#HumanStory: चंद रुपयों के बदले 'डिलीवर' हुई वो लड़की लॉज के गंधाते सोफे पर सो गई

तमाम शरीर पर ब्लेड और जलाए जाने के जख्म थे. ताजा-पुराने दाग थे. जख्मों पर भिनकती मक्खियां उड़ाती उसकी मां को बस एक ही डर था- कहीं उसकी बेटी पेट से तो नहीं!

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Updated: August 14, 2019, 11:50 AM IST
#HumanStory: चंद रुपयों के बदले 'डिलीवर' हुई वो लड़की लॉज के गंधाते सोफे पर सो गई
उसके तमाम शरीर पर ब्लेड और जलाए जाने के जख्म थे (प्रतीकात्मक फोटो)
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Updated: August 14, 2019, 11:50 AM IST
होंठ सिकोड़कर बाल मजदूरी (Child labor) कहते और जल्दी-जल्दी आंखें झपकाकर शर्मिंदा होते हुए हम 12 साल के 'छोटू' से सलाद मंगवाते हैं. आजकल कुछ और लफ्ज भी फैशन में हैं, मसलन जुवेनाइल जस्टिस (juvenile justice) और चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज (child sexual abuse). अंग्रेजीदां लहजे में इन्हें चुभलाते हुए हमें बगल के ढाबे का बच्चा या पड़ोसी के यहां 24*7 काम में जुती बच्ची बिसरा जाती है. रांची (Ranchi) के बैद्यनाथ कुमार (Baidnath Kumar) इन्हीं 'अदृश्य' बच्चों के लिए काम करते हैं.

'परिवार में बेटी की शादी थी. खूब दान-दहेज जुटा. सुई से लेकर एसी तक. मिठाइयां इतनी कि पूरा शहर जीम ले.

विदा होती बिटिया के साथ एक और भी 'चीज' थी- एक लड़की. दसेक बरस की वो लड़की बेटी के नए घर की देखभाल करती. बेटी के बच्चा हुआ तो काम बढ़ा. दिनभर घर के काम-काज करती. रात बच्चा संभालती. उस रोज बच्चा लगातार रो रहा था. बच्ची उसे गोद में झुला रही थी. रोना नहीं रुका. अब बच्ची उसे लेकर टहलने लगी. छोटी-सी बच्ची. दिनभर की थकी हुई. बच्चा गोद से गिर गया. सोते घरवाले दौड़ पड़े. बच्चा सेफ था. लेकिन दहेज में आई बच्ची नहीं. उसके शरीर को जगह-जगह ब्लेड से काटा गया. गर्म इस्तरी से पीठ दागी गई और कमरे में बंद कर दिया गया.

पीठ का जख्म जब मुंह फाड़कर चुगली करने लगा तो बच्ची लौटा दी गई.'

इसके बाद हजारों टूटी हुई लड़कियों से मिला. लेकिन फूस के घर में बुखार में तपती और हर करवट पर कराहती उस लड़की का चेहरा मैं नहीं भूल सका. उसके तमाम शरीर पर ब्लेड और जलाए जाने के जख्म थे. ताजा-पुराने दाग थे. जख्मों पर भिनकती मक्खियां उड़ाती उसकी मां को एक डर और था- कहीं उसकी बेटी पेट से तो नहीं!

दसेक बरस की वो लड़की बेटी के नए घर की देखभाल करती (प्रतीकात्मक फोटो)


उस बच्ची का दर्द और भूख से बेहाल चेहरा कुछ-कुछ मेरे चेहरे में घुला-मिला लगता.
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मेरा बचपन भी मां की थपकियों या बाबा के कायदों का लुत्फ नहीं ले सका. बाबा खेतों में मजदूरी करते. पढ़ने के लिए मुझे शहर भेज दिया एक रिश्तेदार के घर. घरेलू काम करता और कभी-कभार पढ़ाई भी. ज्यादातर दिन भूखे पेट रहता. हालात इतने बिगड़े कि मैं एक कैंटीन में वेटर की नौकरी करने लगा.

जिस कैंटीन में चाय-नाश्ता देता, वहां IAS की तैयारी में जुटे लड़के आते थे. वो खूब बहसें करते. तरह-तरह के एक्ट की बात कहते. इसी में एक था जुवेनाइल जस्टिस एक्ट. मैं चाय देने में खूब वक्त लगाने लगा. धीरे-धीरे मैं शब्द समझने लगा था. यहीं से भीतर एक ख्वाब पलने लगा- अपने जैसे बच्चों के लिए काम का.

वक्त बीता. कई सालों बाद गांव गया. खूब मुलाकाती आए. गांव कुछ खास नहीं बदला था. बस एक बात खटक रही थी. वहां कोई लड़की नहीं थी. पूछताछ की तो पता चला कि सब दिल्ली-मुंबई जाती हैं कमाने के लिए, फिर वापस नहीं लौटतीं.

