#HumanStory: कहानी एक नर्स की- 'मरीज़ ग़ुस्से में थूक देते हैं, तीमारदार गाली-गलौज करते हैं'

हम ज़िंदगी और मौत से 'डील' करते हैं और उन सब चीज़ों से, जो इनके बीच शामिल हैं. यानी मौत से ज़िंदगी की जद्दोजहद. अपने सामने उस मरीज़ को दम तोड़ते देखते हैं, जिसे बचाने के लिए दिनों-महीनों बिताए थे. मौत वो शै है, जिससे आप कभी उबर नहीं सकते, खासकर जब वो मासूम बच्चे की हो या जवान चेहरे की. मौत के 'दर्द' के साथ हमें उसकी 'जिम्मेदारी' भी सहनी होती है.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 24, 2019, 5:55 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 24, 2019, 5:55 PM IST
नर्सिंग के पेशे को 14 साल दे चुके AIIMS नर्सेज यूनियन के अध्यक्ष हरीश काजला कहते हैं- मरीज मुंह पर उल्टी कर देते हैं. गुस्से में थूक देते हैं. तीमारदार गाली-गलौज करते हैं. तकलीफ तो होती है, लेकिन तब भी उनकी सेहत हमारा मकसद है.

सालभर पहले की बात होगी. एक मरीज की सर्जरी दो बार टल गई. पहली बार वो ऑपरेशन के लिए फिट नहीं था. दूसरी दफे ऑपरेशन थिएटर में जगह नहीं थी. वो सर्जरी का इंतजार कर रहा था. जैसे ही उसने मामला जाना, बिस्तर से उठ खड़ा हुआ. उसे लगा कि इस देर के लिए मैं जिम्मेदार हूं. गाली देकर बोला- ये तुम ही कर रहे हो. ये बोलकर वो भागने लगा.

एक बार मरीज अस्पताल में भर्ती हो जाएं तो हमारी 'कस्टडी' में आ जाते हैं. वे बिना कागजी कार्रवाई के बाहर नहीं जा सकते. मैंने उस मरीज को रोकने की कोशिश की तो उसने मुझे जोरदार धक्का दिया और बाहर भागा. भागते हुए वो लगातार गालियां दे रहा था. कोस रहा था. गालियां सुनना नर्स के लिए नई बात नहीं, लेकिन तब भी बुरा तो लगता है.

ज्यादातर मरीजों और उनके 'अटेंडेंट' को हमसे शिकायत होती है. सबको लगता है, उनके साथ गलत हो रहा है. हमारे हिस्से आने वाला गलत सिर्फ हम ही जानते हैं.



इन दिनों मेरी ड्यूटी ऑपेरशन थिएटर में है. यहां वैसे तो ‘फिल्टर’ होकर मरीज आते हैं. यानी ओपीडी या इमरजेंसी की तरह भीड़ नहीं रहती लेकिन गाली-गलौज और धमकियां यहां भी रुटीन का हिस्सा हैं.

सर्जरी से पहले हमें देखना होता है कि मरीज कुछ भी खाए-पिए नहीं. ये प्रोसेस है. अब मान लो, एक दिन में पांच सर्जरियां होनी हैं और एक सर्जरी में किसी वजह से वक्त लग जाए, तब दूसरी सर्जरी लेट हो जाती है. ऐसे मामले में मरीज के अटेंडेंट भड़क जाते हैं. उन्हें लगता है कि उनका मरीज बेवजह भूखा-प्यासा है. कोई-कोई इतना भड़क जाता है कि मरीज को खिला-पिला देता है. यानी सर्जरी की तारीख फिर आगे बढ़ जाती है.
डॉक्टर से तो मरीज का सामना कुछ मिनटों के लिए होता है. उसका काम है मरीज देखना. बीमारी की पहचान और इलाज लिखना. इसके बाद बीमार को सेहतमंद बनाना हमारे हिस्से का काम है. नर्सिंग स्टाफ ही 'पेशेंट डीलिंग' करता है. उसके तीमारदारों की काउंसलिंग भी हमारा काम है. कोई मरीज लंबे वक्त तक भर्ती रहने वाला है तो हम पहले ही मन को तैयार कर लेते हैं. अस्पताल में जितना ज्यादा वक्त बीतेगा, उसकी नाराजगी उतनी बढ़ेगी.

पहली रोज मुस्कुराकर बात करने वाला मरीज और उसके घरवाले थोड़े दिनों बाद हर बात पर भड़कने-कोसने लगते हैं.



हम अस्पताली लोग हैं. मरीज के गुस्से पर शायद ही कभी गुस्सा आता हो. वो बीमार है. तकलीफ में है. उसकी नाराजगी सह लेते हैं. लेकिन तीमारदारों का गुस्सा परेशान करता है. सर्जरी लेट हो तो धमकी. मरीज को दर्द हो तो शिकायत. मरीज सो न सके तो गालियां. बहुत मुमकिन है कि कल को खराब मौसम का इल्जाम भी हमपर लगाया जा सके.

आजकल आए-दिन खबरें आती हैं कि सर्जरी के बाद फलां के पेट से कैंची या रुई या ब्लेड निकला. इस बात की कोई सफाई हमारे पास नहीं. दरअसल ये हमारा हक ही नहीं.

सेहत पाने पहुंचा मरीज हमारी गलती से और भी ज्यादा तकलीफ में चला गया. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. सरकारी अस्पतालों में मरीजों की भीड़ संभाले नहीं संभलती. अस्पताल का तमाम अमला 24 घंटे ड्यूटी करता है. रोज हजारों मरीजों को इलाज मिलता है. अगली रोज उससे भी ज्यादा भीड़ इंतजार में मिलती है. ऑपरेशन थिएटर की बात करें तो वहां एक दिन में कई ऑपरेशन होते हैं.

किस दिन कितने और किनके ऑपरेशन होंगे, ये अगले पांच-छह सालों के लिए तय हो चुका है. हमारी तमाम कोशिशों के बावजूद कई बार 'चूक' हो जाती है.



आवाज में गहरे रंज के साथ खुद को 'सर्विस प्रोवाइडर' मानते हुए हरीश कहते हैं- अब ऑनलाइन पोर्टल हैं. यहां हमारी शिकायत की जा सकती है. चंद हजार रुपयों के लिए दिन के 14 से 16 घंटे ड्यूटी करने वाली नर्स की शिकायत प्रधानमंत्री या हेल्थ मिनिस्टर से की जा सकती है. रोज सैकड़ों-हजारों इलाज होते हैं और उतनी ही शिकायतें होती हैं.

हर इलाज पर एक शिकायत. बीमार को सेहतमंद बनाने के बीच हम क्या तकलीफ सहते हैं, इसकी कहीं कोई सुनवाई नहीं.

जब इस पेशे में आया था, ‘मेल’ नर्स कम थे. तब लोग हमें 'ए- ओ- सुन- इधर आ' इन तरीकों से पुकारते थे. सिस्टर न बोल पाने की झेंप में कोई-कोई मास्टरजी बुलाता. 'नर्सिंग ऑफिसर' की पहचान पाने के लिए हमने लंबी लड़ाई लड़ी. अब कपड़ों पर ओहदा तो है लेकिन लोगों के दिलों में जगह बनाने के लिए लड़ाई बाकी है.

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