#HumanStory: नशेड़ी का कुबूलनामा: सामने दोस्तों की लाशें थीं और मैं उनकी जेब से पैसे चुरा रहा था

सर्दियों के दिन थे. पूरा कुल्लू बर्फ में गुम. मैं बेटे को घुमाने के बहाने बाहर निकला. उसे एक नाले के पास लिटाया और नशे के अड्डे पर पहुंच गया. कई घंटे बाद भाई को वो ठंड में अकड़ा हुआ मिला. आंसू लुढ़ककर गालों पर जमे हुए. डेढ़ महीने का बच्चा. टोपी और जुराबें तक नहीं पहनी थीं. लौटा तो घर में ऐसा घमासान मचा कि शीशे, फर्नीचर और मेरा सिर- सब टूट गए.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 1, 2019, 10:57 AM IST
#HumanStory: नशेड़ी का कुबूलनामा: सामने दोस्तों की लाशें थीं और मैं उनकी जेब से पैसे चुरा रहा था
कुल्लू के पंकी सूद ने नशे को जिंदगी के कई साल दिए
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 1, 2019, 10:57 AM IST
हां, मैं 13 सालों तक ड्रग एडिक्ट रहा. कोकीन-हेरोइन से लेकर गांजा-चरस तक. नशा ज्यादा कुछ नहीं बिगाड़ता, बस बर्बाद कर देता है. या फिर मार देता है.

नशे के लिए मैंने पैसे-गहनों से लेकर कार के स्टीरियो और गटर के ढक्कन तक चुराए. कब्रों के साथ सोया. यहां तक कि अपने नन्हे बेटे की जान दांव पर लगा दी. किस्मत बुलंद थी जो मैं रुक सका. पढ़िए, कुल्लू के पंकी सूद को.

ये 90 की बात है
कुल्लू सैलानियों से भरा रहता. घर से बाहर निकलता तो वॉकमैन सुनते विदेशी नजर आते. स्कूल से लौटता तो इजराइली झुंड नशे में धुत यहां-वहां सुस्ताते दिखते. किसी से चेहरे पर कोई शिकन नहीं. आंखों में खोया-खोयापन. थोड़े तजुर्बे वाले यारों ने बताया- ये नशा करते हैं. नशा सुनकर थोड़ा ठिठका तो लेकिन फिर मैं कनविंस हो गया. पहली सिगरेट उठाई, तब यही कोई 12 साल का था. चरस मिली सिगरेट. सिर जोरों से घूमने लगा. मैं डर गया. भोलेनाथ की बूटी पी थी. उन्हीं से माफी मांगने लगा कि फिर नहीं. उस रोज से फिर नहीं का सिलसिला शुरू हुआ तो पूरे 13 सालों तक चला.

पढ़ने में कमजोर था लेकिन अंग्रेजी खूब बढ़िया थी
टूरिस्ट प्लेस में ढेरों विदेशी रोज आते-जाते. मैं उन्हें गाइड करने लगा. मूंछें आईं तो डर भी थोड़ा कम हुआ. फिर उन्हें दलालों के अड्डे पर ले जाने लगा. वो नशे की खरीदी करते, मैं अपनी लच्छेदार अंग्रेजी में उनकी मदद करता. बदले में पैसे मिलते. पहली बार एक विदेशी ग्रुप के साथ रेव पार्टी में गया था.

सैलानियों का गाइड बनते-बनते पंकी ड्रग एडिक्ट बन गया (प्रतीकात्मक फोटो)

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वहां देखा कि कैसे मुंह पर एक छोटा सा पेपर रखते हैं और अलग ही दुनिया में चले जाते हैं. आह! उस नशे तक पहुंचने में मुझे वक्त नहीं लगा.

जब तक सस्ती ड्रग्स लिया करता, कोई परेशानी नहीं थी. लेकिन फिर नशे की लत और खुराक बढ़ती चली गई. मैंने चोरी करना शुरू कर दिया. पैसे चुराता. कार के स्टीरियो चुराए. गटर का ढक्कन काफी महंगा होता है, उसे भी नहीं छोड़ा. लोहे की चीजें उठा लेता. पैसे पूरे नहीं पड़ते थे तो दिनभर गाइड का काम कर लेता. पैसे कहीं न कहीं से आ ही जाते हैं.

एडिक्ट पर भगवान की बड़ी कृपा होती है. कहीं न कहीं से पैसे आ ही जाते हैं. अब जिस रोज से मैंने नशा छोड़ा, नशे के हिस्से के पैसे आने बंद हो गए हैं. ये बताते हुए पंकी ठहाके लगा रहे थे.

