#HumanStory: लड़कीवाले आते हैं और टॉयलेट पर ताला देख लौट जाते हैं

पाहुने आने वाले हों तो दिनों पहले से तैयारियां शुरू हो जाती हैं. मैं दूसरे गांव से साग-सब्जियां लाता हूं. मां रसोई में जुटती है. दो तरह की मिठाइयां बनती हैं, साथ में दो-तीन तरह की रसीली-सूखी सब्जियां. घर सजता है. मेहमान आते हैं. खाना-पीना करते हैं और चले जाते हैं. कभी साफ मना करके तो कभी 'बाद में बताते हैं', बोलकर. हमारा 8 एकड़ खेत सूखा पड़ा है. दिहाड़ी पर काम करने वाले किसान से कोई बेटी नहीं ब्याहता.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: July 3, 2019, 11:49 AM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: July 3, 2019, 11:49 AM IST
(चार महीने बाद पीएम नरेंद्र मोदी ने मन की बात की. इस दौरान उन्होंने जिस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया, वो है पानी बचाने की अपील. देश के ज्यादातर हिस्सों में पानी को लेकर जो हाहाकार मचा हुआ है, उसे फोकस करते हुए पीएम ने जल संरक्षण पर जन आंदोलन चलाने की अपील की. news18 ने देश में बढ़ते जलसंकट पर बाकायदा एक मुहिम छेड़ी हुई है, जिसमें सूखाग्रस्त इलाकों में रहने वालों का दर्द उन्हीं के लफ्जों में बताने की कोशिश की गई है. पढ़िए, इसी सीरीज़ की चुनिंदा कहानियां...)

देश का लगभग 44 प्रतिशत हिस्सा सूखे की मार झेल रहा है. मराठवाड़ा में हालात बदतर हैं, जहां तकरीबन 72 प्रतिशत जिलों में कई सालों से उपज नहीं. यहां के चेहरों की कहानियां इन ठंडे-बेजान आंकड़ों से ज्यादा डरावनी हैं.

तमाम उम्र मिट्टी में गुजार चुके किसान सड़क बना रहे हैं. उनके जवान लड़के शादी की आस में न खत्म होने वाला इंतजार झेल रहे हैं. बेटियां खुदकुशी कर रही हैं. इन हजारों-लाखों किस्सों के बीच संबाजी भाऊसाहेब निर्मल की अपनी कहानी है. संबाजी महाराष्ट्र के औरंगाबाद का वो चेहरा हैं, पानी की मार ने जिनकी जिंदगी रोक रखी है.

15 दिन पहले की बात है. लड़कीवाले घर आए. मैंने और मां ने खूब तैयारियां कीं. हमारे यहां खाने के बीच ही शादी-ब्याह का मामला पक्का हो जाता है.

हमने अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी. नाश्ता, खाना, मीठा सब बना. मैं उसदिन खासतौर पर नहाया था और क्रीज वाली शर्ट पहनी थी. बात आगे बढ़ने लगी. लगा, इस बार बात बन जाएगी. तभी टैंकर आ गया. बातचीत छोड़कर मैं और मां ड्रम-भगौने लेकर भागे. चारों ओर धक्का-मुक्की हो रही थी. मैं टैंकर के ऊपर चढ़ गया और पाइप लगा दिया.



मेहमान बैठक से ही सब देख रहे थे. हम लौटे तो बात कहीं और मुड़ चुकी थी. वे पानी की किल्लत पर पूछताछ करने लगे. मां संभल-संभलकर जवाब दे रही थी. मैं चुप था. हर बार की तरह इस दफे भी बात बिगड़ चुकी थी.
हम लड़की के परिवार को न्यौता देते हैं. और अक्सर ऐसा होता है कि वे आते ही उस रोज हैं, जब टैंकर आता है. टैंकर न भी आए तो पाखाने पर लटका ताला देखकर वो सब हाल समझ जाते हैं.

