#HumanStory: साइकेट्रिस्ट का तजुर्बा- 8 साल के उस बच्चे को घरवालों ने खूब पीटा ताकि डिप्रेशन भाग जाए

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 27, 2019, 10:10 AM IST
#HumanStory: साइकेट्रिस्ट का तजुर्बा- 8 साल के उस बच्चे को घरवालों ने खूब पीटा ताकि डिप्रेशन भाग जाए
बच्चा इतना उदास था कि उसे मिलकर मैं भी उदास हो गया (प्रतीकात्मक फोटो)

सिर पर दोनों तरफ तार, हाथ-पैर बंधे हुए. करंट की पहली लहर जाते ही मरीज को झटकों का दौरा पड़ता है. होश लौटने पर उसे कुछ याद नहीं रहता. फिल्मों और किताबों में इलेक्ट्रिक शॉक पर हजारों किस्से हैं, जहां 'जल्लाद' डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ गुस्सा उतारने के लिए मरीज को शॉक देते हैं.

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मनोचिकित्सक डॉ उज्ज्वल सरदेसाई मेंटल हॉस्पिटल में काम करने का 3 दशकों का तजुर्बा बांटते हैं.

एक मरीज अस्पताल लाया गया. उसने अपने पिता को चाकू से गोद-गोदकर मार डाला. उसके बाद उसी खूनी खंजर के साथ वो गांवभर घूमा. बड़ी मुश्किल से बांध-बूंधकर अस्पताल लाया गया. पहले हमें लगा कि उसे पैरानॉइड स्कित्जोफ्रेनिया है. उसमें आवाजें सुनाई देती हैं जो चीखने, मारने को उकसाती हैं. मर्ज जानने के लिए मैंने बातचीत शुरू की:

मैं- तुमने अपने पिता को क्यों मारा? क्या कोई आवाज तुम्हें ऐसा कह रही थी?

मरीज- बिल्कुल नहीं. कोई आवाज नहीं. बस मेरा मन हुआ और मार दिया.

इंपल्सिव स्कित्जोफ्रेनिया का ये पहला मामला था. इसके मरीज को अचानक कोई ख्याल आता है और वो उसे पूरा करना चाहता था. उस शख्स को अपने पिता पर गुस्सा, डर, दुख कुछ नहीं था. सुबह उठते ही उसे बस मारने का दिल किया और उसने मार दिया.

इलाज शुरू हुआ. एक रोज मैं OPD में था तभी जोर से कांच तोड़ने की आवाज आने लगी. लोग चीखते हुए वार्ड से बाहर भागने लगे. उसी मरीज पर कांच तोड़ने की झक सवार थी. नर्सिंग स्टाफ घबराया हुआ था. पहले अपने पिता को मारा, अब हमें भी मार देगा. मैं अकेला भीतर गया. वो दनादन कांच तोड़ रहा था. सिर्फ कांच. और कुछ नहीं.

मैंने चिल्लाते हुए पूछा- ये क्या हो रहा है?
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मरीज- साहब, कांच तोड़ रहा हूं.

मैं- खुद को रोक सकते हो?

मरीज- नहीं साहब, आप कुछ करो.

मेरे हाथ में इंजेक्शन था. मैं उसके पास पहुंचा और इंजेक्शन लगा दिया. वो तुरंत सो गया. उठा तो एकदम शांत था.

मनोचिकित्सक डॉ उज्ज्वल सरदेसाई 30 सालों से काम कर रहे हैं


कांच तोड़ते हुए वो जानता था कि उससे गलत हो रहा है. वो रुकना भी चाहता था लेकिन नर्सिंग स्टाफ डर गया.

डर की कोई बात ही नहीं थी. उस वक्त मरीज को सिर्फ कांच तोड़ने की इंपल्स थी, किसी को मारने की नहीं. जब कांच तोड़ने की इच्छा रुकती, तभी तो कोई दूसरी इच्छा जागती. मरीज अब ठीक है लेकिन गांववालों ने उसे अपनाने से इन्कार कर दिया. वो वापस मेंटल हॉस्पिटल लौट आया. अब यहीं बाग-बगीचा संभाल रहा है.

30 बरस से ऊपर हुए काम करते. दिल-दिमाग की सेहत को लेकर न तब लोगों का दिल खुला था और न अब.

लोग नई बोली सीखते हैं, नए देश घूमते हैं, कपड़ों में नयापन लाते हैं, शरीर की सेहत के जतन करते हैं लेकिन मन तंदुरुस्त रहे, इसपर किसी का ध्यान नहीं. वो अपने-आप ही ठीक रहेगा और जहां जरा भी गड़बड़ हो, एलान हो जाता है कि आदमी पागल हो चुका है.

