#HumanStory: कश्मीर में मजदूरी करता था बिहार का ये युवक, पैलेट गन ने ले ली आंखें

16 साल का मोहम्मद शाहनवाज रोजी की तलाश में बिहार से कश्मीर पहुंचा. खुशगवार मौसम और कश्मीरियों की खुशदिली के बीच एक 'रुटीन' हादसे ने उसकी आंखें छीन लीं.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 6, 2019, 10:18 AM IST
#HumanStory: कश्मीर में मजदूरी करता था बिहार का ये युवक, पैलेट गन ने ले ली आंखें
मोहम्मद शाहनवाज
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: June 6, 2019, 10:18 AM IST
खौफनाक सच के धागों में पिरोई इस कहानी का पुलवामा हमले से कोई ताल्लुक नहीं. इसका ताल्लुक है कश्मीर की वादियों से, जहां कई ताकतें एक अनदेखे जन्नत के लिए आपस में गुत्थमगुत्था हैं. दहशतगर्दी के इस आलम में कश्मीर में कई नजारें आम हैं. जैसे ब्लास्ट, हमले और पत्थरबाजी. एक ऐसे ही आम दिन ने शाहनवाज की जिंदगी बदलकर रख दी.

परिवार के लिए बिहार से कश्मीर की दूरी पाटने वाला ये लड़का अब एकदम गुमसुम है. उसके हिस्से की कहानी कहते हैं उसके बड़े भाई मोहम्मद शाहवाज.



अररिया में दो कमरों का कच्चा-पक्का एक मकान. मकान में पलस्तर या तो हुआ नहीं है या फिर जहां है, वहां से झर रहा है. इसी मकान में सात चेहरों में एक चेहरा है शाहनवाज. कमउम्र से ही घर को संभालने के लिए मजदूरी शुरू कर दी. शहर-शहर घूमने लगा. जहां काम मिल जाए, वहीं कई महीने टिक जाता. लौटता तो पूरे घर के लिए कोई न कोई तोहफा लेकर लौटता. पिछले साल गर्मियों में रोजी कमाने कश्मीर पहुंचा. इस बार दोबारा गया था. बड़े भाई शाहवाज याद करते हैं.



'24 मई की बात है. रोजे पर था. तभी एक फोन आया. दूसरी ओर की आवाज घबराई हुई थी. उसने धीरे-धीरे बताया गया कि मेरे भाई के चेहरे पर पैलेट्स (वो गोलियां जिनसे जान नहीं जाती लेकिन गंभीर जख्म होता है, खासकर आंखों पर लगे तो) लगी हैं. फिर और भी ज्यादा संभलते हुए बताया कि हादसे में उसकी आंखें चली गई हैं.'

मैं घर पर था. दो छोटे-छोटे कमरों के घर में चारों तरफ से घिरा हुआ. फोन रखते ही सवालों का तमंचा तन गया. कौन था? क्या हुआ है?

मैंने रुक-रुककर बताया कि भाई को चोटें आई हैं. कैसे और कितनी- ये नहीं बता सका. अम्मी रोने लगीं. उसे ढांढस दिया कि मामूली चोटें हैं. सब ठीक है. रमजान का महीना. घर में सहरी और इफ्तार के लिए भी कई बार सोचना पड़ता है. ऐसे में कामधाम छोड़कर मुझे तुरंत पुलवामा निकलना था. मांग-मूंगकर पैसों का इंतजाम किया और निकल पड़ा.
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जितना सोचा था, हालात उससे कहीं ज्यादा खराब थे. बोलते हुए शाहवाज की आवाज भर्रा जाती है. भाई का पूरा चेहरा पैलेट्स से जख्मी था. सूजकर एकदम कुप्पा. मेरी आवाज सुनते ही बच्चों की तरह रो पड़ा. माफी मांगने लगा जैसे उससे ही कोई गलती हो गई हो. क्या हुआ. कैसे हुआ. इसकी कोई तफसील नहीं थी.

बहुत देर तक तसल्ली देने पर उसके आंसू थमे. तब जाकर उसने बताया कि शुक्रवार की नमाज के बाद राशन लेने दुकान पर खड़ा था. तभी पत्थरबाजी होने लगी. उसे रोकने के लिए दूसरी ओर से पैलेट गन से हमला हुआ.

चावल-दाल खरीदने के लिए इंतजार करते शाहनवाज को एकाएक कुछ नहीं सूझा. वो ठिठका रहा और फिर अंधाधुंध दौड़ने लगा. तब तक बीसियों पैलेट्स उसके चेहरे और आंखों को जख्मी कर चुके थे. खून में सने चेहरे के साथ वो गिर पड़ा. फिर आसपास के किसी ने उसी के फोन से मुझे फोन मिलाया.



शाहवाज याद करते हैं- पुलवामा हमले के बाद हमने भाई को बार-बार रोका. रोजी कमाने वो कहीं भी जाए लेकिन फिलहाल कश्मीर नहीं. वो जिद करता रहा.

बीते साल भी वो यहां आया था और आते ही कश्मीर की वादियों के प्यार में पड़ गया. गांव लौटने के बाद भी शाहनवाज कश्मीर के मौसम को याद करता और कहता कि वहां घंटों काम करने के बाद भी थकान नहीं होती. वो गर्मियों में कश्मीर लौटने का इंतजार कर रहा था. इस बार भाई के साथ 4 और लड़के आए थे. दो श्रीनगर चले गए थे. बाकी दो कहां हैं, किसी को नहीं पता.

पराई जगह और पराई जबान के बीच कमरे से अस्पताल के चक्कर लगा रहे शाहवाज कहते हैं- पता नहीं, वो देख भी सकेगा या नहीं! यहां के डॉक्टरों ने साफ कह दिया कि उसकी आंखें शायद ही ठीक हों.

'बेजान आंखों में खून जम गया है. वो लगातार रोता रहता है और डरता है कि शायद फिर कभी काम न कर सके.'

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