#HumanStory: कहानी डिलीवरी बॉय की, रोज़ लगभग 200 km चलता हूं और कोई पानी भी नहीं पूछता

हमारा दिन शुरू होता है इंतजार से. पहले ऑर्डर के लिए. फिर ट्रैफिक जाम में फंसकर. वहां से निकलते हैं तो ऊंचे-ऊंचे घरों की सीढ़ियां इंतजार में होती हैं. कितनी ही बार संकरी सीढ़ियों पर अंधेरे में गिरते हुए बचा हूं. फिर दरवाजा खुलता है और शुरू होता है असल इंतजार- डिलीवरी लेने वाले के चेहरे पर मुस्कान का. लोगों को लगता है कि पानी पिलाने या मुस्कुराने से उनकी तौहीन हो जाएगी.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 14, 2019, 4:03 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 14, 2019, 4:03 PM IST
कोलकाता के डिलीवरी बॉय 'पथिकृत साहा' का दर्द सड़क पर चल रहे हर उस डिलीवरी बॉय का दर्द है, जिसके कंधे पर उसके कद से भी बड़ा बैग है.

वैसे तो पूरे का पूरा कोलकाता भीड़ और इंतजार का शहर है लेकिन चंद रास्ते ऐसे भी हैं , जिनसे हम कलकतिया लोग भी घबराते हैं. सियालदाह से हावड़ा तक वही रास्ता है. दिन से रात तक सड़कों पर फंसी गाड़ियां और लोग. आगे निकलने की होड़ में चीं-पीं की आवाजें. पसीने में नहाए चेहरे. हर मिनट घड़ी या मोबाइल देखती निगाहें. गुस्सा. चिड़चिड़ाहट. धकियाहट. भीड़ के इसी मेले में एक मेरी स्कूटी भी है. पीछे बड़ा सा बैग.



मैं हॉर्न नहीं दे सकता. न साइड मांग सकता हूं. कंधे पर लटका बैग मेरी वो पहचान है, जो इसकी इजाजत नहीं देता.

जाम खुलता है. मैं तेजी से आगे बढ़ता हूं. लगातार मोबाइल बज रहा है. गाड़ी साइड करने का वक्त नहीं. फोन उठाता हूं. दूसरी ओर से कस्टमर की आवाज- इतनी देर से फोन कर रहे हैं, आपको सुनाई नहीं पड़ता. हमारा ऑर्डर आने में कितना वक्त है?



इंतेहाई चिड़चिड़ाहट से भरी आवाज. मैं सफाई देता हूं. अगली ओर की आवाज और तेज हो जाती है. मैं फोन काटने की हिम्मत नहीं जुटा पाता- रेटिंग कम हो जाएगी.

इतने में पीछे से आई गाड़ी मेरी स्कूटी से भिड़ जाती है. फोन अब भी चालू है...मैं सबसे पहले अपना बैग संभालता हूं. उसके बाद गाड़ी. और फिर खुद को.ऐसा अक्सर होता है. शाम 7 से 12 बजे तक ऑर्डर का दबाव सबसे ज्यादा होता है. इसी वक्त लोग ऑफिस से लौटते होते हैं. सड़कें एकदम भरी हुई. ऐसे में कोलकाता में डेढ़ किलोमीटर का रास्ता भी लगभग आधे घंटे में तय होता है. डिलीवरी लेकर एक जगह पहुंचता हूं तो दूसरा कस्टमर गुस्सा करता है.
Loading...

थकान होती है लेकिन कस्टमर का रवैया ज्यादा थकाता है. लेट होने पर ऑर्डर कैंसल कर देते हैं. आपस में झगड़ा होने पर ऑर्डर नहीं लेते. पेमेंट ऑन डिलीवरी होने पर ऐसा अक्सर ही होता है. तेज धूप में पसीने से नहाए हुए हम पांच तल्ला चढ़ते हैं. घंटी बजाने के काफी देर बाद दरवाजा खुलता है और सामने आया चेहरा तपाक से मना कर देता है. बारिश में खुद से ज्यादा फूड पार्सल को बचाकर ले जाते हैं. हांफते-कांखते पहुंचते हैं और कोई 'न' कह देता है.

