#HumanStory: हां मैं हर रोज बदनाम गलियों में घूमती हूं…

मैं हर रोज उन गलियों में जाती हूं, जहां लोग मेरा भाव लगाते हैं. मुझसे कहते हैं, अरे, चलती है क्‍या? कितना पैसा लेगी? हम उससे ज्‍यादा पैसे दे देंगे....हमें भी अपना बना लो... हम में कांटे लगे हैं क्‍या? इस तरह के हाड़ कंंपा देने वाले शब्‍दों से रोज रूबरू होती हूं.

Nandini Dubey | News18Hindi
Updated: January 14, 2019, 3:10 PM IST
#HumanStory: हां मैं हर रोज बदनाम गलियों में घूमती हूं…
मैं हर रोज उन गलियों में जाती हूं, जहां लोग मेरा भाव लगाते हैं. मुझसे कहते हैं, अरे, चलती है क्‍या? कितना पैसा लेगी? हम उससे ज्‍यादा पैसे दे देंगे....हमें भी अपना बना लो... हम में कांटे लगे हैं क्‍या? इस तरह के हाड़ कंंपा देने वाले शब्‍दों से रोज रूबरू होती हूं.
Nandini Dubey | News18Hindi
Updated: January 14, 2019, 3:10 PM IST
मैं बदनाम गलियों में घूमती हूं. हां वही बदनाम गलियां, जहां जाने से लोग कतराते हैं. जिसके बारे में जिक्र तक करना लोग अपनी शान के खिलाफ समझते हैं लेकिन उन्‍हीं गलियों में हर शाम ढले लोग अपनी रात रंगीन करने के लिए पहुंच जाते हैं. फिर सूरज की किरण खिलने से पहले वहां से मुंह दबाकर भाग आते हैं. हां मैं उन्‍हीं गलियों की बाशिंदा हूं.

मैं हर रोज  वहां जाती हूं. यहां के लोग मुझसे अभद्र भाषा का इस्‍तेमाल करते हैं. दाम लगाते हैं. मुझसे कहते हैं, अरे, चलती है क्‍या? कितना पैसा लेगी? हम उससे ज्‍यादा पैसे दे देंगे...अरे रानी हमारी सुन तो सही...हमें भी अपना बना लो... हम में कांटे लगे हैं क्‍या?...ऐ सुन न काहे को चिकचिक करती है, मान भी जा...कलेजे को कंंपा देने वाले ये शब्‍द मैं हर रोज सुनती हूं. दिल और दिमाग सुन्‍न हो जाता है. शरीर ठंडा पड़ जाता है. फिर भी उन गलियों में घूमती हूं. निडर होकर. अपने काम से देती हूं जवाब.

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वो काम जिसको करके न जाने कितनी लड़कियों को बदनाम गली के दलदल से बाहर निकलने का मौका मिलता है. वो काम जिसको पूरा करके मैं उन लड़कियों की कुछ मदद कर पाती थी, जो उस नर्क में जिंदा तो हैं मगर एक लाश बन चुकी हैं. उन लड़कियों की, जो यहां अपने प्रेमी, पति, पिता, चाचा, मामा उन सभी तमाम अपनों के हाथों वैश्‍यावृत्‍ति के बाजार में उतार दी गईं. ऐसी लड़कियां जो यहां हर रोज अपने जिस्‍म का सौदा करती हैं. हर रोज यहां मरती हैं. मैं उन बच्‍चियों,महिलाओं और लड़कियों को गुमनामी के अंधेरे से बाहर निकालती हूं.



मैं सेक्‍स वर्कर को रेसक्‍यू कराती थी. मैं सोशल वर्कर हूं, जो इन लड़कियों को पुनर्वास में मदद करती हूं. अब तक मैं सैकड़ों लड़कियों को इस दलदल से बाहर निकाल चुकी हूं. लेकिन ये सब कुछ इतना आसान नहीं था. कई बार इन लड़कियों की दास्‍तां सुनकर कभी-कभी मेरे हाड़ तक कांप जाते थे.

एक बार का वाकया मुझे याद आता है कि मुंबई के एक इलाके के बारे में पता चला था कि यहां नेपाल, सिलीगुड़ी और हिमाचल से लाकर बेच  दी गई हैं. जानकारी पुख्‍ता करने के बाद  मैं अपनी टीम के साथ वहां पहुंची. हमारी टीम के एक साथी ने कस्‍टमर बनकर दलाल से एक नेपाली लड़की का सौदा तय किया. डील फिक्‍स होने के बाद हमारा साथी लड़की के साथ कमरे में चला गया. वहां उसने लड़की को नेपाली भाषा में कागज पर लिखकर दिया कि मैं तुम्‍हारी मदद कर सकता हूं. अगर तुम यहां से बाहर निकलना चाहती हो तो मुझे बता देना. मैं अगले कुछ दिनों में फिर आऊंगा.अपने वादे के मुताबिक हम लोग फिर वहां पहुंचे और इस बार पुलिस को भी जानकारी दी.
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उसके बाद मेरा साथी फिर कस्‍टमर बनकर उसी नेपाली लड़की से मिला. उसने नेपाली भाषा में उस शख्‍स का जवाब तैयार कर रखा था. उसने लिखा थी मुझे यहां से निकाल लो. इस बद से बदतर जिंदगी से मरना पसंद करूंगी. उसके बाद मेरे साथी ने कहा कि मुझे तुम्‍हारे सपोर्ट की जरूरत है. बस यहां के कुछ खूफिया रास्‍ते बताओ. पुलिस बस जल्‍द ही यहां पहुंच जाएगी.  हम तुम सबको यहां से छुड़ा लेंगे. योजना के मुताबिक वैसा ही हुआ. साथी के इशारे पर मैं और हमारे साथी पुलिस के साथ पहुंच गए. हमने उन लड़कियों को वहां से रेस्‍कयू करा लिया.

