉरिस का ऊपरी हिस्‍सा किसी धारदार चाकू या ब्‍लेड से काटा जाता है. छोटी बच्चियों का खतना करने वाली औरतें कोई प्रशिक्षित डॉक्‍टर नहीं होतीं. इसलिए 99 फीसदी मामलों में ये होता है कि क्लिटॉरिस का हुड काटने के दौरान क्लिटॉरिस का भीतरी हिस्‍सा भी कट जाता है. क्लिटॉरिस स्‍त्री के शरीर का सबसे संवेदनशील अंग है. यहां करीब 900 नाजुक नसों के सिरे जुड़े होते हैं. यह इतना संवेदनशील हिस्‍सा है कि एक हल्‍के से स्‍पर्श से भी प्रभ‍ावित होता है. उस हिस्‍से को ब्‍लेड से काटने के शारीरिक और मानसिक नतीजे भयावह होते हैं. हमारे समाज में क्लिटॉरिस को हराम की बोटी कहा जाता है. जिस अंग का संबंध स्‍त्री के यौन सुख से, उसके आनंद से, वही एक अंग मर्दों की नजर में हराम की बोटी है. वो मानते हैं कि अगर इस अंग को नहीं काटा गया तो औरत बिगड़ जाएगी और शादी से पहले सेक्‍स कर लेगी. उसकी यौन पवित्रता बचाए रखने के लिए ये जरूरी है कि उस हराम की बोटी को निकाल दिया जाए.

औरतें आपस में बात नहीं करतीं
7 साल की उम्र में गुजरी उस काली दोपहर का जिक्र मैंने 40 सालों तक कभी किसी से नहीं किया. मैं स्‍कूल जाती थी, वहां ढेर सारी बोहरा मुस्लिम लड़कियां थीं, मेरे परिवार-रिश्‍तेदारी में ढेर सारी हमउम्र, छोटी-बड़ी लड़कियां थीं, हम सब ऐसी किसी काली दोपहर में अपने ही लोगों द्वारा छले गए थे, हम सबकी आत्‍मा का एक हिस्‍सा एक धारदार हथियार से किसी दिन काट दिया गया था, लेकिन हममें से किसी ने आपस में उस तकलीफ को कभी साझा नहीं किया. कभी जिक्र तक नहीं किया, नाम भी नहीं लिया. ऐसी चुप्‍पी थी इसे लेकर. बचपन से लड़कियों के दिमाग में ये इस कदर भर दिया जाता कि इस बारे में बात नहीं करनी है. हमने बात नहीं की. सारा अपमान, सारा दुख अकेले ही सहा.



औरतों के खतने के खिलाफ सभ्‍यता की लड़ाई
पूरी दुनिया में औरतों के खतने के खिलाफ लड़ाइयां लड़ी गई हैं. अफ्रीकी समाजों में ये बहुत पुरानी और बर्बर परंपरा रही है. वहां भी ये हुआ कि 23 देशों में औरतों के खतने को गैरकानूनी करार दिया गया है. लेकिन हिंदुस्‍तान का बोहरा मुस्लिम समाज एकमात्र ऐसा समुदाय है, जो न सिर्फ इसे कुप्रथा को छोड़ नहीं रहा, बल्कि इसे बचाने, सहेजने और इसके खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबाने की कोशिश में लगा हुआ है. जबकि हम सबसे ज्‍यादा पढ़े-लिखे मुस्लिम समुदाय हैं. हमारे यहां 100 फीसदी साक्षरता है. लड़कियों का ग्रेजुएट होना तो बहुत मामूली बात है. हमारे यहां लड़कियां डॉक्‍टरेट करती हैं, साइंस पढ़ती हैं, वैज्ञानिक बन रही हैं. लेकिन खतने की इस बर्बर प्रथा से हर लड़की को गुजरना पड़ता है और कोई इसके खिलाफ आवाज उठाने की हिम्‍मत नहीं कर पाती. विरोध की हर आवाज को कुचल दिया जाता है.

बिना खतने वाली औरत इस समाज में निष्‍कासित और तिरस्‍कृत है. यह असंभव है कि कोई लड़की बोहरा मुस्लिम समुदाय में पैदा हुई हो और उसका खतना न हो. यहां तक कि किसी बाहरी कम्‍युनिटी की लड़की भी अगर बोहरा में शादी करती है तो उसे शादी के पहले खतना करवाना पड़ता है. बोहरा मुस्लिम डॉक्‍टर से खतने का सर्टिफिकेट मिलने के बाद ही उसे समाज में स्‍वीकृति मिलती है.

खतना और सेक्‍सुलिटी
जैसे हमारे यहां औरतें खतने के बारे में बात नहीं करतीं, वो ये भी बात नहीं करतीं कि इसका उनकी सेक्‍सुएलिटी और शादी के बाद की सेक्‍स लाइफ पर क्‍या असर पड़ा. मुझसे कोई पूछता है तो मेरे पास भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं. मुझे नहीं पता कि अगर मेरा क्लिटॉरिस काटा नहीं गया होता तो मेरा यौन जीवन और यौन अनुभव कैसे होते. मेरे पास यही एक अनुभव है. मैंने किताबों में पढ़ा है, दूसरी स्त्रियों से सुना है, उनके अनुभवों के बारे में. मुझे पता नहीं. कोई औरत इस बारे में बात नहीं करती. जैसे हम बाकी चीजों के बारे में बात नहीं करते, इस बारे में भी नहीं करते कि कितनी बार किसी औरत का खतना जीवन की सबसे बड़ी दुर्घटना में तब्‍दील हो गया. केस बिगड़ गया, लड़की की मौत हो गई या उसे जीवन में कभी सेक्‍सुअल प्‍लेजर महसूस नहीं हुआ. हर सवाल पर चुप्‍पी है.

कई पिछले कई सालों से इस बर्बर प्रथा के खिलाफ मुहिम चला रही हूं. हमारा एक समूह है, वी स्‍पीक आउट. अब धीरे-धीरे मुहिम का ये असर हुआ है कि औरतों से बोलना शुरू किया है. वो अपनी कहानियां साझा कर रही हैं. हम सारी कहानियों को इकट्ठा कर रहे हैं. हम उन औरतों से भी बात की, जिन्‍होंने हजारों बोहरा मुस्लिम लड़कियों का खतना किया. इन सारी कहानियों के मर्म में अपमान और पीड़ा के सिवा और कुछ नहीं.

हर कहानी यही कहती है कि यह अमानवीय है, यह खत्‍म होना चाहिए.

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