मुर्दे खोजने वाले शख्स की कहानी- 'किसी का सिर नहीं होता तो कोई बोरे में तैरता आता है'

रात के डेढ़ बजे होंगे. गंगा किनारे एक लाश पड़ी थी. पानी में फूली हुई. चेहरा और पूरा शरीर नोचा-खसोटा. उसे जलाने के लिए लकड़ियां खींचकर लाने लगा. तभी एक लकड़ी रेत में अटक गई. जितना खींचता, वो उतनी अटकती जाती. अचानक डर लगा. ऊंची-ऊंची लहरें. पानी के साथ हवा का शोर. और एक लाश. लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार करते हुए आए दिन अजीबोगरीब वाकये होते हैं.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: July 22, 2019, 7:26 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: July 22, 2019, 7:26 PM IST
गोपालगंज, बिहार के नवीन श्रीवास्‍तव 19 सालों में अब तक 206 लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं. बहुतेरी ऐसी लाशें भी होंगी, जिनका उनके पास रिकॉर्ड नहीं है. 

नवीन कहते हैं- कभी कोई लाश बोरे में बहती आती है. कभी जली-नुची हुई. लाशों की भी अपनी एक जिंदगी, अपनी अलग कहानी होती है. लाश को देखकर उसका अंदाजा लग जाता है.

साल 1999. सिविल सर्विसेज की तैयारी के लिए इलाहाबाद में था. मौसी का बेटा भी साथ रहता था. कुंभ की बात है. एक रोज घाट पर गया मेरा भाई वापस नहीं लौटा. तब से मेरा एक ही मकसद था- उसे खोजना. हर शाम क्लास के बाद नाव में बैठकर उसकी लाश ढूंढता.

मुर्दा शरीर हमेशा आसमान की ओर पीठ करके बहते हैं. मैं लाशों को पलटता. देखता और लौट जाता. एक-एक करके 32 दिन बीत गए.

इलाहाबाद में भाई के डूबने पर नवीन की जिंदगी में ये सिलसिला शुरू हुआ
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एक रोज ऐसे ही वापस लौट रहा था कि नाव चलाने वाले ने पूछा- अभी-अभी जिस लाश को उलट-पलटकर आपने नदी में वापस फेंक दिया, वो आपका भाई होता तो क्या करते? मैं सन्न रह गया. मेरी न सही, हर लाश किसी न किसी की कुछ तो होती होगी. किसी से तो उसका रिश्ता होता होगा. रोज की तरह अगले दिन भी मैं गंगा घाट पहुंचा लेकिन इस बार अपने भाई को खोजने नहीं.

लोग नदी किनारे सीपियां-पत्थर खोजते, मैं मुर्दे खोजा करता.
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गंगा किनारे रोज कोई न कोई लाश होती. पानी में बुरी तरह से फूली हुई. किसी का चेहरा जला होता तो किसी का आधा शरीर मछलियां खा चुकी होतीं. कितनी ही बार बोरे में बंधी लाशें मिलीं. कई बार आधा शरीर मिलता.

एक बार एक लाश मिली. शादी का जोड़ा पहने हुए. हाथ में लाल चूड़ियां. साफ पता चल रहा था कि शादी के तुरंत बाद का हादसा है.

दुल्हन का शरीर जगह-जगह से नुचा हुआ था. उसे किनारे ले गया और अंतिम संस्कार किया. लगा जैसे चिता पर लेटी वो लड़की मेरी अपनी बहन है. मैं एकदम से फफककर रो पड़ा. आसपास लोग जमा हो गए. सबको लगा, मेरा कोई अपना मिल गया है.

मौत के बाद जहां रिश्ते खत्म हो जाते हैं, वहां से लाशों का एक नया रिश्ता मुझसे जुड़ता है.

अपनों की लाश को सब जिंदा शरीर से ज्यादा सहेजते हैं लेकिन गरीब की लाश भी अनाम रहती है. मैं उन्हीं अनाम- अज्ञातकुल लाशों को संभालता हूं.