जहां मैं काम करता हूं, वो अस्पताल इंदौर के बाणगंगा में है. बाणगंगा कहें तो कमोबेश तमाम इंदौरियों को एक ही ख्याल आता है- पागलों का अड्डा. कोई गड़बड़ करे तो कहते हैं, चलो बाणगंगा छोड़ आएं. मजाक और बढ़ जाए तो बाणगंगा छोड़ आगरा पहुंच जाते हैं.

हालात इतने खराब हैं कि मानसिक चिकित्सालय का नाम बदलकर कुछ और रखने के लिए अर्जी लगाई जा चुकी है.

मानसिक चिकित्सालय का नाम बदलकर कुछ और रखने के लिए अर्जी लग चुकी है (प्रतीकात्मक फोटो)


साल 1993 में वर्धा से काम शुरू किया. पहली बार ही mania के मरीज को देखने का मौका मिला. मैं और मेरा साथी डॉक्टर कमरे में पहुंचे. भीतर मरीज हवा से झगड़ रहा था. मेरा साथी डॉक्टर कद-काठी में बेहतर था लेकिन मेरे पीछे हो गया. मैं मरीज से बात करने की कोशिश कर रहा था और उधर मेरे कंधे पर साथी डॉक्टर का दबाव बढ़ रहा था. डरा मैं भी था लेकिन वक्त के साथ डर चला गया.

सालों की प्रैक्टिस में रोज कईयों मामले आते हैं. हर चेहरा उदास. सबकी अलग तकलीफ. लगभग सभी जिंदगी से हारे हुए. कई मामले भीतर तक हिला देते हैं. एक बार एक कैदी औरत लाई गई. वो 'सुन्न' थी. खाना-पीना, बोलना, किसी भी बात पर प्रतिक्रिया देना सब बंद था.

भर्ती करने से पहले हमने उसका प्रेगनेंसी और hiv टेस्ट किया. ये औपचारिकता है जो एडमिट हो रहे हर मरीज के साथ की जाती है.

रिपोर्ट आई. वो प्रेगनेंट थी. हमने जेल प्रशासन से लिखित में पूछताछ की. वहां से जवाब आया- नहीं, प्रेगनेंट तो वो हो नहीं सकती. 3 हफ्ते पहले पीरियड्स में ज्यादा ब्लीडिंग हो रही थी तो जेल के अस्पताल में ही उसकी सफाई हुई. तब से ही वो ऐसी हो गई है. इधर रिपोर्ट कुछ और कह रही थी.

पूरा जेल महकमा हिल गया. सवाल-जवाब होने लगे. औरत की हालत से किसी को कोई मतलब नहीं था.

मैं बार-बार अपनी बात कहना चाहता था लेकिन मुझे मौका नहीं मिला. 3 दिन बार दोबारा प्रेगनेंसी टेस्ट और अल्ट्रासाउंड हुआ. अबकी रिपोर्ट निगेटिव थी. जेल प्रशासन अब जाकर सुस्ताया. मान लिया गया कि पहली रिपोर्ट ही गलत थी. जबकि मामला कुछ और था. प्रेगनेंसी गिराए जाने के 21 दिन बाद रिपोर्ट निगेटिव हो जाती है और अल्ट्रासाउंड में भी कुछ नहीं आता.

जेल में उसके साथ जो भी हुआ, वही उसके सदमे की वजह था.

एक बार एक कैदी औरत लाई गई जो 'सुन्न' थी (प्रतीकात्मक फोटो)


मेरी तमाम कोशिशों के बाद भी वो खुली नहीं. हालांकि दवाओं पर उसका शरीर रिस्पॉन्ड करने लगा था. जेलवाले उसे वापस ले जाना चाहते थे. मैंने हालत देखते हुए कोर्ट से उसे दूसरी जेल में शिफ्ट करने की अर्जी लगा दी, जो मान भी ली गई. उसके जाने के बहुत दिनों बाद तक उसका गुम चेहरा और सूनी आंखें मुझे याद आती रहीं.

ऐसे ही वो बच्चा! बच्चे गुस्सा होते हैं, रोते हैं, खुश होते हैं. हमारे पास आया 8 साल का वो बच्चा सीधा कहता- मैं उदास हूं. मुझे मरना है.

पढ़ा था कि बच्चों में डिप्रेशन डायग्नोस नहीं होता. लेकिन फूले-फूले गालों वाला वो बच्चा इतना उदास था कि उसे मिलकर मैं भी उदास हो गया. खुदकुशी का ख्याल निकलना जरूरी था. चौबीसों घंटे चौकसी की जरूरत थी. घरवालों से बात की. बच्चे की हालत पर परेशान मां-बाप के भाव एकदम से बदले. भर्ती करने से इनकार कर दिया.

