#HumanStory: सरकारी अस्पताल के डॉक्टर की आपबीती, 'मरीज का परिवार रिवॉल्वर लहराते भी आया है'

अस्पताल पहुंचने के बाद आपके सामने कुछ भी आ सकता है. खासकर इमरजेंसी वार्ड में ड्यूटी हो तो हाथों के हुनर से ज्यादा दिल की मजबूती चाहिए. खून से लथपथ इंसान, टुकड़ों में कटी लोथ, धीमी पड़ती सांसों वाला नन्हा सीना- स्ट्रेचर पर कुछ भी हो सकता है. ऐसे माहौल में भी कई लोग पिस्टल खोंसे आ जाते हैं. वे चाहते हैं कि लगभग तंदुरुस्त दिख रहा उनका मरीज पहले देखा जाए. ओपीडी में भी कमोबेश यही हालात हैं. यहां भी मरीज का डॉक्टर से सिर्फ शिकायत का रिश्ता है.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 20, 2019, 2:57 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 20, 2019, 2:57 PM IST
AIIMS, दिल्ली में रेजिडेंट डॉक्टर रह चुके डॉ. हरजीत सिंह भट्टी अस्पताल का एक दिन बांटते हुए कहते हैं- यहां हर दिन बदलता रहता है. आप न आदत डाल सकते हैं और न तैयार हो सकते हैं. 

ये वाकया आज से 7 साल पहले का है. मैं ड्यूटी पर था. काफी सीरियस मामला आया हुआ था. तभी धड़धड़ाते हुए एक साथ कई लोग घुसे. उनकी जींस से रिवॉल्वर झांक रहा था. मैं कुछ भी कहता, उससे पहले बोल उठे- डॉक्टर, पहले हमारे 'आदमी' को देख लें. झुंड से निकलकर मरीज सामने आया. निहायत हट्टे-कट्टे उस मरीज के पेट में दर्द था. अब मौत से जूझ रहे मरीज को छोड़कर मुझे पेट दर्द का इलाज करना था. उसे देखते हुए मैं पूरे वक्त बगल में पड़े उस मरीज के लिए दुआ करता रहा, जिसे सचमुच मेरी जरूरत थी. इमरजेंसी वार्ड में ऐसे वाकये आए-दिन होते रहते हैं.

वैसे तो वार्ड में सेफ्टी के लिए गार्ड तैनात होते हैं लेकिन उनमें से ज्यादातर या तो रिटायरमेंट की उम्र में होते हैं या उसे भी पार कर चुके होते हैं. वर्दी के अलावा उनके पास कुछ ऐसा नहीं होता, जो उन्हें किसी बूढ़े मरीज से अलग दिखाए.

ओपीडी के हाल इससे अलग नहीं होते. एम्स ओपीडी में दिनभर में 'केवल' 90 मरीज देखने होते हैं. दूसरे सरकारी अस्पताल में ये नंबर 300 पार कर जाता है. एक या दो डॉक्टर हर मरीज की बीमारी सुनते, समझते और दवा या टेस्ट लिखते हैं. इस बीच उन्हें मरीजों और उनके तीमारदारों का गुस्सा भी झेलना होता है.



सबसे ज्यादा मुश्किल नंबर को लेकर होती है. कार्ड जमा हो जाने के बाद कमरे के बाहर खड़े मरीज नहीं जानते हैं कि उनका कार्ड कितने नीचे या कितने ऊपर है.

किसका नंबर कब आएगा ये किसी को नहीं पता होता. इसलिए सब के सब दरवाजे पर झुंड बनाकर खड़े हो जाते हैं. कई मरीज कमरे के भीतर भी बैठ जाते हैं. किसी मरीज को देख ही रहे होते हैं कि कोई सिर पर खड़ा हो जाता है. आपने इससे पहले उसे क्यों देख लिया. वो हमारे बाद आया था. मरीजों के साथ आए लोग पहले आपस में उलझते हैं, फिर हमें धमकियां देने लगते हैं.
ये हादसे रोज और कई-कई बार होते हैं. तब मेरी सीलमपुर के पास एक सरकारी अस्पताल में ड्यूटी हुआ करती थी. उस रोज लगभग 300 मरीज ओपीडी में थे. बहुत सारे बुजुर्ग भी थे. तभी युवकों की एक टोली आई और मुझसे अपनी मां को देखने को कहने लगी. वो लोग बार-बार अंदर-बाहर कर रहे थे. मामला सीरियस न हो, ये सोचकर बाहर आया तो देखा कि उनकी मां ठीक-ठाक लग रही थीं. कुर्सी पर बैठी हुई फोन पर बात कर रही थीं. मैंने उन्हें इंतजार करने को कहा लेकिन वे भड़क गए. इंसानियत की दुहाई देने से शुरू उनकी बात गाली-गुफ्तार तक चली गई. उनसे उलझूं या मरीज देखूं!

