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#HumanStory: भाड़े पर रोनेवाली की दास्तां- दिनभर रोने के मिलते 50 रुपये

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: October 10, 2019, 1:08 PM IST
#HumanStory: भाड़े पर रोनेवाली की दास्तां- दिनभर रोने के मिलते 50 रुपये
वो औरत- जो चंद रुपयों के बदले अनजान लोगों की मौत पर रोती है (प्रतीकात्मक फोटो)

पहली बार एक 'ठाकुर' की मौत पर रोने का बुलावा आया. बड़ी सी हवेली. खेतों जितना बड़ा आंगन. भीतर दो बावड़ियां. लुगाइयों और मर्दानों के लिए अलग-अलग. चारों ओर हरबिरंगे फूल. औरतें ऐसी मानो संगमरमर को फूंककर जिला (जिंदा) दिया हो. आंखों की वर्जिश ने हवेली आने का मकसद भुला दिया.

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  • Last Updated: October 10, 2019, 1:08 PM IST
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भागवती रुदाली हैं. वो औरत- जो चंद रुपयों के बदले अनजान लोगों की मौत पर रोती है. टूटकर. उसे बहते आंसुओं को पोंछने की परवाह नहीं. वो बिखरे बालों को नहीं समेटती. फर्श पर हाथ पटकते हुए खूब ऊंची, गनगनाती आवाज में वो रोती है. उस शख्स की मौत पर, जिसका नाम तक उसे शायद ही पता हो. पढ़ें, राजस्थान की एक रुदाली की दास्तां...

लंबी-लंबी बरौनियों वाली भागवती की बादामी आंखों में रेत दिखती है. और रेत में बसता पानी.

वे याद करती हैं- 20 साल से भी ज्यादा यही किया. आसपास के गांव-ढाणियों में सब मुझे बुलाते. मेरे रोने में सबसे ज्यादा जुंबिश थी. ऐसे जमकर रोती कि बड़े-बड़े मर्दानों की आंखें भीग जातीं.

'माहौल बन जाता था...!' भागवती की हंसी फोन पार सुनाई पड़ती है. उनकी आवाज रोने और गाने के बीच झूल-सी रही है. बीते वक्त में शायद इसी सुरीले अंदाज में रोते हुए वे गा उठती हों या गाते हुए रो पड़ती हों!

वे बताती हैं- कई बार ऐसा भी हुआ कि किसी के आंसू 'ठहर' जाने पर मुझे खासतौर पर बुलाया गया.

सब उसे रुलाने की कोशिश के बाद थक-हारकर बैठी थीं (प्रतीकात्मक फोटो)


एक बार नई बींदणी का पति चल बसा. सदमे से वो एकदम चुप हो गई. न खाती, न बोलती, न रोती. आंखों की बरौनियां तक हिलना भूल गई थीं. मैं हवेली पहुंची. छोटी-सी उमर की लड़की सिर झुकाए बैठी थी.
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बड़ी-बड़ी आंखें रेगिस्तान के बवंडर के बाद सूनी हो चुकी ढाणियों जैसी.

कल किसी बात पर पति से चुहल करती रही होगी और आज उसे ही खो बैठी. आसपास जनानियों का मजमा लगा था. सबकी-सब उसे रुलाने की कोशिश के बाद थक-हारकर बैठी थीं.

मैं नीचे बैठ गई. मेरा सिर उसके घुटनों के पास था. हाथ पकड़े और देर तक देखती रही. बेटी की उम्र की बच्ची! औरतें राग अलाप रही थीं- 'सुहाग चला गया. अब जीकर बेचारी क्या करेगी'. मैं देर तक बैठी रही. मेरे आंसू ढुलक तो रहे थे लेकिन आवाज खो गई थी. जिसे किस्मत ने चुप बना दिया हो, उसे रुला सकूं, इतनी मेरी ताकत नहीं! मैं वापस लौट आई. ये पहला मौका था, जब भागवती अकेले रोती रही, किसी को रुला नहीं सकी.

बाद के बहुत दिनों तक जब भी मैं रोती, बच्ची का पथरा चुका चेहरा याद आता.

किसी अनजान की मौत पर इतने सारे आंसू कैसे ढुलक आते हैं!

भागवती आंसुओं के बनावटी होने से इनकार करती हैं. कहती हैं- बुलावा आने पर घर जाने से पहले पूरी तैयारी होती है. मरने वाले का नाम पता करते हैं, उसके घर पर कौन-कौन ये पूछते हैं, करीबी रिश्ते पूछते हैं. तब जाकर घर पहुंचते हैं. वहां पर मरने वाले के संबंधियों के बदले में रोते हैं. तब लगता है जैसे अपने ही किसी सगे की मौत पर रो रहे हों. जिस बिरादरी से हूं, उसमें 'बड़े लोगों' का नाम लेने की मनाही है. तब 'सा' लगाकर नाम लेती हूं.

