#HumanStory: उस पिता की कहानी, जिसके बच्चे रोज़ मौत के साये में स्कूल आते-जाते हैं

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: July 31, 2019, 7:04 PM IST

कश्मीर की वादियों में सेब के बागानों और केसर के खेतों जितने ही पसरे हुए हैं कब्रिस्तान भी. एक पिता आज किसी गमजदा पड़ोसी को तसल्ली देता है तो अगले ही रोज अपने नन्हे बच्चे को दफना रहा होता है. फायरिंग, क्रॉस फायरिंग, एनकाउंटर के बीच मौत का कैलेंडर हर लम्हा फड़फड़ाता रहता है. कश्मीरी पिता के कंधों पर दोहरी जिम्मेदारी है. एक- बच्चे को बाहरी खतरों से बचाने की और दूसरी- उसके नाजुक मन को अंदरुनी जख्मों से बचाए रखने की. पढ़िए, कश्मीर के पुलवामा में रहते एक पिता शाहिद हुसैन खान की कहानी.

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एक आम कश्मीरी बाशिंदे का दर्द, जिसके बच्चे हर लम्हा मौत के खौफ में जीते हैं...

साल 89 की बात है, मैं दसवीं में था. मेरे कितने मुस्लिम दोस्त थे और कितने पंडित, इसका कोई हिसाब नहीं था. दोनों बराबर थे या पंडित ज्यादा ही रहे होंगे. मैं उनके घर जाता. उनके त्यौहारों में शामिल रहता. वो हमारे घर आते. हमारी थालियों से गस्से तोड़ते. घरों के बीच कोई दीवार नहीं थी. रोज सब्जियों, मीठे का लेनदेन चलता. उन दिनों रामायण सीरियल आया करता था. क्या हिंदू- क्या मुस्लिम, सब नहा-धोकर टीवी के सामने बैठ जाते.

हर घर में जैसे कर्फ्यू लग जाता था. कामकाज तब तक बंद रहता, जब तक सीरियल खत्म न हो जाए.

फास्ट फॉरवर्ड टू 2019- मेरी दो बेटियां हैं. घर के बाजू में ही बस स्टॉप है लेकिन मैं और मेरी बीवी रोज साथ जाते हैं. विदा कहते हुए भीतर से डरे रहते हैं कि कहीं ये आखिरी विदा न हो. बार-बार ताकीद करते हैं कि स्कूल में ठीक से रहना. दोपहर के तीन बजे उनके लौटने का वक्त होता है. बच्चों की मां पहले ही वहां पहुंच चुकी होती है. इस बीच खैरियत के लिए मैं कई दफे घर फोन कर चुका होता हूं. घर लौटते ही दरवाजा भीतर से बंद हो जाता है. अब वो तभी खुलेगा जब मैं पहुंच जाऊं.

उनके स्कूल से लौटते ही शुरू होती है 'जहर खत्म करने की कवायद'.

कश्मीरी मां-बाप बच्चों के लौटने पर उनका टिफिन नहीं देखते, न होमवर्क पूछते हैं. पहला सवाल होता है- दिन कैसा रहा? अक्सर इस निहायत मासूम से लगने वाले सवाल के जवाब में खौफनाक कहानियां सामने आती हैं. एक बार 6 साल की बेटी ने रोते हुए बताया कि उसके किसी दोस्त का चेहरा पैलेट (कश्मीरी बच्चों की इस शब्द से जान-पहचान है) से छिद गया है. किसी रोज सुनता हूं कि किसी की आंखें चली गईं तो किसी का भाई-बहन या पिता.

स्कूल के लिए बच्चों को विदा कहते हुए डरे रहते हैं कि कहीं ये आखिरी विदा न हो. (सांकेतिक तस्वीर)

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स्कूल में कई ऐसे बच्चे हैं, जिनके चेहरों पर पैलेट्स के गहरे निशान हैं. देख-देखकर बाकी बच्चे भी डरे रहते हैं. एक बार मेरी बेटी ने पूछा- डैडी, किसी दिन हमारे चेहरे पर भी ऐसे दाग हो सकते हैं क्या? मैं होमवर्क करा रहा था. मैथ्स का एकदम आसान सवाल. लेकिन मैं काफी देर तक गुम रहा.

कभी दो कश्मीरी बच्चों को बात करता सुनें तो सदमे में आ जाएंगे. जबान पूरी तरह से साफ नहीं है. आवाज में तुतलाहट है लेकिन वे घंटाभर भी बात कर लें तो आप एनकाउंटर, फायरिंग, क्रॉस फायर, हिंदुस्तान, पाकिस्तान, जेहाद, पैलेट्स और फ्रीडम जैसे कई शब्द सुन सकते हैं. पता नहीं कहां से ये शब्द चले आए और बच्चों की जिंदगी में घुसपैठ कर ली. बताते हुए शाहिद की आवाज में तल्खी और तकलीफ साथ-साथ चली आती है.

