#HumanStory: बच्चे को है रेयर बीमारी: पिता का दर्द, पहली बार देख डर जाते हैं लोग

गांव में उसे सब पहचानते हैं. मुश्किल तब आती है जब कहीं बाहर जाएं. अनजान लोग चेहरा देखकर 'चमक' जाते हैं. चीखने लगते हैं. बच्चे उसे बंदर बुलाते हैं. पत्थर मारते हैं. हम लोग उसे लेकर कम ही बाहर जाते हैं. जाएं भी तो कभी अकेला नहीं छोड़ते.

News18Hindi
Updated: August 5, 2019, 10:29 AM IST
#HumanStory: बच्चे को है रेयर बीमारी: पिता का दर्द, पहली बार देख डर जाते हैं लोग
रतलाम के ललित को वरवोल्फ सिंड्रोम है
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Updated: August 5, 2019, 10:29 AM IST
रतलाम के ललित को वरवोल्फ सिंड्रोम है. यानी वो बीमारी, जिसमें शरीर पर बाल ही बाल उग आते हैं. चेहरा भेड़िए की तरह लगने लगता है. ललित की हथेलियों और तलवों के अलावा पूरा शरीर घने बालों से ढका है.

पिता बंकट पाटीदार कहते हैं- हम उसे कभी अकेला नहीं छोड़ते हैं. डर लगता है, कहीं कोई उठाकर न ले जाए.

पांच बेटियों के बाद ललित आया था. बच्चे को देखते ही नर्स चिंहुक गई. वैसे तो नए जन्मे बच्चे के शरीर पर बाल होते ही हैं लेकिन इसका चेहरा भी बालों से ढका था. जैसे सिर और चेहरा एक हो रहा हो. डॉक्टर को बुलाया गया. थोड़ा गौर से देखने के बाद उसने कहा- बच्चा बिल्कुल ठीक है. और फिर उसे शेव कर दिया. अब वो सामान्य बच्चों जैसा ही दिख रहा था. कुछ दिनों बाद फिर से चेहरे और शरीर पर वैसे ही घने बाल उग आए.

गांवभर के लोग उसे देखने आते. कोई हनुमान का अवतार कहता, कोई प्रणाम करता. अजीब लगता था.

मन्नतों से आया बच्चा है. रोज नजर उतारते. वक्त के साथ ललित बढ़ने लगा. दूसरे बच्चों की ही तरह वो भी तुतलाता, खड़े होने में डगमगाता. हम एकदम से सहम जाते. कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं! नजला-बुखार होता तो हम दोनों रात-रातभर सिरहाने बैठे रह जाते. वक्त के साथ किसी अनहोनी का डर कम होता गया लेकिन दूसरे डर साथ लग गए.

ललित अपने पिता बंकट पाटीदार के साथ


ललित का पूरा चेहरा तकरीबन दो इंच बालों से ढंका है. तमाम शरीर पर भी बाल ही बाल हैं. पहले दिन स्कूल लेकर गया तो टीचर से अलग से मिला. उन्हें सारी बातें समझाईं. बंकट याद करते हैं, उस रोज दिनभर स्कूल के आसपास ही रहा. डर लग रहा था कि ललित को कहीं कोई परेशानी न हो. स्कूल के बाद हम साथ लौटे. उसका चेहरा उतरा था. धीरे-धीरे वो खुला- बच्चे डरते हैं. साथ बैठते नहीं. साथ खेलते नहीं. खाना भी अकेले खाना पड़ा.
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बुखार हो तो बीमार बच्चे को प्यार मिलता है, तवज्जो मिलती है. यहां ललित बीमार तो था लेकिन लोग उससे डरते. शुरू-शुरू में उसे बच्चे बंदर बुलाया करते. छोटे बच्चे देख लें तो रोने लगते.

धीरे-धीरे गांव में लोग उसे पहचानने लगे. उसके आने पर डरना या टेढ़ी नजरों से देखना छोड़ दिया. स्कूल में भी ललित की दोस्ती हो गई.

