#HumanStory: गोताखोर की कहानी, 'गहरे से गहरा पानी बचने के 3 मौके देता है'

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 20, 2019, 10:11 AM IST
#HumanStory: गोताखोर की कहानी, 'गहरे से गहरा पानी बचने के 3 मौके देता है'
जोधपुर के दाऊलाल मालवीय 50 सालों से लोगों की जान बचा रहे हैं (प्रतीकात्मक फोटो)

आप पानी में खुदकुशी के इरादे से उतरें या फिर गलती से गहरे पानी में चले जाएं, वो आपको बाहर फेंकेगा. एक बार... दो... तीन बार...! गहरे से गहरा पानी, नदी, झील, समंदर 3 बार बाहर उछालता है. वो जीने की आपकी शिद्दत परखता है.

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दिसंबर की सर्द रात. लोग अंगीठी या मोटी रजाइयों में ही आराम पाएं. तभी किसी ने झकझोरकर जगाया. झील से चीखने की आवाजें आ रही थीं. वक्त कम था. शायद कुछ ही पल! गुनगुनी रजाई फेंकी और झील के बर्फीले पानी में कूद पड़ा. मेरा पुश्तैनी घर झील के ऐन बगल में है. जिस उम्र में बच्चे साइकिल रेस करते हैं, मैं लोगों की जान बचाता या मुर्दा शरीरों को उनके घरवालों को सौंपता.

जोधपुर के दाऊलाल मालवीय लगभग 50 सालों से लोगों की जान बचा रहे हैं. वे कहते हैं- चाहे गलती से पैर फिसल पड़ा हो या फिर सब खत्म करने की ठानकर पानी के भीतर उतरे, हर डूबता शख्स मदद की गुहार लगाता है. पढ़ें, दाऊलाल को.

जोधपुर की गुलाब सागर झील के पास बाप-दादे का घर हुआ करता. बचपन में मौसमी फल तोड़ने या गिल्ली-डंडा खेलने या फिर कहानियां सुनने का- जो भी काम था, इसी झील के इर्द-गिर्द होता. पानी ही हमारी दुनिया थी. जैसे-जैसे बाजुओं में ताकत आई, इसमें एक काम और शामिल हो गया, डूबते लोगों की जान बचाना. तकरीबन 15 साल का था, जब पिता को अपना नाम पुकारता सुना. झील में कोई डूब रहा था, पिता उसकी मदद के लिए छलांग लगाने जा रहे थे और मुझे भी बुला रहे थे.

पानी में लगी हर छलांग इसी मकसद से होती है कि मैं मरने हुओं को बचा लूं


डूबते की जान बचाना टीमवर्क है. अकेले आदमी को पानी लील सकता है. मैं दौड़ता हुआ पहुंचा. पिता पानी में कूद चुके थे. इधर उस डूबते हुए शख्स की आवाज लापता थी. घबराया हुआ मैं भी कूदा. रोजाना तैराकी के वक्त जिस पानी से पक्की जान-पहचान हो चुकी थी, वो इस समय एकदम डरावना लग रहा था. लपलपाता पानी. अपने साथ छेड़छाड़ करने वाले तमाम लोगों को अपने में समा लेने को तैयार.

मेरे कंधे दर्द करने लगे. आंखें धुंधलाने लगीं. सांस फूल रही थी. तभी पिता की याद आई और उस डूबती आवाज की. मैंने गहरे पानी में डुबकी लगा दी.

हम उसकी जान नहीं बचा सके. पिता और मैं उस मुर्दा शरीर को खींचते हुए बाहर लाए. सफेद पड़ चुके चेहरे पर फूलकर बाहर निकलने को तैयार आंखें! कभी डर नहीं लगा था लेकिन तब बड़े दिनों तक वो आंखें याद आतीं. कई दिनों तक नींद नहीं आई. झील में तैरने नहीं जा सका.
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उस बात को 50 से ज्यादा बरस बीते. तब से पानी में लगी हर छलांग इसी मकसद से होती है कि मरने हुओं को बचा लूं.