बड़े परिवार में रहता था. सबके अलग कमरे लेकिन हर कमरे में कोई न कोई चेहरा. ऐसे में नशे की पुड़िया कहां छिपाएं! तजुर्बेदार दोस्तों से बात की. उन्होंने कहा- बाथरूम में.

बाथरूम नशेड़ियों के लिए जन्नत से कम नहीं 
किसी से छोटे-बड़े नशेड़ी से बात कर लें जो परिवार में रहता है. बाथरूम आपको 'फुल प्राइवेसी' देता है. मैंने छिपाने के लिए नई-नई जगहें खोज निकालीं- ट्यूबलाइट के पीछे, बेसिन के एंगल पर. बाथरूम में बड़े से बड़ा राज छिपाया जा सकता है- पंकी याद करते हैं.

पंकी सूद ने नशे में 12 से 13 साल बिता दिए


मैं साइलेंट यूजर हुआ करता
नशे में कभी गाली-गुफ्तार नहीं की. बस, कोई कोना ढूंढता और डूब जाता. एडिक्ट था. वैसे ही लोगों से दोस्ती कर ली थी. एक बार कार से हम 7 लोग जा रहे थे. मैं अपने स्टॉप पर उतरा और तभी कार का एक्सिडेंट हो गया. मेरी आंखों के सामने ही. मैं भागता हुआ गाड़ी तक पहुंचा. सबके सिर फटे हुए थे. मैंने पुलिस को फोन करने या लाश पर रोने की बजाए उनकी जेबें खंगालना शुरू किया. जिसकी जेब में नशा-पैसे थे, सब निकाल लिया और वहां से भाग गया. होश लौटा तो पता चला- वे ऑन स्पॉट मर चुके थे. दुनिया एकदम घूम-सी गई. तब पहली बार अहसास हुआ कि मैं नशे की गिरफ्त में कहीं बहुत गहरे जा चुका हूं.

विदेशियों की तर्ज पर फ्राइडे नाइट से शुरू किया था. पता ही नहीं चला कि कब हफ्ते के सारे दिन फ्राइडे बन गए!

हमारा घर शहर में काफी रुतबेदार माना जाता है. पापा का काफी रौब रहा. बाहर भी और घर पर भी. जैसे ही लौटते, हम बच्चे किताबों में मुंह घुसा लेते. बातचीत पहले ही कम थी. नशेड़ी हुआ तो जरूरत भी खत्म हो गई. पहला 'एनकाउंटर' हुआ, जब मैंने नशे के एक दलाल की पैरवी की. मैंने कहा- वो अच्छा आदमी है. उसे कोई कुछ मत कहो. डरता था कि कहीं वो मुझे नशा बेचना बंद न कर दे.

कुल्लू में नशा महंगा हुआ तो बहाने से दिल्ली आ गया
शुरुआती दिन पहाड़गंज में कटे. नशेड़ियों का हमारा गैंग हुआ करता जो पैसों के लिए चेन स्नैचिंग करता. एक बार मैं भी साथ गया. एक बाइकवाले की चेन खींची और भागे. मैं पहाड़ों से था. ऊंची-संकरी हर जगह कूद-फांद में अव्वल. निकल भागा. लेकिन दिल इतनी जोर से धड़-धड़ कर रहा था कि दोबारा ये काम नहीं किया.

कुल्लू में नशा महंगा हुआ तो बहाने से दिल्ली आ गया


पहाड़गंज से उकताया तो निजामुद्दीन में कब्रों के बीच रहने लगा. किसी भी कब्र के बगल में सटकर सो जाता.

नहाने के लिए सुलभ कॉम्प्लेक्स चला जाता. चेन स्नैचर छूटे तो ब्लेडबाज यहां मेरे दोस्त हो गए. जीभ के नीचे ब्लेड दबाए ये लोग 100 रुपये के लिए किसी की भी जान ले लेते. मुझे नया सीखने का खूब शौक था लेकिन ये हुनर नहीं सीखा.

तकरीबन 12 साल बीत चुके थे
हर तीन-चार घंटे में इंजेक्शन लेता. हाथों में जगह-जगह छेद. काले-गहरे निशान. नीली नसें उभरी हुईं. नाक से भी कई ड्रग्स लेता. नाक भी सूंघने का अपना हुनर खो चुकी थी. जीभ भी भोथरा गई थी. वजन आधा रह गया था. बीच-बीच में सेल्फ रियलाइजेशन के दौरे पड़ते. तब बचपन याद आता. पहाड़ की पैदाइश हूं. एकदम चुस्त. ऊंचे-गहरे को पलों में लांघ लेने वाला. पहाड़ के पेड़-फुनगियां भी मुझे पहचानतीं. लेकिन अब पंकी बदल चुका था. थोड़ी दूर चलते ही हांफ जाता. पहाड़ मुझसे दूर हो गया था. रोज सोचता- कल से मैं बदल जाऊंगा लेकिन फिर मैं नशे के अड्डे पर होता.

