Human Story: पहले मैं इंटरनेशनल बॉक्‍सर था, अब कुल्‍फी की रेहड़ी लगाता हूं

बॉक्सिंग के नेशनल चैंपियन रहे दिनेश कुमार के गले में 40 से ज्‍यादा मेडल हैं, जिसमें से 17 गोल्‍ड हैं. लेकिन 17 गोल्‍ड जीतने वाला यह रिंग का जादूगर आज गुरबत के चलते कुल्‍फी की रेहड़ी लगाने को मजबूर है.

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: November 26, 2018, 3:18 PM IST
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: November 26, 2018, 3:18 PM IST
बचपन से घर में गरीबी ही देखी थी. खेती-जमीन कुछ थी नहीं. पिता के सिर पर पांच भाई-बहनों को पालने का बोझ था. वो कुल्‍फी की रेहड़ी लगाते और उसी रेहड़ी से हमारा घर चलता था. वो गर्मियों में कुल्‍फी और सर्दियों में मूंगफली की रेहड़ी लगाते थे.

हरियाणा के भिवानी में मेरा जन्‍म हुआ था. मैं पढ़ने में बहुत साधारण था. कभी सोचा नहीं था कि बॉक्‍सर बनूंगा. मेरे ताऊ का लड़का स्‍पोर्ट्स में था. उसे देखकर ही इस ओर मेरा झुकाव हुआ. मैंने सीखना शुरू किया तो वक्‍त के साथ निखरता चला गया. सन 2000 में बॉक्सिंग में शुरुआत हुई थी. कुछ दो साल बाद मैं स्‍टेट लेवल कॉम्‍पटीशन जीता और हरियाणा का चैंपियन बन गया. उसके बाद नेशनल चैंपियनशिप जीती. यह किसी सपने के सच होने की तरह था. दिनेश कुमार बॉक्सिंग का नेशनल चैंपियन.

मैंने चार बार नेशनल चैंपियनशिप जीती, चार बार नेशनल चैंपियन रहा. छह बार हरियाणा चैंपियन रहा. मेरी उपलब्धियों के खाते में 17 गोल्‍ड, एक सिल्‍वर और 5 ब्रॉन्‍ज मेडल हैं. एक समय ऐसा था, जब बॉक्सिंग ही मेरी जिंदगी थी. मुझे बॉक्सिंग का कीड़ा लग गया था. जितनी खुशी रिंग में उतरकर मिलती थी, उतनी किसी और काम से नहीं मिलती. आखिरकार जीवन को एक मकसद, एक दिशा मिल गई थी. पिता आसपास के लोगों की नजरों में जब मेरे लिए सम्‍मान और प्रशंसा देखते तो उनका भी सीना गर्व से चौड़ा हो जाता. एक ठेला-रेहड़ी लगाने वाले ने कभी नहीं सोचा था कि उसका बेटा एक दिन हवाई जहाज में बैठेगा, इंग्‍लैंड जाएगा, इंटरनेशनल खेलेगा.

जब पहली बार हवाई जहाज में बैठा

मुझे आज भी याद है, जब मैं पहली बार हवाई जहाज में बैठा था. मैं उज्‍बेकिस्‍तान जा रहा था, पहली इंटरनेशनल बॉक्सिंग चैंपियनशिप में हिस्‍सा लेना. इसके पहले जब मैं भिवानी की सड़कों पर भटका करता था तो कभी-कभार दूर आसमान में उड़ता हुआ जहाज दिखता. इतनी दूर से तो इतना छोटा सा लगता था. तब से मेरा सपना था कि मैं एक दिन हवाई जहाज में बैठूंगा. मुझे क्‍या पता कि अंदर से ये जहाज इतना बड़ा होता है कि सैकड़ों लोग बैठ सकते हैं. शुरू में थोड़ा डर लगा, लेकिन फिर जब जहाज की खिड़की से धरती को देखा सारा डर जाता रहा. जो महसूस हुआ, वो रोमांच और खुशी का ही एहसास था. जहाज में बैठकर ऐसा लग रहा था, मानो मैं हवा में उड़ रहा हूं. वो मेरी जिंदगी के सबसे सुंदर दिन थे. मैं सचमुच हवा में ही उड़ रहा था.



उज्‍बेकिस्‍तान में मैं अव्‍वल रहा. वहां से मेरा सेलेक्‍शन इंग्‍लैंड के लिए हुआ. वहां भी मैंने गोल्‍ड जीता. लौटा तो फूल-मालाओं और ढोल-नगाड़ों से मेरा स्‍वागत हुआ. जीवन में जो कुछ हो रहा था, जो कुछ मिला था, सब एक सपने की तरह था. सपना परवान चढ़ रहा था.
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लेकिन बीच राह ही कुछ ऐसा हुआ कि जिंदगी ने मेरे सपनों के पर कुतर दिए.

