#HumanStory: दास्तां स्पर्म डोनर की- ‘जेबखर्च के लिए की शुरुआत, बच्चे देखकर सोचता हूं, क्या मेरे होंगे ये?’

स्पर्म डोनेशन ब्लड डोनेशन से थोड़ा अलग है. फेसबुक पर प्राउड स्पर्म डोनर की तस्वीर शायद ही कहीं मिले. कई डर भी हर वक्त उनका पीछा करते हैं. जानिए, क्या चलता है एक स्पर्म डोनर के जे़हन में.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: July 9, 2019, 2:43 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: July 9, 2019, 2:43 PM IST
अब तक 100 से भी ज्यादा बार स्पर्म डोनेट कर चुका हूं. पहले डायरी में दिन, वक्त नोट किया करता. अब हिसाब नहीं रखता. पॉकेटमनी के लिए शुरुआत की थी. सोचता हूं तो अजीब लगता है. इस वक्त शायद देश के हर कोने में मेरे शरीर के कई हिस्से रहते होंगे!

साल 2014. कॉलेज में था. एक रोज अपने कुछ दोस्तों को आपस में खुसुर-पुसुर करते देखा. मेरे पहुंचते ही बात बंद हो गई. मैंने कुरेदा लेकिन किसी ने कुछ नहीं कहा. बाद में एक खास दोस्त ने बताया- हम स्पर्म डोनेट करने जा रहे हैं. मैं चिंहुक गया. मोबाइल पर फिल्में देखना और हंसी-मजाक तक तो ठीक है लेकिन स्पर्म डोनेशन! मैं उसे समझा रहा था और वो मुझे.



दो महीने बाद मैं स्पर्म बैंक में था. AC रिसेप्शन पर पसीने-पसीने होते हुए.

थोड़ी देर बाद अंदर बुलाया गया. समझाया गया. इस बार मुझे सिर्फ सैंपल देना था. वो जांच करेंगे और क्वालिटी दिखे, तभी बात आगे बढ़ेगी. अगली बार HIV और हेपेटाइटिस के टेस्ट होंगे. इसके बाद भी सब सही आया तब मुझे एक डोनर कार्ड मिलेगा. स्पर्म बैंक में यही डोनर कार्ड मेरी पहचान होगी.

डॉक्टर (स्पर्म बैंक मैनेजर) समझा रहे थे और मैं सुन रहा था. बात खत्म होने पर उन्होंने कंधे पर हल्की थपकी दी. मानो आश्वस्त किया हो- इसमें डर जैसी कोई बात नहीं. मैंने हां में सिर हिला दिया. दरअसल मैं रास्ता तलाश रहा था कि किसी भी तरह यहां से बच निकलूं. 5 मिनट बाद मैंने खुद को कलेक्शन रूम में पाया.

कमरे में अंग्रेजी-हिंदी मैगजीन्स थीं. ये वो मैगजीन्स थीं जिन्हें अब से पहले मैंने हाथ भी नहीं लगाया था. कुछ पिक्चर्स भी थे. मैं अकेला था, हाथ में एक खाली सैंपल बैग के साथ.

स्पर्म बैंक में डोनर कार्ड मेरी पहचान बन गया (प्रतीकात्मक फोटो)

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अगले कुछ मिनटों में मेरी तकदीर का फैसला होने जा रहा था.

मैं उस दोस्त को कोसने लगा, जिसने पॉकेटमनी के लिए ये रास्ता सुझाया. खुद को कोसने लगा कि क्यों यहां से निकल नहीं भागा. लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था. एक सैंपल मेरा भविष्य तय करने जा रहा था.

थोड़ी देर बाद बाहर निकला. बैग थमाया और तेजी से बाहर भागा. उसके बाद के कई दिन सोचते बीते. क्या होगा अगर कोई कॉल नहीं आया! क्या इसका मतलब ये है कि मैं आगे चलकर पिता नहीं बन सकूंगा! या फिर- अगर मुझे कोई बीमारी निकली तो! बोर्ड के रिजल्ट के इंतजार में भी इतना डर नहीं था. पहली बार प्यार किया तो भी इतनी इतनी बेसब्री नहीं थी. आखिरकार फोन आया. मुझे अगली विजिट के लिए बुलाया गया था.

अब बाकी सारे डर खत्म हो चुके थे. जो डर था, वो ये कि इतनी बड़ी बात अपने घरवालों से कैसे छिपाई जाए.

पापा सरकारी नौकरी में थे. दिल्ली के जामिया नगर में परिवार रहता. वहीं कॉलेज में मेरे तमाम यार-दोस्त थे. छींक भी आए तो किसी न किसी तक आवाज पहुंच जाती. ऐसे में स्पर्म डोनेशन जैसी बात कैसे छिपाई जाए. हम दोस्तों ने मिलकर गोष्ठी की. मैं सबसे नया था, लिहाजा सबने मेरी मदद की. सारी बात दोबारा-तिबारा समझाई गई. कॉलेज में मेरी गैरमौजूदगी में सब संभाल लेने का भरोसा दिया.

