#HumanStory: पीरियड्स में छुट्टी लेने पर कटते थे पैसे, हटवा दी बच्‍चेदानी

महाराष्ट्र के बीड जिले में चंद सालों में हज़ारों औरतों की बच्चेदानी निकाली गई. कम उम्र में कोख गंवा चुकी ये औरतें गन्ना कटाई करती हैं. पीरियड्स के दौरान छुट्टी लेने पर जुर्माना लगता है. ठेकेदार की छेड़छाड़ और बलात्कार आम है. छुटकारा पाने के लिए वे बच्चेदानी निकलवा रही हैं. news18 ने उन महिलाओं से बात की. पहली कड़ी में पढ़ें, 'जनाबाई' को.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: July 16, 2019, 3:28 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: July 16, 2019, 3:28 PM IST
(कोऑर्डिनेशन और अनुवाद- मनीषा सीताराम घुले, प्रेसिडेंट- महिला विकास मंच फेडरेशन, बीड)

चौदह बरस की 'जनाबाई' को सफेद घोड़े वाले राजकुमार के ख्वाब देखने का मौका नहीं मिला. एक रोज मजदूरी से लौटी तो शादी का जिक्र सुना. साल भर बाद ही गोद में महीने भर का बच्चा लिए वो गन्ना कटाई के लिए निकल पड़ी. लकड़ी का घर- चटाई की छत. 14-15 घंटे काम. हाथ खूनाखून रहते. गन्ने की ढेरियां उठाने से कमर-गर्दन में दर्द. इस बीच 'पीरियड्स' आए. छुट्टी ली. ठेकेदार आया. गालियां दीं. अकेली पाकर छेड़छाड़ की और चलता बना. छुट्टी के पैसे कटे, सो अलग.

जनाबाई ने 23 की उम्र में बच्चेदानी का ऑपरेशन करा लिया. वो बताती हैं- बचने के लिए बच्चेदानी निकलवाई. अब कमर में दर्द रहता है. बुखार आता है. गन्ना कटाई छूटी और पति भी.

छुटपन की जो बात आज भी अच्छी तरह याद है, वो है इंतजार. किसान घर में जन्मी. मां-बाप के पास जमीन का छोटा टुकड़ा था लेकिन वो दूसरों के खेतों में काम करते. उनके खेतों, में जिनके पास बोरवेल होता. हमारा टुकड़ा सूखता रहा और धीरे-धीरे हमारा इंतजार भी. थोड़ी बड़ी हुई तो दूसरे बच्चों की तरह मैं भी खेतों में काम करने लगी. काम करते-करते ही एक दिन शादी हो गई. तब मेरी उम्र यही कोई 14-15 रही होगी- अंदाजे से जनाबाई कहती हैं.

गन्ना कटाई करने वाली महिलाएं कम उम्र में यूटरस निकलवा रही हैं (प्रतीकात्मक फोटो)
गन्ना कटाई करने वाली महिलाएं कम उम्र में यूटरस निकलवा रही हैं (प्रतीकात्मक फोटो)


सालभर के भीतर गोद में बच्चा आ गया. लड़का. पति खुश था. अब कोई झंझट नहीं.

एक दिन वो घर आया तो हाथ में पैसों की छोटी गड्डी थी. थमाते हुए कहा- तैयारी कर लो, हमें कल निकलना है. कहां? किसलिए? इसका जवाब रास्ते में ही मिल पाया. ट्रक में हमारी तरह के चालीस-एक जोड़े होंगे. जवान. अधेड़. सब उम्र के. किसी-किसी के पास दुधमुंहा बच्चा था तो कई बच्चे काम में हाथ बंटाने लायक थे. खुले ट्रक में हिचकोले खाते बच्चे रो रहे थे. मर्द बतियाते हुए बीड़ी पी रहे थे. औरतें बच्चे संभाल रही थीं.
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कई सालों से आ-जा रही महिलाओं ने पहली बार जा रही औरतों को समझाया- 'हम कर्नाटक जा रहे हैं, गन्ना कटाई के लिए. आदमी गन्ने काटेंगे और औरतें ढेरियां बनाएंगी. तुम लोग तसल्ली रखो.'

