#HumanStory: मुंबई की तूफानी बारिश में उस रात अनजान लोगों ने मेरी जान बचाई

हम दादर फ्लाईओवर पर कमर तक पानी में डूबे खड़े हुए थे. रात गहराने लगी थी. तब पिलर पकड़कर धीरे-धीरे सरकना शुरू किया. लगभग घंटेभर की तैराकी के बाद एक अनजान सोसाइटी में पहुंचे. दादर टाउन की पुरानी बिल्डिंग. छोटे-छोटे घर. लेकिन वहां के लोगों ने बारिश में घबराए अनजान चेहरों के लिए अपने दिल खोलकर रख दिए. यही है मुंबई. जहां सरकारें भले हार जाएं, लेकिन जज्बा कभी नहीं हारता.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: July 3, 2019, 12:09 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: July 3, 2019, 12:09 PM IST
सपनों के शहर मुंबई के बारे में आम राय है कि यहां किसी को किसी से वास्ता नहीं. शहर हर साल इस भरम को नए सिरे से तोड़ता है. खासकर जुलाई-अगस्त में जब आसमानी कहर बरपता है, तब मुंबई का नया चेहरा सामने आता है. बारिश-धुला वो चेहरा, जिसमें लोग बिना नाम पूछे सबकी मदद करते हैं. ये वाकया है एक ऐसे ही जज्बे का. मुंबई में 9 सालों से रह रही सरस्वती सरकार बताती हैं कि कैसे बारिश में पूरी मुंबई एक घर हो जाती है.

जून में बारिश शुरू होती है तब पहले तो सबकुछ हरा-भरा लगता है. निहायत खूबसूरत. सड़कों पर गाड़ियां कम हो जाती हैं. समंदर में ऊंची-ऊंची लहरें होती हैं. मुंबई में हर वक्त सफर कर रहे लोग असल में तभी जीते हैं. जुलाई तक हालांकि मंजर बदल जाता है.

शहर समंदर में हिचकोले खाने लगता है. घर पानी में डूब जाते हैं. गाड़ियां माचिस की डिब्बियों की तरह तैरने लगती हैं. पैर जहां के तहां थम जाते हैं. ऐसा ही एक हादसा पिछले साल मेरे साथ घटा.

अगस्त का महीना. उस रोज सुबह से ही बारिश हो रही थी. जैसे-तैसे दफ्तर पहुंची. हम शिप्स में डीलिंग करते हैं तो ऑफिस डॉकयार्ड रोड पर समंदर के एकदम करीब है. हम काम में लगे ही थे कि तभी वॉर्निंग कॉल आई. बारिश तेज हो चुकी थी. हमें घर जाने को बोल दिया गया. ऑफिस कैब सबको नीयरेस्ट ट्रेन स्टेशन तक छोड़ने गई. मेरे साथ तीन और लोग थे. हम दोपहर में तीन बजे के आसपास ऑफिस से निकले.



पूरा रास्ता जाम. जगह-जगह बारिश का पानी भरा हुआ. गाड़ियों की पांत की पांत थमी हुई. हमारी कैब भी इंतजार की कतार में लग गई. किसी को प्यास लगे तो किनारे की दुकान तक जाने को जगह नहीं. तभी देखा कि कार की खिड़कियों से पानी की बोतलें पास-ऑन हो रही हैं. वड़ा पाव पहुंच रहा है. सिलसिला तब तक चला, जब तक कि आखिरी हाथ तक पानी और पाव नहीं पहुंचा.

पूरे तीन घंटे बाद जब हम दादर पहुंचे तो ट्रेनें रोक दी गई थीं. शाम के 6 बजे थे. हम ट्रेन सर्विस रेज्यूम होने का इंतजार करने लगे.
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आखिरकार आठ बजे के आसपास हम बाहर निकले. तय किया कि सड़क के रास्ते जाने की कोशिश करेंगे. घुटनों-घुटनों पानी में आगे बढ़ना शुरू किया. हर कदम के साथ पानी ऊपर चढ़ रहा था. जैसे ही घुटनों से कमर तक पानी आया, मैं रुक गई. हम सब मदद के लिए अपने फोन खंगाल रहे थे. तभी एक को याद आया कि उसकी मदर-इन-लॉ की एक सहेली कहीं आसपास रहती है. मदर-इन-लॉ की सहेली! मुंबई में अपने ही घरवालों से छुट्टियों में मुलाकात होती है. लेकिन फिलहाल शर्मिंदा होने का वक्त नहीं था.