खिलाड़ी बच्चा है हमारा. बंकट की आवाज में पिता का गुरूर है. स्कूल में खूब खेलता है. पढ़ाई में भी अच्छा है. ऐसे बच्चे से कौन दोस्ती नहीं करेगा! तब भी कई दिक्कतें हैं. खाना खाता है तो मुंह में कौर के साथ उसके ही बाल अंदर जाते हैं. कई बार खाते-खाते झुंझला जाता है. कितना ही पसंदीदा खाना हो, उसे कभी जल्दबाजी में या भरपेट खाते नहीं देखा. पहले थोड़ा शिकायत करता था लेकिन अब चुपचाप खाता है. पढ़ता है तो आंखों में बाल गिरे रहते हैं. बार-बार उन्हें हटाता है.

कानों पर बालों का इतना घना गुच्छा है कि उसे सुनाई भी ठीक से नहीं देता. हम बीच-बीच में बाल थोड़ा-थोड़ा काट देते हैं लेकिन वो बढ़कर वैसे ही हो जाते हैं.

किसी नई जगह जाओ या घर पर कोई पहली बार आए तो एकदम से 'चमक' जाता है


बूतेभर इलाज करवाया. देसी-विदेशी दवाएं. पूजा-पाठ. सब कुछ किया.

एक बार बहुत नामी डॉक्टर के पास उदयपुर लेकर गए. उन्होंने देखा. अमेरिका में अपने साथी डॉक्टर को फोन मिलाया. तब जाना कि दुनियाभर में सिर्फ 50 लोगों को यह बीमारी है. मेरा ललित उन्हीं में से एक है. डॉक्टर ने तसल्ली दी- 16-17 साल का होगा, हार्मोन्स बदलेंगे. हो सकता है कि तब धीरे-धीरे बाल अपने-आप गायब हो जाएं. अगर सर्जरी भी करना चाहें तो इससे पहले नहीं कर सकते. वापस लौटे तो हमारे पास दो शब्द थे, एक- इंतजार और दूसरा- उसकी बीमारी का नाम. हाइपरट्राइकोसिस. ये वो बीमारी है जिसने हमारे एकदम सामान्य बच्चे को दूसरों से अलग बना दिया.

बच्चे मासूमियत में ललित को चिढ़ा देते हैं. किसी नई जगह जाओ या घर पर कोई पहली बार आए तो एकदम से 'चमक' जाता है. ऐसे में ललित का चेहरा रुआंसा हो जाता है. अब घर के सामने कोई तख्ती तो लगा नहीं सकते कि संभलकर आएं!

14 साल का है. उसकी उम्र के बच्चे गांवभर में छुट्टा घूमते हैं लेकिन ललित नहीं. स्कूल के वक्त बच्चे दरवाजे पर पहुंचे, तब हम उसे छोड़ते हैं. शाम को ठीक वक्त तक घर न पहुंचे तो डर जाते हैं. इतने लोग उसे हनुमान या अवतार कह चुके हैं कि डर लगता है. डर किस बात का! कुछ झिझकते हुए ही बंकट सीधे कहते हैं- कोई भी उठाकर ले जाएगा, किसी मंदिर के सामने बिठा देगा और फिर कमाई करेगा. बीमार बच्चे से भी रोज के दसियों हजार कमा लेंगे. ध्यान रखना पड़ता है.

स्कूल से लौटते ही सबसे पहले मोबाइल देखता है और सेल्फी लेता है.


शरीर पर बाल होने से क्या फर्क पड़ता है, आखिर है तो वो बच्चा ही. ललित के एक आम दिन के बारे में बंकट बताते हैं- वो स्कूल जाता है. लौटते ही सबसे पहले मोबाइल देखता है. सेल्फी लेने का खूब शौकीन. धड़ाधड़ सेल्फी लेता है. सबको दिखाता है. इस उम्र में लड़कों को अच्छे कपड़े पहनने, बाल बनाना अच्छा लगता है. ललित भी अपनी उम्र के बच्चों सा ही है. तैयार होता है, नए ढंग के कपड़े पहनता है और सबसे पहले अपनी फोटो लेता है.

अपनी बीमारी का उच्चारण उसे नहीं पता. वो सिर्फ ये जानता है कि बालों की वजह से ठीक से खा नहीं पाता. या आंखों पर हर वक्त बाल आने से खेलने में झंझट होता है. या कभी-कभार सांस लेने में दिक्कत होती है.

वैसे तो सब ठीक है लेकिन तकलीफ होती है जब कोई उसे देख डरकर चीखने लगे. अपने चेहरे को अपना चुका ललित तब एकदम से उदास हो जाता है.

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First published: August 5, 2019, 10:09 AM IST
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