एक बड़ा ही अजीबोगरीब मामला साल 1993 में आया. झील के पास खेलने आया एक बच्चा पानी में डूबने लगा. उसे निकालकर फर्स्ट एड दिया और पास के सरकारी अस्पताल लेकर गया. डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड कह दिया. सालों का मेरा तजुर्बा डॉक्टरों की ये बात मानने को तैयार नहीं था. बच्चे की तीसरी चीख गुम होने के तुरंत बाद ही उसे निकाल लिया गया था. मुझे मेरे पिता की याद आई. वो डूबते हुओं को बचाने के बाद उनका पेट और फिर सीना दबाकर पानी निकालते. तब भी होश न आए तो सिर में मालिश करके हल्का-हल्का दबाव बनाते थे. मैंने यही किया. थोड़ी देर बाद बच्चे को होश आ गया.

कई बार ऐसा भी हुआ कि जान बचाने की कोशिश में मेरी जान खतरे में आ गई (प्रतीकात्मक फोटो)


कई बार ऐसा भी हुआ कि जान बचाने की कोशिश में मेरी जान खतरे में आ गई. एक रेस्क्यू मिशन में रीढ़ की हड्डी फ्रैक्चर हो गई. टखने टूटे. सिर पर टांके लगे. शरीर पर तमाम जगह जख्म ही जख्म हैं. आवाज में हल्के गुरूर के साथ 70 साल का ये बुजुर्ग याद करता है.

सेना और पुलिस के जवानों के सीने पर उनकी बहादुरी का तमगा सजता है, वैसे ही मेरे शरीर पर जख्मों के निशान. हर निशान एक याद है किसी की डूबती सांसों को बचाने की.

तैराकी और गोताखोरी हालांकि जान बचाने का ही सुख नहीं देती. मुर्दा शरीरों को खोजना और उन्हें उनके परिजनों को देना भी दाऊलाल उसी शिद्दत से करते हैं. वे याद करते हैं- तब तैराकी शुरू ही की थी. पहली बार जान बचाने निकला तो लाश लेकर वापस लौटा. उसके बाद तो सिलसिला चल निकला. आज तक 32 से ज्यादा जानें बचाई हैं तो लगभग 12 सौ लाशें पानी से निकाली हैं.

पुलिस का फोन आता है कि फलां शख्स को पानी में खोजना है. मैं तुरंत निकल पड़ता हूं लेकिन साथ में एक कपड़ा, तारपीन का तेल, बड़ी पॉलीथिन, उल्टियां रोकने की दवा और एंटीबायोटिक रखते हुए.

सड़क से गुजरें और नाली या खुले गटर की गंध आए तो आप क्या करते हैं? दाऊलाल पूछते हुए खुद ही जबाव देते हैं - मुंह पर हाथ अपने आप चला जाता है. चाल तेज हो जाती है. हम जब पानी में उतरते हैं तो यही होता है. कई दिनों तक पानी में सड़ते रहे मुर्दा शरीर की गंध सही नहीं जाती. ऐसे में दवा खाकर लाश किनारे लगाते हैं. उसपर तारपीन का तेल डालते हैं और तब कपड़े में लपेटते हैं.

दाऊलाल अब लोगों को निःशुल्क तैराकी सिखा रहे हैं


झील के पास बचपन बीता. उतरते-उतरते पानी से दोस्ती हो गई. उसकी हर अदा, हरेक दांव-पेंच समझता हूं. पानी एकदम से नहीं लीलता. खूब खेल करता है.

आप पानी में खुदकुशी के इरादे से उतरें या फिर गलती से गहरे पानी में चले जाएं, वो आपको बाहर फेंकेगा. एक बार... दो बार... तीन बार...! गहरे से गहरा पानी, नदी, झील, समंदर आपको बाहर उछालता है ताकि आप मदद मांग सकें. वो जीने की आपकी शिद्दत परखता है और फिर तीन बार के बाद अपने भीतर समा लेता है.

डूबने वाले के पास चार से पांच मिनट होते हैं. बचाने वाले के पास भी चार से पांच मिनट होते हैं.

इतने साल बीते. कितनी जानें बचाईं. कितनी ही लाशें निकालीं. कोई लापरवाही से गहरे पानी में पहुंचा तो कोई चाहकर. सबकी अलग कहानी. लेकिन एक मामले में सारे किस्से एक-से थे- डूबता हुए हरेक शख्स सांस मांगता है.

मरने की चाह कितनी ही गहरी हो, पानी में पहुंचकर सांस की चाह-भर बाकी रह जाती है.

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First published: August 20, 2019, 10:11 AM IST
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