कॉल पर उन्हें हालात बताए. घंटाभर वो फोन पर रहीं. बताती रहीं कि घर कैसे आना है. बारिश में सड़कें डूब चुकी थीं. हम चलते हुए तैर रहे थे. सड़कों पर लगे पिलर पकड़-पकड़कर आगे बढ़े. घंटेभर बाद दादर की एक सोसाइटी में पहुंचे. वो एक पुरानी इमारत थी. काफी पहले बसे शहर का हिस्सा. दीवारों पर पुरानेपन के तमाम निशान थे.

भीतर जाते हुए मन ऊब-डूब रहा था. एक साथ चार लोग दो उम्रदराज लोगों के घर धमक रहे हैं! वो भी अनजान! कहीं बुरा न मान जाएं. सोचते हुए ही मैं अंदर पहुंच चुकी थी.



60 पार का वो जोड़ा ऐसे मिला मानो हमसे पुरानी जान-पहचान हो. सोसाइटी में अंधेरा था. आंटी ने ढेर सारी मोमबत्तियां जला दीं. झरती दीवारों वाला वो घर उनके प्यार से जगमगाने लगा.

अंकल हमें चाय-पानी दे रहे थे, इतने में आंटी ने कहा- तुम लोग भीग गए हो. मेरी बेटी के कपड़े पहन लो. फिर साथ मिलकर पूजा करेंगे. वो गणेश उत्सव का वक्त था. कपड़े छांटते हुए आंटी ने बताया कि उनकी बेटी अब इस दुनिया में नहीं है. पूजा के लिए अपनी पसंद के कपड़े लेते मेरे हाथ एकदम से रुक गए. चुपके से आंटी को देखा. वो चेहरे पर शिकन लाए बिना अलमारी से कपड़े दे रही थीं. फिर तो मैं जैसे-तैसे तैयार हो सकी. हमने मिलकर पूजा की. प्रसाद खाया. तब जाकर उन्होंने हमारे नाम पूछे.

कहते हैं, मुंबई में किसी को किसी से वास्ता नहीं होता. समंदर यहां के लोगों के दिलों को टापू बना चुका है. और भी तमाम बातें. कभी बारिश में यहां आएं, शहर को लेकर तमाम भ्रम टूट जाएंगे.

उस रात तेज बारिश में सोसाइटी के कुछ लड़के सड़क पर खड़े थे. वे हर गुजरने वाले से उसका पता पूछते. अगर किसी को दूर या ऐसी जगह जाना हो, जहां सबसे पहले पानी भरता है तो उन्हें रोक लेते. छोटी-सी सोसाइटी ने अनजान मेहमानों के लिए तमाम इंतजाम कर रखे थे. कॉरिडोर को झाड़-बुहारकर गद्दे बिछाए गए थे. खा-पीकर जैसे ही हम वहां पहुंचे. तुरंत सबके हाथों में धुली चादरें आ गईं.



कॉरिडोर में हम जैसे कई लोग थे जो बारिश में फंसकर यहां आ पहुंचे थे. अब चिंता हुई कि अनजान लोगों के बीच रात कैसे बीतेगी.

हम सबके भीतर कहीं न कहीं ये डर रहा होगा. मेजबानों ने हमारे हाल समझ लिए. वे हमारे साथ बाहर कॉरिडोर में आ गए. फिर जो किस्सागोई शुरू हुई कि आधी रात तक चलती रही. सबसे पास बारिश से जुड़ा कोई न कोई हादसा था. हर हादसे का छोर एक नए रिश्ते पर खुलता था.

अगली सुबह बारिश का कहर हल्का पड़ चुका था. भरे हुए पेट और भरे दिलों के साथ हम लौटे.

पढ़ाई और फिर नौकरी के सिलसिले में कई शहर देखे. हरदम भले दिखने वाले चेहरों को मुसीबत के वक्त दरवाजे बंद करते देखा है. मुंबई अलग है. यहां लोकल के लिए लोग धक्का-मुक्की करते हैं लेकिन एक बार डिब्बे के भीतर पहुंचे तो सारा माहौल बदल जाता है. कोई पढ़ रहा है. कोई गाने सुन रहा है. कोई क्रॉसवर्ड में खोया है. आप बीमार दिखे तो आपके लिए जगह बन जाएगी. हाथ में भारी बैग है तो आपके बगैर कहे बैग एडजस्ट हो जाएगा. वर्सई से मजगांव कम्यूट करती हूं. रोज के लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर. सफर में शहर के ढेरों चेहरे दिखे.

भले ही यहां लोग रास्ता पूछने पर आवाज अनसुनी कर दें लेकिन जरूरत 'असल' है तो तमाम शहर आपका हाथ थाम लेगा.

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First published: July 2, 2019, 1:05 PM IST
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