लाश का मजहब पता चल जाए तो उसी के अनुसार अंतिम संस्कार होता है (प्रतीकात्मक फोटो)
लाश का मजहब पता चल जाए तो उसी के अनुसार अंतिम संस्कार होता है (प्रतीकात्मक फोटो)


इलाहाबाद में पढ़ाई के दौरान लाशें जलाता तो लोग अजीब नजरों से देखते. पुजारी या लाश जलाने वालों से मदद मांगता तो वे पैसे मांगते. घर खर्च के लिए जो आता था, वो इतना भर था कि खा-पढ़ सकूं. मैंने पार्टटाइम शुरू किया. पढ़ने में ठीक था.

गाइड लिखने का काम करने लगा. उससे जो पैसे मिलते, उन अनाम लाशों के कफन-दफन में लगा देता.

शाम गहराने से पहले गंगा किनारे जाता. कभी एक दिन में एक लाश मिलती. कभी एक ही दिन में कई-कई. उन्हें गंगा के बीच या आसपास बने टापुओं पर जलाता. एक लाश को जलने में ढाई से तीन घंटे लगते हैं. मैं जलती लाश के किनारे बैठा रहता. इंतजार करता और तभी उठता जब वो पूरी तरह से जल जाए.

साल 2004 में घर लौट आया. घर के पास गंडक नदी बहती है. ये मेरी नई गंगा थी.

इसमें भी आए दिन लाशें किनारे लगे-लगे सड़ती रहतीं. घर लौटकर भी यही काम करने लगा. लोगों ने खूब विरोध किया. ये काम डोम का है. तुम अनजान लाशें क्यों छूते हो? इसी बीच घर में एक के बाद एक कई हादसे हुए. सबने मान लिया कि मेरी ही वजह से ये सब हो रहा है. मेरा जुनून तब भी नहीं छूटा. आखिरकार लोगों ने ही मुझे छोड़ दिया.

आज भी ज्यादातार लोग मुझसे अछूत जैसा व्यवहार करते हैं. शादी-ब्याह में नहीं बुलाते. बुलाएं भी तो आंखों में डर होता है. मैं हूं तो कहीं कोई हादसा न हो जाए. सवाल करते हैं. समझाते हैं.

अक्सर लाशें एकदम खराब हालत में मिलती हैं (प्रतीकात्मक फोटो)
अक्सर लाशें एकदम खराब हालत में मिलती हैं (प्रतीकात्मक फोटो)


लोग डरावनी तस्वीर नहीं देख पाते हैं, मैं रोज जली-कटी-नुची लाशें ढोता हूं. किसी लाश का सिर नहीं होता तो किसी का हाथ या पैर गायब रहता है. रात-बेरात अंतिम संस्कार करते हुए कई बार डर भी लगा लेकिन कभी इरादा नहीं बदला.

गोपालगंज के जिस गांव में रहता हूं, छोटी सी जगह है. आबादी लगभग पांच हजार होगी. यहां मार्च से मई तक में 8 लावारिस लाशें आ चुकीं. मुर्दाघर की भी व्यवस्था नहीं है. अगर इलाज के दौरान किसी गुमनाम शख्स की मौत हो जाए तो अस्पताल में ही लाश रखी रहती है.

एक बिस्तर पर इलाज चल रहा है तो बगल ही में फर्श पर लाश पड़ी है. मक्खियां भिनकती रहती हैं. देखकर डर के मारे बीमार आदमी भी मुर्दा हो जाए.

कई-कई बार तो एकदम खराब हालत में लाश उठाई है. सांस रुकने के बाद शरीर कुछ ही घंटों के भीतर खराब होने लगता है. सड़ी-गली लाशों को कोई उठाना नहीं चाहता. तब अकेले ही उठाकर उन्हें गाड़ी में रखता हूं. शरीर का मजहब पता चल जाए तो उसी के अनुसार अंतिम संस्कार करता हूं. जनाजे की नमाज भी सीख रखी है. अनाम लाशें दुनिया के लिए लावारिस हों लेकिन मेरे साथ उनका रिश्ता होता है.

72 घंटों बाद गुमनाम लाशें मुझे हैंडओवर की जाती है. उन्हें जला या दफनाकर लौटता हूं तो वही खालीपन रहता है जो किसी अपने को छोड़कर आते हुए होता है.

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First published: July 22, 2019, 10:16 AM IST
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