Human Story : उसकी आत्‍मविश्‍वास से चमकती आंखें बोलती हैं और आप अपनी आंखों से सुनते हैं

मिस डेफ इंडिया, 2018 निष्‍ठा डुडेजा बचपन से सुन-बोल नहीं सकतीं, लेकिन जब वो कोर्ट में टेनिस खेलती है, रैंप पर चलती है और आंखों में आंखें डालकर देखती है तो आप उन आंखों की चमक को सुने बगैर नहीं रह सकते

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: October 25, 2018, 12:14 PM IST
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: October 25, 2018, 12:14 PM IST
जब हमें पहली बार पता चला कि हमारी बेटी सुन-बोल नहीं सकती तो हमारी पहली प्रतिक्रिया अस्‍वीकार की ही थी. हम ये मानने को तैयार नहीं थे. हमारा दिल कहता कि जरूर कहीं कोई गलती है. ये डॉक्‍टर की गलती है, जांच करने वाली मशीन की गलती है, समझने की गलती है. कहीं-न-कहीं कोई भूल हुई है. ये सच नहीं हो सकता. मन पहले तो सारे बहाने कर लेता है, सारी तरकीबें ढूंढ लेता है, लेकिन सच को स्‍वीकार करने को तैयार नहीं होता. लेकिन फिर धीरे-धीरे सच इतना बड़ा हो जाता है और उसके सामने हम इतने बौने कि स्‍वीकार करना ही होता है.

आखिरकार हमें मानना ही पड़ा कि हमारी निष्‍ठा बोल नहीं सकती, सुन नहीं सकती. वो उस समय सिर्फ तीन साल की थी.

निष्‍ठा के जन्‍म के समय मैं नॉर्थ ईस्‍ट में पोस्‍टेड था, लेकिन उसका जन्‍म गाजियाबाद में हुआ अपने नाना-नानी के घर. इतनी प्‍यारी बच्‍ची थी मेरी कि मैं वो लम्‍हा बयान नहीं कर सकता, जब मैंने पहली बार उसे अपनी बांहों में लिया था. जब पहली बार अपनी नन्‍ही-नन्‍ही हथेलियों से उसने मेरी उंगली पकड़ी थी. जब वो अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से टुकुर-टुकुर हमें देखा करती थी. वो बचपन में इतनी शैतान और इतनी चंचल थी कि हमें कोई शक भी नहीं कि उसे बोलने-सुनने की दिक्‍कत है. कोई शांत बच्‍चा होता तो शायद शुरू में ही संदेह हो जाता. लेकिन वो तो ऐसी थी कि एक मिनट के लिए स्थिर नहीं होती थी. हमें थोड़ा शक तब हुआ, जब वो तीन साल की हो गई, फिर भी बोलना नहीं शुरू किया. बच्‍चे साफ-साफ न भी बोल पाएं तो भी तरह-तरह की आवाजें निकालने लगते हैं. निष्‍ठा बिलकुल नहीं बोलती थी तो हम उसे डॉक्‍टर के पास ले गए. डॉक्‍टरी जांच के बाद यह पता चला कि वह सुन-बोल नहीं सकती. तीन साल की उम्र में पहली बार उसे हियरिंग एड लगाई गई.



पहले जिस सच को हम स्‍वीकारने को तैयार नहीं थे, अब वही सच हमसे बड़ा होकर हमारे सामने खड़ा था. बेटी को रियरिंग एड लग गए थे. हमें पता चल चुका था कि वह बाकी बच्‍चों की तरह, अपने बड़े भाई की तरह कभी सुन-बोल नहीं पाएगी. लेकिन उस दिन हमने एक फैसला किया, उसे कभी एहसास नहीं होने देंगे कि ये कोई कमजोरी है. उसे बाकी सामान्‍य बच्‍चों की तरह ही पालेंगे. उसे दया और बेचारगी नहीं, प्‍यार और आत्‍मबल चाहिए. हमें वही उसे देना है. हमने निष्‍ठा को हमेशा सामान्‍य बच्‍चों की तरह पाला. ऐसा नहीं कि शैतानी करने पर उसे डांट नहीं पड़ती थी या अपनी किसी कमजोरी की वजह से उसे अतिरिक्‍त लाड़-दुलार दिया जाता. उसे प्‍यार मिलता था, वैसा ही जितना बाकी बच्‍चों को मिलता है. गलत काम करने पर डांट भी वैसे ही पड़ती थी.