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वहां से निकलने के बाद सभी लड़कियां फफक-फफक कर रोईं.नेपाली लड़की की आंखों से तो आंसू रूक ही नहीं रहे थे.  मात्र अठारह साल की वो लड़की अपने काठमांडू से अपने प्रेमी के साथ शादी के ख्‍वाब सजाकर घर से भागी थी. मगर उसके प्रेमी ने उसे अपने साथी को चंद रूपयों के लिए बेच दिया. फिर उसके साथी ने कुछ देर साथ रखने के बाद दिल्‍ली बेच दिया. दिल्‍ली के दलालों ने उसे मुंबई की बदनाम गलियों में धकेल दिया था. ये केवल एक दास्‍तां थी. अठारह सालों से भी ज्‍यादा के अनुभव में मैंने अभी तक न जाने ऐसी कितनी रूह कंपा देने वाली कहानियां सुनी थीं. इसकी वजह से कई बार मैं खुद भी मानसिक रूप से टूट जाती थी.कई-कई दिनों तक खुद को संतुलित कर पाना मुश्‍किल हो जाता था.



इसके अलावा आपको तब ज्‍यादा गुस्‍सा आता है, जब कई बार पुलिस वाले भी दलालोंं के साथ मिल जाते हैं. हम जिन लड़कियों को छुड़कार लाते हैं. वे उन लोगों के साथ सांठ-गांठ करके उनके चंद रूपयों के लिए लड़कियों को वापस उसी बाजार में छोड़ आते हैं. ऐसी स्‍थिति में हमारा काम और ज्‍यादा मुश्‍किल हो जाता है. मगर मैं रूकी नहीं. मैं अपना काम करती रही.

हालांंकि कई बार ऐसा भी हुआ, जब ये रफ्तार धीमी पड़ी. जब मैं अपने तीन महीने के बच्‍चे को छोड़कर निकल गई थी कि कुछ नाबालिग बच्‍ची को बचाने के लिए निकली थी तब मेरे पति का धैर्य जवाब दे गया था. उन्‍होंने साफ कह दिया था कि मुझे इस काम को छोड़ना पड़ेगा. वरना वो मेरा साथ नहीं दे पाएंगे.  मेरे बच्‍चे भी बचपन में मेरा साथ नहीं दे पाते थे. हालांकि आज वो समझते हैं कि उनकी मां  क्‍या कर रही है?

मुझे याद है कि इस काम की शुरूआत साल 1996 में काठमांडू में शादी करके मुंबई आ गई थी. यहां मैं अपनी नई-नई शादीशुदा जिंदगी में व्‍यस्‍त थी तभी एक दिन की सुबह ने मेरी लाइफ ही बदलकर रख दी. उस दिन सुबह मैं घर के बाहर बालकनी से हर रोज की तरह अखबार उठाकर लाई थी. मैं पन्‍ने पलट ही रही थी कि तभी मैंने देखा कि एक खबर पर नजर गई कि उसको पढ़कर मैं अंदर तक हिल गई थी.

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एक-एक शब्‍द पढ़कर गुस्‍सा बढ़ता ही जा रहा था. उसी वक्‍त मैंने तय कर लिया था कि बस अब और नहीं. दरअसल उस खबर में लिखा था कि नेपाल की दो लाख महिलाएं देह व्‍यापार में लिप्‍त पाई गई हैं. इस समाचार को पढ़कर कर गुस्‍सा मेरा शरीर कांपने लगा.खबर के विस्‍तार में लिखा था कि पकड़ी महिलाओं में कुछ बच्‍चियां भी थीं, जिनके बचपन को वेश्‍यावृत्‍ति में धकेल दिया गया था. मैं उन महिलाओं की पीड़ा को अंदर तक महसूस कर पा रही थी. मेरी आंखें गुस्‍से में लाल हो चुकी थी. ऐसा लग रहा था कि बस इस अपराध में शामिल लोगों को उनकी सजा दिलाने के लिए अभी कुछ कर डालूं. बस इसके बाद से ही मैंने तय कर लिया था कि अब मुझे इन लड़कियों और महिलाओं के लिए कुछ करना है. इसके बाद मैंने अलग-अलग संस्‍थाओं के साथ जुड़कर काम शुरू कर दिया. अब मैंने अपनी खुद की संस्‍था बना ली है.

ये कहानी निर्मला ठाकुर की है.काठमांडू से ताल्‍लुक रखने वाली निर्मला शादी करके मुंबई पहुंची थीं. वे पिछले 20 सालों से सेक्‍स वर्कर को पुर्नवास करने के लिए काम कर रही हैं. इसके लिए उन्‍हें संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की ओर से मानद डॉक्‍टरेट की उपाधि प्रदान की गई है. अलग-अलग संस्‍थानों में काम कर चुकी डॉक्‍टर ठाकुर ने अब जॉइनिंग डॉट्स ऑर्गनाइजेशन की अपनी संस्‍था खोली है. इसके तहत भी वे सेक्‍स वर्कर को रेस्‍क्‍यू कराने के साथ--साथ एचआईवी पीड़ित लोगों के लिए  काम करती हैं.)

(इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human stories पर क्लिक करें.)

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