घर लेकर गए और उसकी खूब पिटाई की. मरना चाहता है! ऐसा क्या हो गया तेरे साथ! ऐसा क्या कर दिया हमने! घर की परेशानी बाहर बताता है!

15 दिनों बाद बच्चे को दोबारा बुलाया था. नहीं आया तो मैंने सोशल वर्कर को उसके घर भेजा. बुलाहट पर वो आए तो लेकिन मां-बाप एकदम कटे हुए थे. बच्चा एकदम चुप. बहुत बहलाने पर पिटाई का किस्सा सुनाया. दवा लेकर वो चले गए. फिर वो कभी नहीं आया.

मेंटल हॉस्पिटल को लेकर तमाम तरह के झूठ रचे गए हैं (प्रतीकात्मक फोटो)


मेंटल हॉस्पिटल को लेकर तमाम तरह के झूठ रचे गए हैं. यहां बाल बिखराई औरतें होती हैं, खंजर लिए मर्द होते हैं. बिस्तर में बांधकर न रखें तो ये जान ले लेते हैं.

हॉस्पिटल की ऊंची-ऊंची दीवारें और अक्सर इसका शहर से बाहर होना भी इसे भुतहा रहस्यों से ढंक देता है. असल में ये अस्पताल भी मौसमी या क्रॉनिक बीमारियों के अस्पताल की ही तरह होते हैं. यहां हर कोई काट खाने को नहीं दौड़ता.

अस्पताल में स्कित्जोफ्रेनिया का एक मरीज बागवानी करता है. लगभग 6 एकड़ जमीन की देखभाल के लिए 2 ही माली हैं. ऐसे में हरियाली पसंद करने वाले इस मरीज ने खुद ही पेड़ लगाने का काम संभाल लिया. कई मरीज रसोई में काम करते हैं. कई दूसरे मरीजों की देखभाल करते हैं.

MBBS के बाद जब साइकेट्री करने की सोची तब दोस्तों-घरवालों ने खूब रोका. बार-बार कहा- पागलों को देखोगे तो तुम भी पागल हो जाओगे.

वे दोस्त थे, घरवाले थे. यहां डॉक्टरों का भी यही हाल है. हमारे यहां से रेफर किए हुए मरीजों को मेडिसिन वाले भगा देते हैं. पागल हो तुम, वहीं इलाज करवाओ. यहां तक कि हमें भी शक की नजरों से देखा जाता है. साइकेट्रिस्ट डॉक्टर नहीं होता. पागलों के बीच वक्त बिताता लगभग पागल होता है, जो कपड़े शऊर से पहनता और बात तमीज से करता है. बस.

बहुत से लोग मानते हैं कि डॉक्टर मरीज पर गुस्सा होता है तो उसे शॉक देता है (प्रतीकात्मक फोटो)


इलेक्ट्रिक शॉक को लेकर भी कई वहम हैं. बहुत से लोग मानते हैं कि डॉक्टर मरीज पर गुस्सा होता है तो उसे शॉक देता है. या फिर शॉक इलाज का बेहद क्रूर तरीका है. शॉक रूम में ले जाने की तैयारी करते हैं तो मरीज खूब चीखते-चिल्लाते हैं. भागने की कोशिश करते हैं. गालियां देते हैं. कोसते हैं. हम उन्हीं मरीजों को शॉक ट्रीटमेंट देते हैं, जिनपर दवाएं बेअसर हो जाती हैं.

शॉक भी 1 सेकंड से लेकर 8 सेकंड का होता है. हम 90 वोल्ट से चालू करते हैं और बहुत हाई करना हो तो 230 वोल्ट तक जाते हैं. पहले ही शॉक में मरीज बेहोश हो जाता है. इसके बाद उसे कुछ याद नहीं रहता. एक्यूट डिप्रेशन के मरीजों पर ये ट्रीटमेंट बहुत अच्छा असर करता है.

कई मरीज ऐसे भी हैं जो हर महीने शॉक लेने के लिए खुद पहुंचते हैं. इसके बाद वे नॉर्मल जिंदगी जीते हैं, जब तक कि अगले डोज का वक्त न आ जाए.

30 साल से ज्यादा हुए. रोज उदास, रोते हुए या गुम चेहरे देखता हूं. कई बार उनकी तकलीफ खुद के भीतर भी उतरने लगती है लेकिन जैसे-जैसे मरीज ठीक होता है, उदासी भी धुल जाती है.

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First published: August 27, 2019, 10:10 AM IST
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