जनाबाई याद करती हैं- तसल्ली देते हुए खुद उनके चेहरे रुंआसे लग रहे थे. मैं अंदाजा लगाती रही और ट्रक के रुकने का इंतजार करती रही. बीड़ी-खाने के लिए रुकते-ठहरते हम 2 दिन, 3 रातों के बाद कर्नाटक पहुंचे.

चारों ओर गन्ने के खेत. 'साइट' के पास ही हमें अपने घर बनाने थे. लकड़ियां मिलीं. जोड़-तोड़कर झोपड़ी बनाई. छत की जगह चटाई रखी गई. दरवाजे की जगह चादरें. खिड़की की जरूरत नहीं थी. चटाई से आसमान झांक रहा था.

गन्ने के खेत में काम करने वाले मजदूरों को कई महीने अस्थायी झोपड़ों में बिताना होता है (फोटो- फर्स्टपोस्ट)
गन्ने के खेत में काम करने वाले मजदूरों को कई महीने अस्थायी झोपड़ों में बिताना होता है (फोटो- फर्स्टपोस्ट)


मैं जवान थी. गरीबी देखी थी, लेकिन तकलीफ नहीं. बात-बात पर ठिठोली करती. पति भी खुश लग रहा था.

अगले कई महीनों के लिए यही हमारे घर थे. आसपास बीस-एक ऐसे ही घर तैयार थे. उस रात हमें आराम करने के लिए कहा गया. अगली सुबह काम में लगना था. जमीन पर चादर बिछाई और डेढ़-मासे (डेढ़ महीने) बच्चे को लिटाया. खुरदुरी जमीन पर लेटते ही वो चीखकर रोने लगा. आसपास से लगभग हर झोपड़े से ऐसी ही आवाजें आ रही थीं.

फिर तो चटाई की छत से नई जगह का आसमान देखते हुए सुबह हो गई.

पहले भी अपने गांव में दूसरों के खेत में काम किया करती थी. लेकिन जितना सोचा था, ये काम उससे कहीं मुश्किल था. जोड़े में काम होता. आदमी गन्ने काटते. औरतें उनकी ढेरी बनाकर, बांधकर ट्रक में 'लोड' किया करतीं. एक-एक बार में तीस किलो से ज्यादा का ढेर उठाकर ट्रक में रखना होता.

शाम होते-होते गर्दन टूट गई. कमर में तेज दर्द होने लगा. रात सोने पर दर्द कम होता, उससे पहले दूसरा दिन आ गया. फिर से वही काम. जना याद करती हैं- शादी के बाद दूसरी दिवाली थी. मेरा पसंदीदा त्योहार. घर पर पूरी- बैंगन बनाती. पैसे हों, न हों- इस दिन गुझिया जरूर बनती. मेहमानों के लिए चकली बनाई जाती. ये पहला साल है, जब दिवाली के दिन भी सुबह से गन्ना काटने-ढोने का काम किया.

एक बार में 30 किलो वजनी ढेर उठाना होता है (फाइल फोटो- न्यूज18)
एक बार में 30 किलो वजनी ढेर उठाना होता है (फाइल फोटो- न्यूज18)


रात तक पेट में दर्द होने लगा था. अगली सुबह मेरा 'महीना' आ चुका था.

गन्ना ढोना बड़ी मेहनत का काम है. तीस किलो एक बार में उठाकर ट्रक पर लोड करना. मैंने उस दिन छुट्टी कर ली. जोड़े में ही काम होता है इसलिए मेरा पति भी खाली था. छुटपुट खरीददारी के लिए वो शहर चला गया. कई दिनों बाद बच्चे के साथ रहने का मौका मिला. उसे नहला-धुला रही थी कि तभी ठेकेदार आया. चादर हटाकर सीधे भीतर घुसा और गालियां देने लगा. जना रुक-रुककर बताती हैं- मना करने के बाद भी मेरा हाथ पकड़ लिया. मेरे आदमी ने उससे एडवांस पैसे लिए थे. चीखती तो काम चला जाता.