पिछले पांच सालों से मां मेरी शादी की कोशिश कर रही है. अकेला लड़का हूं. घर पर और कोई नहीं. कोई और वक्त होता तो लड़कीवाले इसी बात पर रिश्ता जोड़ लेते कि उनकी लड़की पर देवर-ननद की कोई जिम्मेदारी नहीं होगी. मेरे मामले में बात अलग है. घर पर पानी नहीं. चार से पांच दिनों में एक बार टैंकर आता है. आते ही लूट मच जाती है.

पूरा गांव पहले से तैयार रहता है. सारे जवान लड़के धक्कम-धक्का करते हैं. पकी उम्र की औरतें गालियां देती हैं. तब जाकर हर घर को थोड़ा-थोड़ा पानी मिल पाता है.

अब यही पानी अगले चार दिनों का सहारा है. कई बार मां मुझसे भी पानी छिपाकर रखती है ताकि 'ऐन मौके' पर काम आए. पड़ोसियों से दुख-दर्द बांट सकते हैं, नमक-शक्कर उधार ले सकते हैं लेकिन पानी नहीं.



'इन हालातों में लड़कीवाले अपनी बेटी कैसे ब्याहें. मैं भी बेटी का बाप होता तो यही सोचता' संबाजी खुद सवाल करते हुए खुद ही जवाब देते हैं.

किसान हैं. याद संभालने से लेकर जवानी तक खेत गोड़ाई, धान रोपाई की. हर मौसम की फसल लगाई. कपास, ज्वार-बाजरे की ऐसी फसल होती कि अनाज रखने को जगह कम पड़ती. अब सुबह उठते हैं, आसमान देख लेते हैं, मौसम की रिपोर्ट सुन लेते हैं. इसके बाद तय करते हैं कि खेत जाना है या नहीं. पिछले पांच सालों से खेत में न पानी है, न कोई फसल.

अब सुबह उठता हूं. मां के साथ मौसम, बारिश, पानी पर बात होती है, फिर निकल जाता हूं. गांव के बाहर सारे किसान टोली बनाकर काम के इंतजार में खड़े रहते हैं. जहां भी बड़ा काम मिले, वहीं दिहाड़ी पर चले जाते हैं. सूखे ने किसानों को मजदूर बना दिया है.

पकी उम्र में जा चुके अपने दोस्तों को शादी की आस लगाए देखता हूं तो दर्द होता है लेकिन मेरे लिए लड़कीवालों का इनकार दोहरी तकलीफ लेकर आता है. दो बरस का था, जब पिता नहीं रहे. मां ने सब संभाल लिया. घर संभालती, खेत का काम करती. नातेदारों की किचकिच झेलती और मुझे देखती. मैं बड़ा हो रहा था, सब समझने लगा था.



अब मैं खेत का भारी काम संभाल सकता हूं लेकिन सूखे की वजह से मां की मदद नहीं कर पा रहा. सोचता था कि शादी होगी, नई बहू आएगी तो उसका अकेलापन बांट लेगी. उसकी मान-मनौवल में मां अपने दर्द बिसार देगी. लेकिन ये भी नहीं हो रहा है. इधर गांव के लोग भी अपनी लड़कियां बाहर दे रहे हैं. ठीक ही है. शादी के बाद सिर उघाड़कर पानी के लिए धक्कामुक्की करती बहू कौन देखना चाहेगा!

जितनी बार मां को देखता हूं, हर बार बारिश को याद करता हूं. इंतजार में उसकी आंखें भी हमारे खेत जैसी सूखी दिखने लगी है. 

जब से जन्मा, घर में मां और अपना ही चेहरा देख रहा हूं. पहले एक गाय और दो बैल पाल रखे थे. सूखा पड़ने पर उन्हें भी बेच दिया. चारा महंगा था. पानी की हौद में नापकर पानी डालना पड़ता था. जानवरों की ठूंठ निकल आई थी. न भरपेट चारा मिलता था, न पीने को पानी. आखिरकार उन्हें बेचना पड़ा. बहुत याद आती है. गाय को बच्चे की तरह पाला था. पानी की मार ने हमसे अपने बच्चों को भी बिकवा दिया.

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