मैं ऐसे मुस्तैद था मानो किसी सीक्रेट मिशन पर हूं (प्रतीकात्मक फोटो)


जिस दिन पहले कलेक्शन के लिए स्पर्म बैंक जाना था, मैं ऐसे मुस्तैद था मानो किसी सीक्रेट मिशन पर हूं.

ठीक वक्त पर पहुंचा. सारे टेस्ट करवाए. कुछ दिनों बाद मेरे पास एक डोनर कार्ड था. मैं ऑन-कॉल स्पर्म डोनर बन चुका था. नया होने के बावजूद अपने दोस्तों में सबसे ज्यादा ओहदेदार. वक्त-वक्त पर कॉल आता और मैं वहां पहुंच जाता. अब स्पर्म बैंक के उस ठंडे कमरे, उन मैगजीन्स और तस्वीरों से मेरी जान-पहचान हो चुकी थी. कई बार बड़े दिलचस्प वाकये भी पेश आते. एक बार मैं पहुंचा तो देखा कि रिसेप्शन पर एक लड़का इंतजार कर रहा है. वैसे ही पसीने-पसीने होते हुए. मुझे देखते ही इधर-उधर देखने लगा.

मैं अब 'पुराना खिलाड़ी' था. चश्मा और हेड-बैंड लगाया हुआ था. माथा आधा ढंका. आंखें पूरी ढंकी हुई. ऐसे में एक बार देखकर दोबारा पहचाने जाने का खतरा कम था. बाद में गौर किया कि पहचान छिपाने की कोशिश करने वाला मैं अकेला नहीं, कई लड़के इसी तरह से आते हैं.

पॉकेटमनी के लिए स्पर्म डोनर बना. धीरे-धीरे आदत हो गई लेकिन घरवालों को आज तक नहीं बता सका. बताने पर उनका रिएक्शन कैसा होगा- इसका थोड़ा-बहुत अंदाजा है. हमउम्र दोस्त भी मेरा और मेरे जैसे लड़कों का मजाक बनाते हैं. एक ने एक दफे कहा- शादी होगी, तब देखना. ये जो पूरी दुनिया को बच्चा दे रहे हो, खुद की औलाद नहीं होगी. उस रोज मैं काफी देर तक सन्न रहा. रात देर तक इंटरनेट पर पढ़ते बीता. कुछ दिनों बाद मैं फिर से स्पर्म बैंक में था.

शुरुआत में लगभग हर हफ्ते जाया करता. तब 5 दिनों तक एहतियात बरतनी होती. एहतियात यानी! रोहित (नाम बदला हुआ) थोड़ा रुक-रुककर समझाते हैं- शराब नहीं, स्मोकिंग नहीं, फिजिकली इंटिमेट नहीं होना. ऐसा करने पर वॉल्यूम कम हो जाता है यानी सैंपल खराब चला जाएगा.

फोन आया और आपने हां की तो पांच दिनों तक इंतजार करना ही होगा. अब मैं कुछ सौ रुपयों के लिए नहीं, एक अनदेखे 'कपल' के लिए ये काम करने लगा था.

स्पर्म डोनर पर पहचान छिपाए रखने का दबाव होता है (प्रतीकात्मक फोटो)


कॉलेज छूटा. बैंक में नौकरी मिली. एक साल पहले शादी भी हो गई. अब भी डोनेट करता हूं लेकिन बहुत कम. ऐसे जाता हूं कि बीवी को भनक न लगे. उसे पता चल जाएगा तो शायद शादी ही टूट जाए. डरता हूं लेकिन फोन आ जाए तो मना नहीं कर पाता. 5 साल पहले मिला वो डोनर नंबर मेरी पहचान से भी बड़ा हो गया है. शुरुआत में जाता तो लौटकर सबसे पहला काम डायरी में लिखना था. तारीख लिखता ताकि याद रहे. फिर अक्सर जाने लगा. डायरी पीछे रह गई. अब दिल्ली छोड़ सोनीपत में रहता हूं. डायरी कहां है, याद नहीं.

अब तक 100 से भी ज्यादा बार स्पर्म डोनेट कर चुका हूं. अगर उनमें से आधे भी कामयाब हुए हों तो मैं कम से कम 50 बच्चों का पिता हूं.

किसी की आंखें मेरी तरह होंगी. किसी के बाल मेरे जैसे होंगे. कोई मेरी तरह चलता होगा तो कोई मेरे जैसा तुनकमिजाज होगा. बैंक में कंप्यूटर के पीछे बैठे हुए कई बार उनका ख्याल आता है. वे बच्चे जिन्हें मैं जानता तक नहीं. जो मुझसे कभी नहीं मिलेंगे.

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