डिप्रेशन में खुद को चोट पहुंचाने लगा. ब्लेड मार लेता. सिर दीवारों से टकराता. कई साल हुए लेकिन आज भी उन जख्मों के निशान हैं.

हारे हुए घरवालों ने शादी करा दी. मैं तब भी नहीं बदला. तब CCTV नहीं हुआ करते थे. मेरा घर, पास-पड़ोस सबकी नजरें मेरे लिए CCTV बन गईं. जहां भी निकलता, लोग साथ हो लेते. तब मैं अपने बेटे का इस्तेमाल करने लगा. बेटे को घुमाने के बहाने बाहर निकलता और उसे कहीं भी रखकर भाग जाता.

नजरबंद हुआ तो मैं अपने बेटे का ही इस्तेमाल करने लगा (प्रतीकात्मक फोटो)


एक वाकये ने सब बदल दिया. उस रोज कुल्लू में बर्फबारी हुई थी. सुबह जागा तो नशे की जबर्दस्त तलब लगी. मैंने बेटे को देखा. डेढ़ महीने का बच्चा गर्म रजाई में आराम से सोया हुआ था. मैंने उसे उठाया और बिना कोई कपड़ा ओढ़ाए तेजी से निकल गया. उसे नाले के पास रखकर मैं नशे के अड्डे पर चला गया. बाद की बात मुझे घर पहुंचने पर पता चली. बच्चा ठंड से अकड़ गया था.

मेरी खूब कुटाई हुई. जिसके हाथ जो आया, मुझ पर फेंका. पत्नी चुपचाप खड़ी थी. सबके थकने के बाद वो आई और मुझे कसकर एक तमाचा मारा. फिर एकदम शांति छा गई.

नशा छुड़ाने के लिए रीहैब भेजा गया तो मेरे हाथ-पांव बंधे हुए थे. बस मुंह खुला था और मैं चीख रहा था. दुनिया भर को लानतें दे रहा था. बीच-बीच में अपने भाई की तरफ देखकर चीखता- प्लीज़, मुझे फलां नशा ला दे. मैं मर रहा हूं.

अगली सुबह रीहैब के डिटॉक्स रूम में नींद खुली. ऊंची-ऊंची दीवारें. हर तरफ नशेड़ी रो-गा रहे थे.

मेरे पूरे शरीर में दर्द था. नशे की सख्त जरूरत थी. मैं दीवारें देखने लगा. ऊंची-सपाट जगहों पर चढ़ने की आदत यहां कितनी मदद करेगी- इसका जुगाड़ लगाने लगा. तभी मेरे काउंसलर आए. पूछा- क्या देख रहे हो? मैंने तपाक से कहा- भागने का जुगाड़.

पंकी आज ट्रैवल कंपनी चला रहे हैं


अगली ओर से सुना- अब तक भागते ही तो रहे हो. अब तो रुको.

पहले 72 घंटे मुश्किल थे. नशे के लिए मैं कुछ भी करने को तैयार था. सिर दर्द से फटता. शरीर की तमाम नसें तड़कने को तैयार. चलता तो गिर जाता. गिरता तो रो पड़ता. बस नशा चाहिए था.

धीरे-धीरे आंखें देखने-समझने लायक हुईं तो गौर किया. रीहैब की दीवारों पर बड़े मजेदार स्लोगन लिखे हुए थे. मेरा पसंदीदा था- 'जो आपके साथ अब तक नहीं हुआ है, वो अब होगा'. मैं सड़ी हुई टांगों वाले एक नशेड़ी को देखता और सोचता- बॉस, थोड़े दिन और नशा करते तो इसके बगल में तुम होते.

वो इतना हैवी एडिक्ट रहा कि इंजेक्शन लगा-लगाकर उसने पूरा पैर ही सड़ा डाला. नशेड़ियों के साथ ये आम है. इंजेक्शन से नसें गुम होने लगती हैं, तब नई नसें खोजनी होती हैं. जख्म बन जाता है लेकिन तलब नहीं जाती. 

आज मैं एक ट्रैवल कंपनी चलाता हूं. वो बेटा, जिसे नाले के पास जमने के लिए छोड़ दिया था- अब वो मुझसे भी फिट क्लाइंबर है. 13 साल की उम्र में 16 हजार फुट चढ़ चुका है. मेरे बारे में सब जानता है और कभी-कभी मुझे चिढ़ाता भी है.

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First published: August 1, 2019, 10:26 AM IST
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