मैं दबी-दबी आवाज में मना करती रही. वो छूता रहा और गालियां देता रहा. थोड़ी देर बाद वो चला गया. जमीन पर पड़ा बच्चा चीखें मारकर रो रहा था. मैं आहिस्ते-आहिस्ते रोती रही.

शाम को आसपास के मर्द-औरतें खेत से लौट आए. पति भी शहर से लौट आया. मेरे लिए तेल-साबुन लाया था. चाव से दिखाता रहा. मैंने उसे कुछ नहीं बताया. साथ की औरतों को भी नहीं. झोपड़े में अकेली छूटी औरतों के साथ ये अक्सर होता है. जानती सब हैं लेकिन कोई भी अपने आदमी से नहीं कहती. यहां तक कि आपस में भी नहीं. मानकर चलते हैं कि औरत जात हैं तो सहना तो होगा ही.

जना सपाट आवाज में कहती हैं- छेड़छाड़ की बात जानेगा तो आदमी वापस घर में नहीं लेगा. रख भी ले तो हरदम शक करेगा. औरतें इसीलिए चुप रहती हैं.

मजबूरी में हजारों महिलाएं यूटरस हटाने का ऑपरेशन करवा रही हैं (प्रतीकात्मक फोटो)
मजबूरी में हजारों महिलाएं यूटरस हटाने का ऑपरेशन करवा रही हैं (प्रतीकात्मक फोटो)


गन्ना कटाई करते 6 महीने बीते. लौटते हुए हिसाब हुआ. ठेकेदार ने उन सारे दिनों के पैसे काटे, जिनमें मैं महीने से थी. मैं अकेली नहीं थी. सारी औरतों के साथ यही हुआ था. लौटते हुए मर्द कुड़कुड़ाते रहे, जैसे 'महीना' आना हमारी 'गलती' हो. अगली बार भी यही सब हुआ. उसके अगले साल भी यही. महीना आने पर छुटपुट काम तो हो जाते लेकिन गन्ना लोड करने का काम काफी मुश्किल रहता है. सीढ़ी चढ़कर ट्रक पर ढेर लोड करना होता है. ऐसे में एक रोज भी छुट्टी कर लो तो सीधे 700 रुपये कट जाते.

मेरे आदमी ने कहा- बच्चेदानी ही हटवा लो. झंझट खत्म हो जाएगा! मुझे भी जंचा. बच्चेदानी हटी तो ठेकेदार की छेड़छाड़ पर बच्चा ठहरने का डर भी चला जाएगा.

ऑपरेशन के लिए उसी ठेकेदार से उधार लिया. बच्चेदानी हटी. अब मैं पूजा-पाठ कर पाती. सारे महीने बेरोक-टोक घर में घूम पाती. रसोई बना पाती थी. गन्ने के काम पर गए. नवंबर से मार्च तक बिना नागा (छुट्टी) रोज काम किया लेकिन बिना पैसों के. थोड़ा-थोड़ा करके ठेकेदार का उधार चुकाने में हमें कई साल लग गए.

मैं थकने लगी थी और इस बीच पति का रवैया भी बदलने लगा था. बच्चेदानी हटवाई, तब 23 की थी. अब लगभग 35 की हूं.

झुककर चलती हूं. कमर में दर्द रहता है. घर के काम भी मुश्किल होते हैं. 4 साल हुए- गन्ना कटाई के लिए नहीं जा रही. पति गुस्सा रहने लगा है. पहले गुस्सा था क्योंकि महीना आने पर भारी काम नहीं होते थे. अब कहता है- मैं किसी काम की नहीं रही. औरंगाबाद में काम करता है. कभी आता है तो कोसता है और चला जाता है. मेरे या बच्चों के लिए अस्पताल में देने को भी इसके पास पैसे नहीं. ये वही आदमी है जो शादी के बाद मना करने पर भी मेरे लिए कंघी-फुलेल लाता था.

'गन्ना कटाई का वक्त आता है तो पूरा गांव खाली हो जाता है, सिवाय हम जैसियों को छोड़.'
(निजता बनाए रखने के लिए पीड़िता का नाम बदल दिया गया है.)

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First published: July 15, 2019, 10:32 AM IST
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