#HumanStory: 'किडनी डोनेट करने को कहो तो लोग जल्लाद बुलाते हैं, मारने दौड़ते हैं'

हमारा काम है अस्पताल में अनजान चेहरों से मिलकर उन्हें 'कनविंस' करना. इस बात पर कि वो 'लगभग' मर चुके अपने सबसे अजीज शख्स का अंगदान कर दें. लोग रोना भूलकर गुस्से में गालियां देने लगते हैं. मारने दौड़ पड़ते हैं. पढ़िए, सूरत में ऑर्गन डोनेशन संस्था से जुड़े शख्स निलेश मांडलेवाला की कहानी...

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 28, 2019, 4:30 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 28, 2019, 4:30 PM IST
अंगदान यानी ऑर्गन डोनेशन के लिए राजी करना आसान नहीं. लोग ऐसी नजरों से देखते हैं मानो आप मरते हुए शख्स को वक्त से पहले मार रहे हो.

अस्पताल से कॉल आया, हम पहुंचे तो देखा कि उस प्राइवेट कमरे में मातम छाया हुआ था. घर के इकलौते लड़के के सिर पर गहरी चोट थी. दूर से डॉक्टर ने बताया- 'ब्रेन डेड है. बस, कुछ घंटे या ज्यादा से ज्यादा एक दिन!' मैं भीतर गया. ये पहला मामला था, जब किसी को ऑर्गन डोनेशन के लिए राजी करना था. भीतर सिर्फ सिसकियों और सुबकियों की आवाज थी. जैसे-तैसे खुद को संभाला. अपना परिचय दिया और तसल्ली देने के बाद मकसद बताया. वक्त जैसे 'फ्रीज' हो गया हो.

ध्यान टूटा जब रोते हुए कई चेहरे बेसाख्ता चीखने और कोसने लगे. एक आवाज आई, 'एकदम ही जल्लाद हो क्या तुम!' मैं चुपचाप बाहर आ गया. देर तक वही आवाज कानों में गूंजती रही.

शुरुआत आसान नहीं थी. साल 1997 की बात है. पापा की दोनों किडनियां खराब हो चुकी थीं. डायलिसिस के लिए आए दिन अस्पताल के चक्कर लगते. मैं वेटिंग हॉल में इंतजार करता और आसपास के लोगों की बातें सुनता. कोई रिक्शेवाला था, कोई दिहाड़ी मजदूर. कोई-कोई हमारी तरह साधन संपन्न भी था. हफ्ते में 2 से 3 बार वही-वही चेहरे दिखते. महीनेभर का खर्च 15 से लेकर 40 हजार तक. जो खोंचे (पैबंद) लगे कपड़ों और टूटहर चप्पल के साथ अस्पताल आते हैं, वो हर महीने इतने पैसे कैसे जुटाते होंगे! दिल में मदद का जज्बा तो था, लेकिन कोई रास्ता नहीं सूझता था. व्यापारी लोग हैं, सो घर लौटकर फिर से रुटीन में लग जाता.



वक्त के साथ चेहरों से पहचान पक्की होने लगी. हफ्ते के वो 2 दिन पूरे हफ्ते याद रहने लगे.

कोई-कोई चेहरा इस कदर झकझोरता कि काम के सिलसिले में मिलनेवालों से भी जिक्र करता. कोई सुनता. कोई बहुत गौर से सुनता. मदद का भी हाथ बढ़ाता. कड़ियां मिलती गईं और मैंने हेल्थ पर अवेयरनेस प्रोग्राम्स में आना-जाना शुरू किया. फिर एक दिन शुरुआत हुई असल मिशन की यानी ऑर्गन डोनेशन के लिए लोगों को राजी करने की. हालांकि जितनी लगती है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल प्रोसेस है ये. एक तो हम ऐसे माहौल में पहुंचते हैं, जहां सिर्फ आंसू और तकलीफें होती हैं. उस पर हम उन्हें ऑर्गन डोनेशन के लिए मनाते हैं.
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खुले शब्दों में कहूं तो सामने जो साबुत शरीर पड़ा है, उसे काटने-छांटने की इजाजत मांगते हैं.

