#HumanStory: हादसे ने सब बदल लिया, अब पीरियड्स में खून से सन जाती हूं और पता नहीं लगता

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Updated: August 28, 2019, 10:30 AM IST
#HumanStory: हादसे ने सब बदल लिया, अब पीरियड्स में खून से सन जाती हूं और पता नहीं लगता
पूनम राय के कमर के नीचे का हिस्सा सुन्न पड़ा है

अस्पताल में आंखें खुलीं. सिर से पांव तक सफेद पट्टियों में लिपटी, सुइयों और नलियों से गुदी हुई. निचले हिस्से को छोड़ तमाम शरीर में बेतहाशा दर्द. बेख्याली में घुटनों पर हाथ गया. जैसे कुछ हो ही नहीं. चादर हटाई. घुटने साबुत थे लेकिन सुन्न. 17 साल बीते. कमर के नीचे का हिस्सा सुन्न है. पीरियड्स में खून से सन जाती हूं लेकिन पता नहीं लगता.

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ये कहानी है बनारस की रंगसाज़ पूनम राय की. किसी भी आम लड़की की तरह जान छिड़कने वाले हमसफर और ख्याल रखने वाले परिवार का ख्वाब लिए ससुराल पहुंची. लौटीं तो शरीर के साथ-साथ मन भी साबुत नहीं बचा था. 15 साल बिस्तर पर रहीं. पहली पेंटिंग का कैनवास लिया तो उसे फ्रेम नहीं कराया, चादर की तरह बिछाकर पेंट किया. पढ़ें, पूनम को.

जहन्नुम के मेरे सफर की शुरुआत हुई साल 1997 में, जब घरवालों ने उसे मेरी शादी के लिए चुना. हमें बताया गया, लड़का इंजीनियर है. पापा खूब खुश थे. BHU से पेंटिंग में ऑनर्स पढ़ी उनकी बिटिया को उसकी जोड़ का साथी मिलेगा. शादी से पहले मुलाकात की बात हुई, लड़के ने इन्कार कर दिया. मन थोड़ा बुझ गया लेकिन कहीं न कहीं अच्छा भी लगा. सीधे शादी के मंडप पर मिलेंगे. सीधे शादी के बाद जानेंगे. मंडप में मिले. लड़का शांत लगा. ससुराली सुलझे हुए. बनारस शहर से गांव पहुंच गई. मुझे अंदाजा नहीं था कि आगे जिंदगी कहां जा रही है.

मैं कमरे में उसका इंतजार कर रही थी. धुकधुकी लगी हुई थी लेकिन खुश थी. मंडप में थोड़ा-बहुत देखा था. लगा लड़का समझदार ही होगा. काफी रात गए वो आया. उसके साथ ही तेज महक भी आ पहुंची. शायद उसने नशा किया होगा! इंतजार में सुन्न पड़े अपने पैरों को मैं हिलाने-डुलाने लगी तभी उसकी कड़कड़ाती आवाज आई. वो गुस्से में मेरा नाम पुकार रहा था. उस रात मेरे साथ जबर्दस्ती हुई. उसके बाद ये रोज का किस्सा हो गया. मैंने चीखती तो वो मुंह में कपड़ा ठूंस देता. भागने की कोशिश करती तो हाथ-पैर बांध देता. पीटता. लातें मारता. गालियां देता. मैं टिकी रही. सोचती- कम से कम दूसरी औरत तो नहीं ला रहा.

वो आने वाले बच्चे का सेक्स टेस्ट चाहते थे


मैं पेट से थी. टेस्ट रिपोर्ट आते ही मन जल गया. मेरे भीतर रेप की औलाद पल रही है! खुद को खत्म करने का इरादा आने लगा. कई दिनों तक यही सोचती रही. तभी एक नई बात हुई. उसने वादा किया कि वो अच्छा इंसान बनेगा. ये पहली बार था. मैंने खुद को खत्म करने का इरादा छोड़ दिया. महीने बढ़ रहे थे. मैं खुश रहने लगी. मार-पीट अब गालियों में बदल गई थी. हर रात का रेप बीत चुका था. तभी एक नई मांग आई. वो आने वाले बच्चे का सेक्स टेस्ट चाहते थे. उसने पुचकारते हुए कहा- टेस्ट करा लो, रिजल्ट से कोई फर्क नहीं पड़ता. बस मां-बाप की खुशी के लिए है.

उस रात मुझे लातों से मारा गया. दोनों हाथों से पेट को संभाले हुए मैं जमीन पर लेट गई थी. मायके खबर भिजवाई. तब मोबाइल नहीं हुआ करता थे. पापा के साथ मैं पेट में बेटी को संभाले बनारस लौट गई. मेरे पूरे शरीर पर नीले-गहरे निशान उकरे हुए थे. मां हल्दी दूध देते हुए रो देती. मैं खुद को ढंककर रखने लगी ताकि मेरे जख्म मां को कम से कम दिखें.