आज कोई निष्‍ठा को देखकर ये नहीं कह सकता कि सुन और बोल न सकने के कारण उसके आत्‍मविश्‍वास, उसके आत्‍मबल या आंखों की चमक किसी दूसरे बच्‍चे से कम है. वो हमेशा नॉर्मल बच्‍चों के स्‍कूल में पढ़ी. हमने उसे कभी स्‍पेशल बच्‍चों के स्‍कूल या किसी ट्रेनिंग ग्रुप में नहीं भेजा. छोटी थी तो कई बार मुश्किलें भी आईं. बच्‍चे उतने सेंसिटिव और समझदार नहीं होते. उनके लिए निष्‍ठा का बोल, सुन पाना कई बार कौतूहल और मजाक का विषय होता था. हालांकि हर स्‍कूल में कुछ टीचर इतने समझदार और संवेदनशील थे कि वो स्थिति को संभाल लेते और बाकी बच्‍चों को भी ज्‍यादा सेंसिटिव तरीके से पेश आना सिखाते. एक बार कुछ लड़कों से उसे कुछ तंग किया था. तब वह काफी परेशान हो गई थी. मुश्किलें आईं, लेकिन मेरी बेटी इतनी हिम्‍मती थी और उसका आत्‍मबल इतना मजबूत था कि उसके सामने सारी मुश्किलें छोटी पड़ गईं. आज भी उसके दोस्‍त, टीचर और आसपास के लोग उसका आत्‍मविश्‍वास और आंतरिक मजबूती देखकर चकित हो जाते हैं. मेरी बच्‍ची जब गर्व से सिर ऊंचा करके खड़ी होती है और आंखों में चमक लिए दूसरे की आंखों में आंखें डालकर देखती है तो ऐसा लगता है कि उसके व्‍यक्तित्‍व की रौशनी से समूचा जगह रौशन हो गया हो. उसे देखकर आप खुशी से मुस्‍कुराए बगैर नहीं रह सकते. ऐसा जादू है उसमें.
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निष्‍ठा शुरू से पढ़ने में बहुत अच्‍छी थी. 7 साल की उम्र में उसने जूडो सीखना शुरू किया और उसके बाद टेनिस खेलने लगी. वो जो भी काम हाथ में लेती, उसे बहुत उम्‍दा ढंग से अंजाम देती थी. फिर दो साल पहले उसने मुझे इस ब्‍यूटी कॉन्‍टेस्‍ट के बारे में बताया, मिस डेफ इंडिया कॉन्‍टेस्‍ट, जो अगले साल फरवरी में इंदौर में होने वाला था. उसने उस कॉन्‍टेस्‍ट में भाग लेने की इच्‍छा जाहिर की. मैंने भी हामी भर दी. फिर तो उसने जी-जान से तैयारी की. मेकअप, कपड़ों, वॉक और डांस से लेकर हर चीज के बारे में बारीकी से पढ़ा, समझा और खूब मेहनत की. नतीजा सामने है- निष्‍ठा ने आखिरकार मिस डेफ इंडिया इंटरनेशनल का खिताब जीत लिया.

ये कॉन्‍टेस्‍ट जीतने के बाद अब वो फिर से पूरी तरह अपनी पढ़ाई पर ध्‍यान दे रही है. दिल्‍ली यूनिवर्सिटी के वेंकटेश्‍वर कॉलेज से ग्रेजुएशन करने के बाद अब वो मुंबई के मीठीबाई कॉलेज से पोस्‍ट ग्रेजुएशन कर रही है. उसने अपने दम पर अपना मुकाम बनाया है. अब मुझे उसकी शादी या रिश्‍ते की फिक्र नहीं होती. वो अपने आप में इतनी संपूर्ण है कि अपना जीवन को संपूर्ण बनाने के लिए उसे पुरुष के नाम की जरूरत नहीं. शादी, वे जब चाहे, जिससे चाहे करे. न चाहे, न करे. ये पूरी तरह उसका फैसला है.

हर मां-बाप का ख्‍वाब होता है कि वो अपने बच्‍चे के नाम से जाने जाएं. मुझे गर्व होता है, जब लोग कहते हैं, ये हैं वेदप्रकाश डुडेजा, निष्‍ठा डुडेजा के पापा.

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