वो अंधेरा दिन
वो मेरी जिंदगी का सबसे काला दिन है. एक दिन मैं रोज की तरह प्रैक्टिस के लिए जा रहा था कि मेरा एक्‍सीडेंट हो गया. भिवानी में ये दुर्घटना घटी. एक बाइक वाला गलत तरीके से ओवरटेक करने की कोशिश कर रहा था. उसने मुझे टक्‍कर मार दी. मैं बेहोश हो गया. लोगों ने अस्‍पताल पहुंचाया. होश आया तो पता चला कि चेहरे और सिर में गहरे जख्‍म हैं. हड्डी टूटी थी. मैं बुरी तरह घायल था. सिर में लगी चोट बहुत गहरी थी. उस एक्‍सीडेंट से उबरने और फिर सामान्‍य होने में मुझे पांच साल लग गए.

जिस समय ये एक्‍सीडेंट हुआ था, वो मेरे कॅरियर का चरम समय था. उसके बाद मैं रातोंरात बैबफुट पर चला गया. पांच साल बहुत लंबा समय होता है. स्‍पोर्ट्स के फील्‍ड में तो पांच साल में पांच नई पीढि़यां तैयार हो जाती हैं. मेरा शरीर तो बिलकुल बेकार हो गया था. बॉडी काम ही नहीं करती थी. पांच साल बाद जब ठीक हुआ, तब भी पहले वाली बात नहीं रही.



हालांकि मैंने फिर से प्रैक्टिस करने और स्‍पार्ट्स की दुनिया में लौटने की कोशिश की, लेकिन मुमकिन नहीं हुआ. अच्‍छा समय बीत चुका था. घर के हालात फिर से खराब हो गए थे. एक बार फिर हम अपने गुजारे के लिए कुल्‍फी-मूंगफली की रेहड़ी पर ही निर्भर हो गए थे. मां की तबीयत काफी खराब रहने लगी थी. अच्‍छा खाने-पीने, शरीर का ख्‍याल रखने, ट्रेनिंग लेने के लिए पैसे नहीं थे. मुझे ट्रेनिंग दिलाने के लिए पिता ने पहले ही काफी कर्ज ले रखा था, इस उम्‍मीद में कि बेटा चैंपियन बनेगा तो सारा कर्ज उतर जाएगा. लेकिन नियति को तो कुछ और ही मंजूर था.

स्‍पोर्ट्स छूट गया. कर्जा चुकाने के लिए मुझे भी पिता के काम में हाथ बंटाना पड़ा. अब ये हालात हैं कि सारे मेडल घर में पड़े धूल खा रहे हैं और मैं यहां कुल्‍फी बेचकर गुजारा कर रहा हूं. सरकार से मुझे कभी कोई आर्थिक मदद नहीं मिली. बुरे दिन आए तो दोस्‍तों, जान-पहचान वालों ने भी मुंह फेर लिया. जिस घर में हमेशा लोगों का तांता लगा रहता था, वो घर अब बिलकुल वीरान रहता है. किसी को फोन करो तो लोग बात करने से बचते हैं, मिलने से बचते हैं, बहाने बना देते हैं कि कहीं कोई मदद न करनी पड़ जाए.

मैं आज भी चाहता हूं बॉक्सिंग करना, लेकिन बॉक्सिंग बातों से नहीं होती. उसके लिए अच्‍छी डाइट, मौका, सुविधा, आराम, ट्रेनिंग और कुल मिलाकर पैसा चाहिए. वो हमारे पास है नहीं. मैं एक प्‍लेयर हूं. कोई दूसरा काम मुझे आता नहीं. मैंने तो अपना सारा जीवन इसी में लगाया. अब ये खेल भी मेरे किसी काम का नहीं.

मैंने सुना था अर्श से फर्श पर आना. लेकिन पहले ये मुहावरे समझ में नहीं आते थे. अब हर बात समझ में आती है. अर्श से फर्श पर आना क्या होता है, एटीट्यूड में रहना क्‍या होता है, चैंपियन की क्या कदर होती है. क्‍या होता है, जब वो बैकफुट पर चला जाता है. दुनिया उसके साथ कैसा व्यवहार करती है.

पहले जिंदगी मेरे कदमों में थी. आज मैं जिंदगी के कदमों में पड़ा हूं. यहां से कहां जाऊंगा, पता नहीं. लेकिन कोई मदद का हाथ, कोई उम्‍मीद आती तो अच्‍छा ही था.

उम्‍मीद ही जरूरत किसे नहीं होती. जिसने सितारों की दुनिया देखी हो, उसे उजाले का इंतजार तो रहेगा ही.

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