पहली बार किसी परिवार से इन हालातों में मिलना और हां करवाना आसान नहीं. परिवार दोहरे सदमे में चला जाता है. ज्यादातर लोग कई बार काउंसलिंग के बाद राजी होते हैं. कुछ लोग मना भी कर देते हैं. हम दोनों ही हालातों के लिए तैयार रहते हैं.

बहुतों को ऑर्गन डोनेशन पाप लगता है. कईयों ने मना कर दिया क्योंकि उन्हें यकीन था कि अंगदान के बाद अगले जन्म में उनकी आंखें नहीं होंगी या फिर किडनी, हार्ट या लिवर नहीं होगा. उन्हें कनविंस करने के लिए मैंने नया तरीका खोजा. बड़े ध्यान से हिंदू माइथोलॉजी पढ़ी. फिर समझाना शुरू किया कि गणेश जी को ट्रांसप्लांट के जरिए ही जिंदगी मिली थी. जब मरने वाले के शरीर से सारे गहने उतार लिए जाते हैं तो फिर उनके कीमती अंग क्यों नहीं!

गहनों से सिर्फ खूबसूरती मिलती है, ऑर्गन डोनेशन से जिंदगी मिलती है. धीरे-धीरे लोग समझने लगे. 15 साल हुए लेकिन अब भी जब अस्पताल से फोन आता है, हम खुद को दोबारा पक्का करते हैं.



सालों से ऑर्गन डोनेशन को मिशन बना चुके निलेश के पास किस्से-कहानियों की भरमार है. वे याद करते हैं- एक बार एक मुस्लिम लड़के को एक हिंदू लड़के का दिल लगा. सर्जरी के कुछ महीनों बाद मेरे पास फोन आया. लड़का अपने डोनर के घरवालों से मिलना चाहता था. मैं खुद उसे हिंदू लड़के के गांव लेकर गया. छोटा-सा गांव. हमारे पहुंचते ही पूरा गांव उससे मिलने के लिए जमा हो गया.

परिवार उस लड़के को अपने बेटे की तरह सीने से लगा रहा था. वो सख्तजान लड़का खुद रो पड़ा, जैसे सालों बाद अपने घरवालों से मिला हो.

ऑर्गन डोनेशन के लिए कनविंस करना कई बार काफी मुश्किल हो जाता है. हम खुद रो पड़ते हैं. ऐसा एक मौका मैं भूल नहीं पाता. दो साल पहले की बात है. अस्पताल से फोन आया कि एक 14 महीने का बच्चा ब्रेन डेड है. मैं पहुंचा तब शाम के 6 बजे होंगे. संभलकर कमरे में घुसा. देखा, तो दिल बैठ गया.

बड़े से कमरे में लंबे-चौड़े सफेद बिस्तर पर एकदम-सा नन्हा शरीर सोया हुआ था. तमाम शरीर पर नलियां ही नलियां. मैंने पिता के कंधे पर हाथ रखा. वो फफक पड़े. ऐसे मौकों पर पहचान की अहमियत खत्म हो जाती है. न उन्होंने नाम पूछा और न मैंने कुछ कहा. थोड़ी देर बाद जब पिता संभला तो मैंने आने का मकसद बताया. अब भी याद है. पिता की रोकर थक चुकी आंखों में एकदम से गुस्सा आया लेकिन फिर वो चीखने या मारने की बजाए दोबारा टूटकर रो पड़ा.

चंद लम्हों बाद संभलते हुए कहा- मेरा बेटा जिंदा है. उसका दिल धड़क रहा है. वो ठीक हो जाएगा. आप जाएं!

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First published: June 28, 2019, 5:37 AM IST
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