Human Story: आज की स्‍वीटू हो सकती है कल की #MeToo, इसलिए पुरुष ! जरा संभलकर

पुरुषों के अधिकारों के लिए वास्‍तव फाउंडेशन चलाने वाले अमित देशपांडे, जो कहते हैं कि रावण ही नहीं, शूर्पणखा का भी पुतला जलाया जाए क्‍योंकि बुराई का कोई जेंडर नहीं होता.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: October 31, 2018, 1:25 PM IST
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: October 31, 2018, 1:25 PM IST
हमने एक पोस्‍टर बनाया. उस पर लिखा था- “Today’s sweetu can be tomorrow’s MeToo.”
उस पर तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आईं. लोगों ने मजाक उड़ाया, विश्‍वास किया. पुरुष के साथ तो ऐसा ही होता है, वह जब भी कुछ कहता है, उस पर अविश्‍वास किया जाता है. पुरुष के उत्‍पीड़न की कहानियों पर कोई भरोसा नहीं करता.

क्‍या किसी ने कभी ये महसूस किया या कहा कि पुरुष पर भरोसा न करना खतरनाक भी हो सकता है. स्‍त्री पर भरोसे की बात नहीं कर रहा मैं. उसके उत्‍पीड़न की हर कहानी पर हर कोई भरोसा करता है. कानून से लेकर समाज तक सब सब मानते हैं कि स्‍त्री प्रताडि़त होती है और पुरुष प्रताडि़त करते हैं. यह विचार इतने बड़े पैमाने पर फैला है और लोगों के विश्‍वास का हिस्‍सा बन चुका है कि इस शोक में इसके उलट और कोई भी बात करना आलोचनाओं को आमंत्रित करने जैसा है.

इसलिए जब हमने कहा कि आज की स्‍वीटू कल की मीटू हो सकती है तो जाहिर है हमारा मजाक ही ज्‍यादा उड़ाया गया. लेकिन यह इस समय की बहुत बड़ी सच्‍चाई है. आप इससे कैसे मुंह मोड़ सकते हैं. ऐसे अनगिनत मामले हमारे सामने हैं, जहां लड़की सहमति से बने संबंधों के बाद पुरुष पर रेप और उत्‍पीड़न का इल्‍जाम लगा देती है. और ये बात सिर्फ संबंधों के बारे में ही सच नहीं है. जिस चीज को आज रेप कहा जा रहा है, क्‍या गारंटी है कि सालों पहले जब वह संबंध बना था तो वह सहमति से बना संबंध नहीं था. आप इस चीज को साबित कैसे करेंगे.

ऐसी कहानियों की वजह से ये होता है कि उत्‍पीड़न की सच्‍ची कहानियों पर से भी भरोसा कम हो जाता है. मीटू मूवमेंट का अर्थ है कि सब अपने उत्‍पीड़न, अपने शोषण की कहानियां सुनाएं और आगे आकर खुलकर बोलें. इसका अर्थ ये नहीं था कि सिर्फ औरतों की कहानियां ही सुनी और सुनाई जाएं. पुरुष भी अपने यौन शोषण की बात कर सकता है. अगर उसके साथ कोई अत्‍याचार हुआ है तो उसकी बात क्‍यों नहीं सुनी जानी चाहिए. लेकिन जैसे ही कोई पुरुष ये बात करता है, सब उसका माखौल उड़ाने लगते हैं. और इस काम में मीडिया सबसे आगे हैं. जब अध्‍ययन सुमन ने कहा कि कंगना रानौत ने उसका उत्‍पीड़न किया है तो हमने क्‍या किया. हमने उसकी बात पर भरोसा नहीं किया और उसका मजाक उड़ाया. मीडिया ने उसका मजाक उड़ाया.



लोगों कहते हैं कि पुरुष का रेप मुमकिन नहीं है और ये साबित करने के लिए वे ये तर्क देते हैं कि बायलॉजिकली ये मुमकिन नहीं है. यह बात बिलकुल झूठ है. पुरुष का भी रेप हो सकता है, उसके साथ फिजिकल और इमोशनल ब्‍लैकमेलिंग और जबर्दस्‍ती की जा सकती है. यह पूरी तरह मुमकिन है. इसलिए जब कोई पुरुष ये कहे कि मेरे साथ ऐसा हुआ है तो उसकी हंसी उड़ाने की बजाय हमें उसकी बात पर भरोसा करना चाहिए.
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मीडिया हमेशा औरतों के अधिकारों की बात करता है, जबकि अब वक्‍त आ गया है कि पुरुषों के अधिकारों की भी बात की जाए. फेमिनिस्‍ट हकीकत का सिर्फ एक पहलू देखती हैं, मीडिया भी उसी सुर में सुर मिलाता है. नंदिता दास और मल्लिका दुआ, जो कल तक ये कहती थीं कि ऑल मेन आर पोटेंशियल रेपिस्‍ट, जब उनके अपने घर पर बात आई तो वो फॉल्‍स केस की बात करने लगीं.

ये दोहरापन है. फेमिनिस्‍टों को भी अपने गिरेबान में झांककर देखने की जरूरत है.

हमारा मकसद इसी दोहरेपन को रेखांकित करना है. वास्‍तव फाउंडेशन उन पुरुषों की आवाज है, जिनकी बात और कोई नहीं सुन रहा. हम महिलाओं के द्वारा सताए गए पुरुषों की फ्री में मदद करते हैं.

पिछले तीन सालों से हम दशहरे पर रावण के साथ-साथ शूर्पणखा का भी पुतला जलाते हैं. अगर रावण बुराई का प्रतीक है तो शूर्पणखा भी पुरुष पर झूठे आरोप लगाने वाली स्त्रियों का प्रतीक है. दोनों गलत हैं और दोनों को जलाया जाना चाहिए.

ये मी टू मूवमेंट एक जरूरी और महत्‍वपूर्ण कदम है, लेकिन झूठे आरोप लगाने वाली शूर्पणखाओं के चलते यह असफल हो सकता है. आज पुरुषों की स्थिति यह है कि वे औरतों पर भरोसा करने में डरते हैं. उन्‍हें लगता है, आज मीठी मीठी बातें करने वाली लड़की पता नहीं कब उत्‍पीड़न का आरोप लगा दे. और अगर एक बार आरोप लग गया तो वो सच हो या झूठ, पुरुष की जिंदगी तो तबाह हो ही जाती है. अगर मामला कोर्ट में जाता है तो फैसला आने में जाने कितना वक्‍त लगे. लेकिन समाज उस फैसले का इंतजार नहीं करता. वो अपना फैसला पहले ही सुना देता है.

हम कोई स्‍त्री विरोधी नहीं हैं और न ही हम फेमिनिस्‍ट हैं. हमारी कोशिश ये है कि हर तरह के जेंडर भेद को खत्‍म किया जाए.

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