थोड़ा रुककर वो दोबारा बताते हैं- हमारे यहां देश-विदेश से टूरिस्ट आते हैं. डल झील घूमते हैं. चिनार और देवदार देखते हैं. कश्मीरी फिरन पहनकर तस्वीरें खिंचाते हैं. वहीं हमारे बच्चे घरों में कैद हैं. जहन में डर इस कदर बैठा हुआ है कि तकरीबन 90 फीसदी बच्चे वही खेल खेलते हैं, जिसमें बाहर न जाना पड़े. अगर कभी किसी ने बाहर खेलने की जिद पकड़ ही ली तो उसके साथ कोई बड़ा जाता है. कभी अपने बचपन से उनके बचपन को मिलाता हूं तो दिल बैठ जाता है.

हम स्कूल से लौटकर कभी जंगल की तरफ चले जाते तो कभी बागों में सेब खाते दोपहरियां बिताया करते. अब वो अव्वल तो बाहर नहीं जाते और जाते भी हैं- तो लौटकर आ सकेंगे या नहीं, इसका ठिकाना नहीं होता.

कश्मीर में सैलानी तो आते हैं लेकिन स्थानीय लोग घरों में कैद रहते हैं (सांकेतिक तस्वीर)


आसान नहीं है वो पिता होना, जिसका बच्चा इस दुनिया में नहीं है.

यहां कमोबेश हर पांचवा घर अपनी एक न एक औलाद खो चुका है. ऐसे माहौल में बच्चों को सिर्फ बाहरी डर से बचाना ही काफी नहीं. उन्हें अंदरुनी जख्मों से बचाए रखने की कोशिश भी करनी होती है. पिछले 5 सालों से मैं थोड़े पैसे बचाकर साल में एक बार उन्हें कश्मीर से बाहर ले जा रहा हूं. राजस्थान, हिमाचल, पंजाब के शहरों से लेकर दिल्ली, मुंबई, कोलकाता भी घूम चुके हैं. बाहर जाते हैं तो बच्चों को एकदम खुला छोड़ देते हैं. वे जितना चाहें खेलें, कोई गोली उनके चेहरे या आंखों या सीने को नहीं छेदेगी. कोशिश करता हूं कि मेरी बेटियां दूसरे शहरों के बच्चों से घुलें-मिलें. पहले वो शर्माया करती थीं. अब खुलने लगी हैं. बाहर जाती हैं तो अपनी मर्जी के कपड़े खरीदती हैं. वे अगली छुट्टियों में दूसरे किसी शहर के लिए सहेजकर रखे जाते हैं.

साल के इन थोड़े से दिनों में भी हम अपनी पहचान पर लगे दाग साथ लिए चलते हैं. इस बार घूमने गया तो पुलवामा का बाशिंदा होने की वजह से जिल्लत झेलनी पड़ी.

पिछले महीने अमृतसर गए थे. वहां होटल में चेक-इन के लिए अपना ID कार्ड निकाला तो रिसेप्शन पर खड़ा शख्स ठिठक गया. फिर होटल मैनेजर पहुंचा. उसने भी कार्ड देखा. उलटने-पलटने के बाद हमें इंतजार करने को कहा. वो होटल मालिक से फोन पर बात कर रहा था. आवाज वेटिंग एरिया तक साफ आ रही है. वो पुलवामा-पुलवामा दोहरा रहा था. फिर एक सवाल पर उसने बताया- फैमिली है, दो छोटी लड़कियों के साथ. तब शायद फोन के दूसरी तरफ के शख्स को तसल्ली हो सकी. लगभग आधे घंटे के इंतजार के बाद हमें कमरा मिला.

बच्चों का डर मिटाने के लिए ये पिता उन्हें कश्मीर से बाहर घुमाता है (सांकेतिक तस्वीर)


लौटने पर अपने घर का आराम तो होता है लेकिन सुकून चला जाता है.

पिछले दिनों आसपास कोई जलसा था. लड़के आतिशबाजी करने लगे. हमारे यहां वैसे आतिशबाजी की मनाही है लेकिन शरारत में बच्चे कर जाते हैं. आवाज सुनकर पूरा आसपास सहम गया. धड़ाधड़ घरों की बत्तियां बंद हो गईं. हमारा घर भी घुप्प अंधेरे में चला गया. हमें लगा कि आसपास कोई मुठभेड़ हो रही है. उस रोज छोटी बेटी की पसंद का खाना बना था लेकिन वो गोद में चुपचाप पड़ी रही और बिना खाए ही सो गई. जब तक माजरा समझ आया, तब तक काफी रात हो चुकी थी.

'आप लोग अपने बच्चों को कहानियां सुनाते हैं?' इंटरव्यू देते शाहिद के यकबयक सवाल पर मैं चुप हो जाती हूं. फिर वे खुद ही कहते हैं- कश्मीरी बच्चे सोते हुए कहानियां नहीं सुनते. वे दरवाजे चेक करने को कहते हैं ताकि रात-बेरात कोई जबरन भीतर न आ जाए. नोट: (सुरक्षा वजहों से नाम और चेहरा बदल दिया गया है.)

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First published: June 27, 2019, 10:10 AM IST
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