#HumanStory: ऐसी होती है जंगल की ज़िंदगी, कहानी फॉरेस्ट गार्ड की, जिसकी तस्वीरें पीएम मोदी को पसंद हैं

अंगड़ाई लेता शेर, आंखें मींचे चीता, अघाया हुआ सांप, फूलों का रस पीती तितली. मैं अपने छोटे से कैमरे से फोटो खींचने लगा.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: March 13, 2019, 3:55 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: March 13, 2019, 3:55 PM IST
(इतवार की सुबह चिड़ियाघर जाएं. सबकुछ देखने के बाद बारी आती है शेर की जो लंबे-चौड़े बाड़े में पसरा दोपहर की झपकी ले रहा है. आप इंतजार करते हैं उसकी एक हलचल, एक दहाड़ का. वो दहाड़ जो आसपास के पेड़-फुनगे को भी थर्रा दे. अब मिलें, दीपक वाधेर से. 28 साल के दीपक दिन से लेकर रात तक शेरों के संग रहते हैं. मामूली-सी लाठी इनका बचाव है. फॉरेस्ट गार्ड का काम कर रहे दीपक की हाल में खींची तस्वीरें प्रधानमंत्री मोदी ने शेयर कीं. बकौल दीपक, जंगल की जिंदगी का हर पल कैमरे में कैद करने लायक होता है. )

हर सुबह जब ड्यूटी पर निकलता हूं तो हाथ में छुट-पुट सामानों के अलावा एक और चीज होती है. वो है कैमरा. मेरे पास बड़ा कैमरा नहीं. न ही फोटो खींचने की कोई ट्रेनिंग है. लेकिन जंगल अपने-आप में इतना खूबसूरत है कि तस्वीरों के लिए एडवांस कैमरे की जरूरत नहीं होती. जरूरत है तो जानवरों से दोस्ती की. नौकरी के 5 सालों में मैंने शेर की भाषा समझी है. मुझे पता है, वो कब क्या करेगा. उसका मूड कैसा है. वो किसी तकलीफ में है या गुस्से में. जंगल के भीतर घुसते हुए मैं अपना मूड उससे मिला लेता हूं. उसके बाद ही कोई क्लिक करता हूं.





जंगल में शेर-चीतों के बीच बिना डरे घूमते दीपक का बचपन भी शेरों के आसपास बीता. शेर से पहली मुलाकात उन्हें आज भी याद है. हमारा घर पहले जंगल से सटे खेत में हुआ करता. एक सुबह मैं घर के बाहर खड़ा था, तभी वहां एक जानवर दिखा. लगभग 200 मीटर दूर रहा होगा. मैं चिल्लाया- देखो पापा, कितना बड़ा कुत्ता है. मैं हैरत में उसे देख रहा था और साथ में कुत्ता-कुत्ता की रट लगाए था. थोड़ी देर में पापा बाहर आए तो चीख पड़े. ये कुत्ता नहीं, शेर है. जल्दी अंदर घुस. वो मुलाकात याद करते हुए दीपक हंसते हुए बताते हैं. इसके बाद से तो लगातार शेर देखता रहा. स्कूल जाता तो कई बार शेरों का झुंड सड़क पर सुस्ताता मिलता. एक ही सड़क थी. हम इंतजार करते कि कब शेर जाएं और तो कब हम निकलें.

जंगल देखते बचपन बीता लेकिन तब जानता नहीं था कि यही मेरा पेशा भी बन जाएगा. फॉरेस्ट गार्ड की नौकरी जॉइन की, तब शुरुआती वक्त बहुत मुश्किल रहा. दिन-दिनभर कोई चेहरा नहीं दिखता था. किसी इंसान की बोली सुनने तरस जाता. घने जंगल की ड्यूटी. कभी शेर दिखता तो कभी जहरीले सांप. बारिश होती तो रुकती ही नहीं थी. दिनों तक सूरज नहीं दिखता था. जंगल के आसपास पला-बढ़ा था लेकिन नौकरी के पहले साल काफी बौखलाया रहा.