नाम लेने से पहले हवेली के लोगों की इजाजत भी लेनी होती है ताकि बाद में कोई बदमगजी न हो.

वहां रोते जहां से पूरी बिरादरी और गांव हमें देख सके (प्रतीकात्मक फोटो)


कैसी बदमगजी? भागवती बताती हैं- जैसे बख्शीश की जगह गालियां देना. वैसे भी पूरे दिन के 50 रुपये के हिसाब से 13 दिन रोना हो तो 650 रुपये मिल जाते, साथ में दोपहर की रोटियां अलग.

हमें हवेली के भीतरी हिस्से में जाने की इजाजत नहीं. बाहर बरामदे में बैठकर रोते हैं- वहां से जहां से पूरी बिरादरी और गांव हमें देख सके. सिसक-सिसककर रोना शुरू होता है, जो गाने और फिर चीखने-चिल्लाने में बदल जाता है. मरनेवाले के पीछे छूटे रिश्तेदारों का नाम ले-लेकर रोते हैं. बीच-बीच में हाथों से छाती पीटते हुए जमीन पर गिरना भी होता है. जितनी ऊंची आवाज में और जितनी तकलीफ दिखाते हुए रो सके, वो रुदाली उतनी अच्छी मानी जाती है.

शादी में दान-दहेज दिखाते हैं, वैसे ही हमारा रोना भी दिखावे की चीज है. मातम खत्म होने के बाद बातें होती है कि फलां के यहां अच्छी रुदाली आई थी, खूब बढ़िया माहौल बांधा.

भागवती को ये पेशा विरासत में मिला. कहती हैं- मेरी मां, नानी- सब यही करती थीं. हम मिरासी बिरादरी से हैं. पहले नाच-गाना करते. साथ में रुदाली का काम भी करते. बाद में बड़े घरों की औरतों का बाहर आना कम हुआ तो रुदाली का काम बढ़ गया. बड़े घरों की औरतें सबके बीच लाश पर छाती नहीं पीट सकतीं. उनके लिए हम ये करने लगीं.

छोटी थी तो मां के साथ जाया करती. कई औरतों की टोली मिलकर जाती, एक औरत अगुआ होती. बीच में बैठती और सबसे ज्यादा आवाज के साथ रोती. एकाध बार ऐसा भी हुआ कि रोती औरतों को देखकर मुझे हंसी आ गई. मां को बहुत लताड़ मिली.

तब से मां मुझे भूखा ले जाने लगी. जब भूख से पेट कुलबुलाता तो हंसी अपने-आप चली जाती. धीरे-धीरे रोना भी सीख लिया.

लोग हमसे इतना घबराते कि हमारी बस्ती ही गांव के बाहर बसा दी (प्रतीकात्मक फोटो)


रुदालियों की एक खास पोशाक होती. काले कपड़े. शादी-ब्याह या किसी खास मौके के रंगीन कपड़े हमारे पास एक या दो जोड़ा ही होते. रुदालियां मनहूस मानी जाती हैं, उन्हें कोई अपने यहां खुशी के मौके पर नहीं बुलाता. रोने जाते हुए हम काले कपड़े- काली घाघरा -चोली और काली चुनरी ओढ़ते.

ये दुख का रंग है. दुख जितना ही गहरा. इसे ओढ़कर निकलते तो पीछे-पीछे पूरा गांव उमड़ पड़ता. कोई खुशी का काम हो रहा हो तो एकदम से रुक जाता. कहीं रुदाली के दुख की छाया न पड़ जाए.

लोग हमसे इतना घबराते कि हमारी बस्ती ही गांव के बाहर बसा दी. गांव में तभी बुलाहट होती जब गम का कोई मौका हो. भागवती की आवाज उदासी में डूबी हुई है. जैसे आंखों के साथ उनकी आवाज भी रोना सीख गई हो.

छुटपन से मां और उसकी मां को रोते देखा. लोग गाने-नाचने का रियाज करते हैं. हम रोने का रियाज करते.

मां मुझे घर पर भी रोना सिखाती. सिखाते-सिखाते कई बार वो एकदम चुप हो जाती, तभी वो असल में रो रही होती. अपनी किस्मत पर. बिना पति के मां बनने पर. अधपेट- अधसोई रातों पर. लोग बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाते हैं, रुदाली मांएं अपनी बेटियों को रोना सिखाती हैं.

अब कोई हमें नहीं पूछता. हमारी बस्ती सिकुड़ गई है, गांव फैल चुका है.

बीसेक साल पहले आखिरी बार एक हवेली का बुलौआ मिला था. जानती होती कि वो अपने पेशे की आखिरी नुमाइश है तो जी-भरकर रो लेती.

(Interview Coordination- Rohitashwa Meena, Railmagra)

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First published: October 10, 2019, 10:42 AM IST
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