#HumanStory: IIT ग्रेजुएट जिसने किसानों के साथ काम करने को छोड़ दी मल्टीनेशनल की नौकरी

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 26, 2019, 10:05 AM IST
#HumanStory: IIT ग्रेजुएट जिसने किसानों के साथ काम करने को छोड़ दी मल्टीनेशनल की नौकरी
IIT पास मनीष कुमार खेती की एडवांस तकनीकें किसानों को सिखा रहे हैं

मां को बहुत मलाल है कि IIT के बाद उनका बेटा गांव में क्यों है. उसकी तकलीफ और बढ़ जाती है जब आसपड़ोस के लोग दबी जुबान में कहें- 'फेल कर गया होगा या नौकरी नहीं मिली होगी. IIT से होता तो शहर में लाखों कमा रहा होता'.

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बड़ी मुश्किल से भैया के जानने वाले तीसेक किसान जमा हुए थे. सबके चेहरे पर यही भाव था कि 20-22 साल का ये लड़का हमारा वक्त बर्बाद कर रहा था. ऑर्गेनिक फार्मिंग के बारे में मैंने सारी कथा बांच दी तो एक के पूछा- ये बताओ कि फ्री में क्या मिलेगा? बीज? खाद? मैंने कहा- कुछ भी नहीं. फ्री में आपको सिर्फ ट्रेनिंग मिलेगी और फसल उगाने-बेचने में मदद.

सुनते ही वो सारे किसान उठे और बड़बड़ाते हुए चले गए. मैं IIT पास था लेकिन उससे ही कनविंस करना तो नहीं आ जाता! पढ़िए, बिहार के मनीष कुमार को.

ट्रांसफर वाली नौकरी करते मां-पापा की औलादों को घुमक्कड़ी का शौक पालना ही होता है, मन चाहे या नहीं. हमारे साथ भी यही हुआ. पापा सरकारी क्लर्क थे. हर दो-तीन साल में ट्रांसफर होता. हमारा सामान जितना खुलता, उससे ज्यादा बंधा रहता. कभी सजा-सजाया घर या ड्राइंगरूम नहीं देखा. तरह-तरह के स्कूलों में पढ़ा. पूर्णिया में एक स्कूल में रहना-खाना-पढ़ना सब 300 रुपए सालाना था. वहां हॉस्टल के एक कमरे में 20 लड़के रहते. ऐसे में पढ़ना क्या होगा, सोना भी बड़ी मुश्किल से हो पाता.

खाने में कंकड़ और बिस्तर में खटमल. हम बच्चे मौज में आते तो तुकबंदियां गाया करते. 10वीं की परीक्षा देने बैठा तो हिसाब लगाया, वो मेरा आठवां स्कूल था.

10वीं की परीक्षा देने बैठा तो हिसाब लगाया, वो मेरा आठवां स्कूल था (फोटो- प्रतीकात्मक)


बीए के बाद कोई एग्जाम देकर बैंक में काम करूंगा. यही सबसे बड़ा सपना था. IIT के बारे में पहली बार अपने एक सर से सुना. वो कह रहे थे कि इस पढ़ाई के बाद नौकरी मिलती ही मिलती है, कोई और एग्जाम देने की जरूरत नहीं. मेरे सपने में थोड़ी हेरफेर हो गई- अब मैं IIT की सोचने लगा था. खड़गपुर के लिए सलेक्शन हुआ तब घरवालों को और खुद मुझे इसका मतलब नहीं पता था.

पापा को एसडीओ ने फोन करके बधाई दी. तब मेरे लौटने पर उन्होंने पहली बार मेरी पीठ थपथपाई. पहली बार ही मुझे भी अंदाजा हुआ था कि मैंने कोई बड़ा एग्जाम निकाल लिया है.
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नई पढ़ाई, नए दोस्तों के बीच काफी कुछ बदला. अमूमन मैं शिकायतों से भरा रहता था. पापा के ट्रांसफर के साथ हमारी भटकन, संगी-साथी छूटना, स्कूल के नाम पर घरवालों का ठंडा रवैया सब परेशान करता. नया-नया था तो दुखड़ा सुनाते हुए अपने जनरल क्लास में सफर और टाट पर बैठकर पढ़ाई के किस्से सुनाता.

मुझे बड़ी तकलीफ थी कि हम चार लोगों के परिवार के पास रहने को एक ही कमरा है. शिकायतों का सिलसिला एक रोज छन्न से छनककर टूटा.