धीरे-धीरे काम सीखा. सबसे पहले जानवरों की भाषा सीखी. जानवरों को समझना जंगल में रहने की पहली शर्त है. मैं दूर से शेर को देखता. उसका मूड भांपता. उसका व्यवहार समझता. अब मेरे इलाके के सारे शेर मुझे पहचानते हैं. वे जानते हैं कि हम उनके रखवाले हैं. उनका ध्यान रखते हैं. बीते पांच सालों में किसी जंगली जानवर ने मुझपर हमला नहीं किया. रोजाना शेर मिलते हैं. मुझे देखकर भी अनदेखा कर देते हैं, वही करते हैं जो उनका दिल चाहे. फिल्मों में शेर को बेवजह ही खूंखार दिखाते हैं. शेर सचमुच का राजा होता है. वो यूं ही किसी पर हमला नहीं करता. चुपके से तो कभी नहीं. इतने सालों तक शेर को करीब से देखा है. शेर पहले अलर्ट कर देते हैं कि वो यहां है, आप मत जाएं. तीन-चार पर अलर्ट करता है. दहाड़ता है. तब भी आप उसे छेड़ें तो वो हमला जरूर करेगा.
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जंगल में काम आसान नहीं. खासकर फॉरेस्ट गार्ड को काफी तैयारियां चाहिए होती हैं. मैं जब ड्यूटी पर निकलता हूं तो अपने साथ एक थैला लेकर चलता हूं. उसमें टॉर्च, मजबूत लाठी, पानी की बोतल और खाने-पीने की चीजें रहती हैं. साथ में फर्स्ट एड बॉक्स रहता है. शेर का हमला सबसे आखिर की बात है. सांप-कीड़े-मकोड़े कुछ भी काट सकते हैं. तब वक्त रहते इलाज जरूरी है. लेकिन जंगल का रखवाला होने के लिए जो बात सबसे जरूरी है, वो है धीरज. जंगली जानवरों के बीच पैदल घूमना आसान नहीं. हम उनके इलाके में होते हैं, उनकी मर्जी, उनकी पसंद-नापसंदगी को देखकर चलना होता है. कई बार जंगली जानवर आपस में लड़कर घायल हो जाते हैं, तब उनका भी इलाज करना होता है.



नौकरी का पहला-दूसरा साल तो यही सब सीखते-समझते बीता. फिर दूसरे सामानों के साथ गले में कैमरा भी रहने लगा. जंगल ऐसी जगह है, जहां कब क्या हो जाए, कब क्या दिख जाए, कुछ कहना मुमकिन नहीं. रोज यहां ऐसे नजारे होते हैं जिन्हें कैमरे में उतारा जा सकता है. अंगड़ाई लेता शेर, आंखें मींचा हुआ चीता, अघाया हुआ सांप, फूलों का रस पीती तितली. मैं अपने छोटे से कैमरे से फोटो खींचने लगा. जानवरों का मूड समझना इसमें खूब काम आया. ऐसे ही एक रोज ऊंघते और फिर पेड़ पर चढ़ते शेर की तस्वीर ली. कुछ दिनों बाद एक फेसबुक यूजर ने मुझे खबर दी कि मेरी फोटो प्रधानमंत्री सर ने शेयर की है. ओहदे में मैं जंगल का सबसे छोटा कर्मचारी हूं. फोटो खींचने के मेरे शौक ने मुझे इतनी शोहरत दे दी है.

जंगल के आसमान पर पलाश के नारंगी फूलों का मस्तूल तना है, इसी पर जंगल का राजा पसरा हुआ है. बला की खूबसूरत और जिंदा यही तस्वीर प्रधानमंत्री ने शेयर की. हालांकि तस्वीर खींचने वाला निहायत बेबाकी से खुद को अनाड़ी बता पाता है.



दीपक कहते हैं- मुझे फोटो खींचना नहीं आता. कई-कई कुछ समझ नहीं आता, तब ऑटो पर क्लिक करता हूं. मैनुअल में वक्त जाता है और अभी मेरी प्रैक्टिस नहीं. ये जो तस्वीर वायरल हुई है, वो मैंने मोबाइल कैमरे से ली थी. बड़ी देर तक शेर को ऑब्जर्व करता रहा. वो पेड़ के आसपास चक्कर लगा रहा था. मैं समझ गया कि वो ऊपर चढ़ने के मूड में है. मैं वहीं बना रहा और जैसे ही ये हुआ, मैंने तपाक से क्लिक कर दिया. बस 15 सेकंड में सब हो गया.

जंगल के इस रखवाले की पत्नी भी फॉरेस्ट गार्ड हैं. दीपक कहते हैं- वो रात-बेरात कभी भी जंगल में पेट्रोलिंग के लिए निकल जाती है. कोई डर की बात नहीं. जंगल औरत-मर्द का भेद नहीं करता. जंगल की भाषा समझें तो सभी सुरक्षित हैं. और जहां तक जंगली जानवरों का सवाल है, 28 साल हुए उन्हें देखते. जान चुका हूं कि जावनर इंसानों से कहीं ज्यादा इंसान हैं. आदमी अटैक कर देंगे लेकिन जानवर नहीं.

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