सातवां महीना लगते ही वहां से लोग आए. सबके चेहरों पर पछतावा था. खूब बड़े-बड़े वादे हुए. गलतियों की माफी मांगी गई. मैं विदा होकर वापस उस नर्क लौट आई. कुछ दिन सब ठीक रहा. पति आंखें चुराता जैसे उसे सचमुच अपने किए का अंदाजा हो. सास-ससुर के तानों की धार कम थी. तब भी एक बात अजूबी थी. वे लोग कमरा बंद करके अक्सर बातें करते. मैं परिवार की होकर भी उस खास मीटिंग से बाहर रखी जाती. अब भी उस कमरा-बंद मीटिंग का राज मुझे समझ नहीं आ सका है.
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15 सालों बाद वॉकर के सहारे चलना शुरू किया


बेटी के जन्म के 2 महीने बाद. मुझे छत पर बुलाया गया. वहां सास-ससुर-पति सब इकट्ठा थे. शिकायतों का पिटारा खुल चुका था. मैं सफाइयां दे रही थी. इसके बाद का मुझे कुछ याद नहीं. कई दिनों, हफ्तों या महीनों बाद अस्पताल में मेरी आंखें खुलीं. सब बदल चुका था. स्पाइनल कॉर्ड में चोट थी. कमर के नीचे का पूरा हिस्सा बेकार हो चुका था. सिर पर गहरी चोट. जबड़े पर चोट. बात करती तो शब्द एक-दूसरे में उलझ जाते. दुधमुंही बेटी इतने दिनों से बिन मां के पल रही थी.

बनारस लौट आए. पापा ससुराल के खिलाफ किसी जांच के खिलाफ थे. पहले मरती बेटी को तो जिला लाएं- वो कहते. 15 साल बिस्तर पर रही. सोए रहने के कारण तमाम शरीर पर घाव ही घाव थे. पैरों पर चींटियां काटें तो जख्म बन जाता लेकिन मुझे अहसास नहीं होता. कितनी-कितनी बार पीरियड्स शुरू हुए, कपड़े खून से सन गए लेकिन मुझे पता तब चला जब किसी ने बताया. फिर मैं तारीखें याद रखने लगी. कैलेंडर पर निशान लगा देती और डेट आने पर बार-बार चेक करती. वॉशरूम जाने जैसी मामूली बात भी मेरे लिए सजा हो गई थी. फिर हर काम अंदाजे से करने लगी. घंटाभर हो चुका है या इतने गिलास पानी पी चुकी हूं तो खुद ही वॉशरूम चली जाती हूं.

15 सालों बाद वॉकर के सहारे चलना शुरू किया. पैर जमीन को छूते तो हैं लेकिन अहसास नहीं होता.

17 दिनों तक रुक-रुककर उस 6 फुट पर 648 चेहरे उकेरे


साल 2015 में 19 सालों बाद पेंटिंग ब्रश हाथ में लिया तो हाथ कांप रहे थे. बड़ी देर तक मैं उन्हें साधने की कोशिश करती रही. उस रोज कुछ नहीं किया. अगली सुबह दोबारा ब्रश हाथ में लिया. हाथों की थरथराहट जा चुकी थी लेकिन मन अब भी डरा हुआ था. मेरा क्या होगा? बार-बार सोचती. जो औरत तौलिया नहीं मोड़ सकती है, वो तस्वीर बनाने जैसा बारीक काम कैसे कर सकेगी!

खुद को वापस पेंटिंग से जोड़ने में कई दिन लगे. कैनवास को बिस्तर की तरह बिछाया गया. 6 फुट का कैनवास. खड़ी होकर देखती रही, फिर बैठकर, सरककर, उकड़ू होकर, लेटकर- कैनवास को मैंने कई हिस्सों में बांट दिया. हर हिस्से की अलग कहानी. हर हिस्से का अपना दर्द. हर हिस्से की हार. हरेक की जीत. मैंने 17 दिनों तक रुक-रुककर उस 6 फुट पर 648 चेहरे उकेरे. औरतों की अलग-अलग उम्र और अलग-अलग तकलीफों-मजबूती के उस कैनवास को इंडिया वर्ल्ड रिकॉर्ड में जगह मिली.

अब सर्दियों की कोई ऊंघती सुबह हो या गर्मियों की तपती अलसाई दोपहरी- पूनम के घर पर पेटिंग सीखनेवालों का जमावड़ा रहता है.

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First published: August 28, 2019, 10:30 AM IST
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