IIT में ही पढ़ने वाला एक दोस्त मुझे अपने साथ लेकर एक आदिवासी बस्ती पहुंचा. बस्ती क्या, चादरों, टिन और गत्तों से घिरे हुए झोपड़े थे. दरवाजे के नाम पर पत्तों और लकड़ियों की खपच्चियां. बच्चे बजबजाती नाली के पास खेलते हुए. उतने में भीतर से मां आई और हाथ में एक सकोरा दे दिया- भात और नमक. गंदगी में सने बच्चे नाली के पास ही बैठकर वो खाने लगे. उस रोज के बाद मेरे सारे मलाल धुल गए.

किसानों के पास बीसेक साल के लड़कों की बात सुनने की कोई वजह नहीं थी (फोटो- प्रतीकात्मक)


किसानों के साथ मिलकर ऑर्गेनिक फार्मिंग के बारे में सोचा तब IIT का फाइनल था.

बिहार में अपने गांव चकदरिया से शुरुआत की. घर गया. भैया से खूब सिफारिश की, जोड़-तोड़ लगाया, तब जाकर 30 के लगभग किसान मेरी बात 'सुनने' के लिए आए. कुछ भी फ्री नहीं सुनकर आखिर में बड़बड़ाते हुए लौट भी गए. कोई कहता- शहर में रह आया है तो दलाली सीख गया है. कोई कहता- फेल हो गया होगा इसलिए गांव चला आया. खेती से जुड़ने का मन बनाना जितना आसान था, शुरुआत उतनी ही मुश्किल.

पूरी जिंदगी मिट्टी-पानी गोड़ते बिता चुके किसानों के पास बीसेक साल के लड़कों की बात सुनने की कोई वजह भी नहीं थी.

साल 2010 की बात है. तब बिहार में बहुत कम बारिश हुई थी. मैंने किसानों को गेहूं की बजाए राजमा या फिर सूरजमुखी की खेती करने को कहा. कुछ किसान राजी भी हो गए. फसल अच्छी हुई. किसानों को कुछ भरोसा तो हुआ लेकिन इसके बाद भी IIT ग्रेजुएट की कहानी में सिंड्रेला वाला मोड़ नहीं आया.

मनीष कहते हैं- खेती के पारंपरिक तौर-तरीकों पर भरोसा करने वाले किसानों को राजी करना सबसे मुश्किल है. पहले तो वो आपको सुनने से भी खारिज कर देंगे. सुनने को तैयार भी हुए तो अपनाएंगे नहीं. लगभग सालभर की कोशिश के बाद एक गांव खेती के एडवांस तरीके अपनाने को तैयार हुआ. फसल भी अच्छी हुई.

अब अगर आपको लगे कि बगलवाला गांव बस देखकर ही भरोसा कर लेगा तो नहीं, उन्हें समझाने के लिए भी आपको पूरा साल खर्चना होगा, जैसे पिछले पर किया था.

किसानों को वैज्ञानिक तरीके से फसल उगाने की ट्रेनिंग देते हैं (फोटो- प्रतीकात्मक)


साल 2015 में उड़ीसा में काम शुरू किया. वहां भाषा बड़ी दिक्कत थी. हम एकदम अंदर-अंदर आदिवासी गांवों में जाते. वहां उड़िया, संथाली बोलने वाले मिलते. हिंदी भी थोड़ी-बहुत समझ लेते और कई लोग तो अंग्रेजी में अपना नाम भी बता पाते थे.

शर्म आती थी. हम कहने को बड़ी पढ़ाई का तमगा सजाए घूम रहे थे कि लेकिन भाषा के नाम पर एकदम शून्य थे.

दुभाषिया रख तो लेते लेकिन वो कभी भी आपके भाव उनतक नहीं पहुंचा पाता. मैंने और मेरी बिजनेस पार्टनर पूजा भारती ने उड़िया सीखनी शुरू की. अब हम फर्राटे से उड़िया बोलते हैं. किसानों को वैज्ञानिक तरीके से फसल उगाने की ट्रेनिंग देते हैं. एक वक्त पर एक किसान भी हमें सुनने को तैयार नहीं था, आज हमारे साथ 5000 किसान जुड़े हुए हैं.

हाल ही में IIT में मुझे यंग एचीवर अवॉर्ड मिला. खूब खुश था. लगा, मेहनत सफल रही. तभी मां का फोन आया. 5 मिनट की इधर-उधर के बाद वो मुद्दे पर आ गईं- 'जो करना है, इतने साल कर लिए. अब तो अच्छी नौकरी खोजो और शादी-ब्याह करो.'

हंसते हुए मनीष याद करते हैं. 'मां की तमाम बातचीत का अंत इसी बात पर होता है.'

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First published: August 26, 2019, 10:05 AM IST
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