एक बार तकरीबन 15 किलोमीटर दूर पहुंचा और कस्टमर ने कहा- मेरे बच्चे ने गलती से ऑर्डर कर दिया था. हमें नहीं चाहिए.



याद नहीं आता कि पिछले एक साल में मैंने कभी भी दोपहर का खाना खाया हो.

हमारे बंगाल में हर दोपहर का खाना शानदार भोज जैसा होता है. तरह-तरह की मछलियां, सब्जियां और मिठाइयां. अब मैं बिस्किट साथ रखता हूं. आदतन भूख लग ही आए तो बिस्किट खा लिया. टारगेट पूरा होगा, तभी ठीक-ठाक पैसे मिलेंगे.

हम दूसरों को खाना पहुंचाते हैं लेकिन ज्यादातर लोग हमें पानी को भी नहीं पूछते. पानी मांग लें तो पहले तो माथा सिकोड़कर देखते हैं. फिर चुपचाप धड़ाक से दरवाजा बंद कर देते हैं. इतनी जोरों से कि दरवाजे के साथ आपका पानी पीने का इरादा भी हिल जाए. फिर दरवाजा खुलता है और पानी का गिलास थमा दिया जाता है.

अब मैं पानी साथ लेकर चलता हूं. चाहे जितनी प्यास लगे, थोड़ा-थोड़ा पीता रहता हूं ताकि जलील होने की नौबत न आए.



कई बार कुछ 'मजेदार' हादसे भी घटते हैं. पिछली दिवाली को रात लगभग दो बजे एक ऑर्डर देने गया. सुनसान रास्ते में सिर्फ कुत्तों की आवाज.

डर लग रहा था. काफी कैश जमा हो चुका था. मेरे दिनभर की मेहनत की कमाई. तेजी से बाइक चला रहा था लेकिन डर के मारे खाली रास्ता और लंबा लग रहा है. जैसे-तैसे ऑर्डर पहुंचाया और भागा. पैसे तो नहीं लुटे लेकिन वापसी में कुत्ते पीछे लग गए. मैं जितनी तेजी से चलाता, वो उतने ही गुस्से से भौंकते हुए दौड़ते. बीच में एक गाड़ी आ गई और मेरा पीछा छूटा. उस वाकये के बाद से अब देर रात की डिलीवरी नहीं लेता हूं. कुत्तों के काटने के मामले हमारे साथ होते ही रहते हैं.

दिन में 8 से 10 घंटे बाइक चलाता हूं. कई बार इससे भी ज्यादा. पीठ-कंधों में खून के साथ दर्द दौड़ता है.

बैग, हेलमेट संभालना होता है और साथ में बार-बार आ रहे फोन कॉल भी. कई बार कस्टमर बालकनी में रहते हैं. वो दूध-सब्जियां लेने के लिए नीचे बैग उतारते हैं लेकिन डिलीवरी बॉय के लिए नहीं. मैंने कई बार कहा लेकिन वे मना कर देते हैं. एक ने कहा- आपको चढ़ने-उतरने के ही पैसे मिलते हैं!

किसी का लहजा कितना ही बुरा हो, हम चुपचाप सुनते हैं वरना रेटिंग कम हो जाएगी.

और पढ़ने के लिए क्लिक करें-

#HumanStory: एक साथ 11 मौतों के बाद ये है 'बुराड़ी के उस घर' का हाल, मुफ्त में रहने से भी डरते हैं लोग

#HumanStory: पहाड़ों पर रहता ये प्लास्टिक सर्जन मुफ्त में बना चुका है हजारों चेहरे

#HumanStory: 'बुलेट पर जा रहे थे कि तभी शेर ने लंबी छलांग लगाई और...' 

#HumanStory: कश्मीर में मजदूरी करता था बिहार का ये युवक, पैलेट गन ने ले ली आंखें

(इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human story पर क्लिक करें.) 
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...