एक को अनसुना किए बिना दूसरे का इलाज मुमकिन नहीं. कई बार लोग दवा को लेकर झगड़ पड़ते हैं कि फलां बीमारी में तो फलां को ये दवा दी गई थी. अब वो क्यों दे रहे हैं.



सफेद कोट पहन लिया तो तकलीफ भुलाकर काम करना होता है. कुछ वक्त पहले मां को कैंसर डायग्नोस हुआ. उसकी सर्जरी, कीमो और रेडियोथेरेपी के दौरान मैं भी ड्यूटी करता था.

एक बार मां को ब्लीडिंग होने लगी. वक्त कम था. मैं गद्दे समेत मां को लेकर अस्पताल भागा. एम्स में सर्जरी हुई. बाद में मां को आरएमएल ले गया. वहां अटेंडेंट के लिए जगह न होने के कारण फर्श पर सोया करता. तब भी ड्यूटी नहीं छोड़ सकता था इसलिए दिन की शिफ्ट लेता था और रात को वहां रहता था. मां 60 पार कर चुकी हैं. बीमार हैं. साथ रहती हैं लेकिन वक्त नहीं दे पाता. सुबह 7 बजे घर छोड़ता हूं तो रात 12 से पहले कभी नहीं पहुंच पाता.

मलाल के साथ डॉ हरजीत कहते हैं- जब मां पंजाब में थी और मैं यहां था, तब भी हम आपस में उतनी ही बात करते थे, जितनी अभी साथ रहने पर.

बाहर बैठे लोगों को अंदाजा भी नहीं कि डॉक्टर किन तकलीफों से गुजरते हैं. रोज किसी न किसी जानलेवा बीमारी का खतरा मंडराता रहता है. खासकर इमरजेंसी में आने वाले मामलों में इतना भी वक्त नहीं होता है कि इलाज से पहले ये पक्का कर सकें कि मरीज को एड्स या हेपेटाइटिस जैसी बीमारी तो नहीं. डॉक्टरों को टीबी होना आम है. मेरे कई साथी डॉक्टरों को इलाज के दौरान ये बीमारी लग गई. अगर नौकरी शुरू हुए 6 महीने नहीं हुए हैं तो छुट्टी भी नहीं मिलती है. तब दवा खाते हुए ही रोज ड्यूटी करनी होती है.



डॉक्टर होने के साथ इंसान भी हैं. मरीजों का गुस्सा भी समझते हैं. मरीज और उसके तीमारदार हजारों किलोमीटर दूर से इलाज की आस में आते हैं. कई दिनों तक सरकारी अस्पताल के आगे सोते-जागते हैं, तब जाकर ओपीडी में नंबर आता है. इसके बाद टेस्ट शुरू होते हैं और फिर कोई सर्जरी होनी हो तो डेट मिलती है- चार-पांच साल बाद की. ऐसे में उनका गुस्सा जायज है. लेकिन हमें मारते या गालियां देते हुए वे यह नहीं जानते होते कि सरकारी अस्पतालों और खासकर एम्स में दिन से रात तक लगातार सर्जरियां होती रहती हैं.

बीते साल एम्स ने 1.94 लाख सर्जरियां कीं. ये दुनियाभर के सभी अस्पतालों में सबसे ज्यादा हैं. ओपीडी, इमरजेंसी और ओटी में सारे-सारे दिन और रात काम के बाद भी 'पेशेंट लोड' इतना ज्यादा है कि सबका इलाज मुमकिन नहीं. 

इधर हजारों किलोमीटर दूर से मरीज लेकर आया परिवार इतनी दूरी तय करने तक हमें भगवान मान चुका होता है. ऐसे में जरा-सी चूक पर वो भड़क जाते हैं. हाथापाई करने लगते हैं. वे भूल जाते हैं कि डॉक्टर के साथ-साथ हम भी आखिरकार इंसान हैं. हमें भी तकलीफ होती है. हर हादसे के बाद रात को नींद नहीं आती. आंखें बंद हों तो किसी की आखिरी कराह झकझोरकर उठा देती है. इंतजार कर रहे मरीजों को देख सकें इसलिए निवाले भी गिनकर खाते हैं.

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