एक मां ने रोते हुए एक तस्वीर दिखाई. दो चोटियां डाले 7-8 साल की एक बच्ची. फोटो किसी शादी-ब्याह की खींची हुई. कैमरे की चमक पर बच्ची की बड़ी-बड़ी आंखें और फैल गई थीं. छटांकभर लड़की के माथे पर बड़ी सी बिंदी. गहरी लाल सलवार-कमीज पर रुमालनुमा दुपट्टा. आंचल से आंख-नाक पोंछती मां बुदबुदा रही थी- 10 सालों से ये घर नहीं आई.

गांव में हर तीसरे घर का यही हाल था.

झारखंड को मानव तस्करी का गढ़ यूं ही नहीं कहते. बहुतेरे परिवार बेहद गरीबी में जी रहे हैं. अधपेट खाए मां-बाप ताड़ी या महुआ पीकर पड़े रहते हैं. ऐसे में अगर कोई इस वादे के साथ आए कि हर महीने 10 हजार रुपए मिलेंगे. बच्चे को हमारे साथ भेज दो, तो नशे में धुत्त मां-बाप के लिए ये नशे में देखा जा रहा ख्वाब ही है. वे खुशी-खुशी राजी हो जाते हैं.

जब तक बच्चियां गांव से रांची स्टेशन पहुंचतीं, उनपर 20 हजार रुपए लग चुके होते (प्रतीकात्मक फोटो)


12 से 17 साल तक की लड़कियां (ज्यादातर) हल्के-फुल्के काम के बदले पढ़ाई, भरपेट खाने, अच्छे कपड़ों के वादे पर घर से निकल पड़ती हैं.

जब तक बच्चियां गांव से रांची स्टेशन पहुंचतीं, उनपर 20 हजार रुपए लग चुके होते. वहां से दिल्ली स्टेशन तक 40 हजार और फिर प्लेसमेंट तक जाते-जाते 20 हजार और. ये सारे पैसे पुलिस और यहां-वहां घूस में दिए जाते. घर से प्लेसमेंट एजेंसी तक पहुंचते हुए उनपर लाख-सवा लाख का कर्ज हो जाता और उन्हें पता भी नहीं होता.

पिछले 15 सालों में 4 हजार से भी ज्यादा लड़कियों से मिला और उन्हें निकाला है. अब तक ऐसी एक भी लड़की नहीं मिली, जिसने बताया हो कि उसके साथ मारपीट और सेक्सुअल एब्यूज नहीं हुआ.

उन दिनों मैं छापामारी दल के साथ काम कर रहा था. दिल्ली के पालम इलाके में रेड डाली. वहां विदेशी सैलानियों को लड़कियां सप्लाई की जा रही थीं. ये वही लड़कियां थीं, जो गांव से सीधे-सादे घरेलू काम और बदले में अच्छी जिंदगी के सपने लेकर निकली थीं.

लड़कियों को शराब पिलाई जाती और झीने से झीने कपड़े पहनाकर नुमाइश की जाती. कस्टमर जिस लड़की को चुन ले, वो उसकी हो जाती. 

रांची के बैद्यनाथ कुमार इन्हीं 'अदृश्य' बच्चों के लिए काम करते हैं


एक दफा एक व्हाट्सएप ग्रुप के बारे में पता चला. पकड़े जाने से बचने के लिए दलाल और ग्राहक मोबाइल के जरिए खरीद-फरोख्त कर रहे थे. नाम बदलकर मैं भी ग्रुप में शामिल हो गया. लड़कियों की तस्वीरें भेजी गईं. मैंने 'रेंडमली' एक को चुना. उसका रेट बताया गया. ऑनलाइन पैसे ट्रांसफर हुए और 'माल' की डिलीवरी के लिए रांची के ही एक कॉलेज के सामने बुलाया गया. सहमी हुई लड़की चार लड़कों के साथ खड़ी थी. मैं उसे लेकर निकला. एकाध घंटे बाद मुझे उसे लौटाना था.

भरोसा पाते ही लड़की ने जो पहली बात कही, लगा जैसे सीने पर किसी ने पूरे दम से मुक्का मार दिया हो. वो थोड़ी देर सोना चाहती थी. कई दिनों से रोज लगातार 18 से 20 ग्राहकों को 'सर्व' कर रही वो लड़की पता नहीं कब से सोई नहीं थी.

वो खस्ताहाल लॉज के गंधाते सोफे पर बच्चों की तरह गुड़ी-मुड़ी हुए सो रही थी और मैं उसे निकालने का प्लान बना रहा था. 

रेकी के बाद रेड डाली तो वहां 39 लड़कियां और थीं. सबकी सब 14 से 18 साल के बीच. मेकअप की गाढ़ परतें और आंखों का भड़कीला मेकअप भी उनकी नींद पर परदा नहीं डाल पा रहा था.

15 साल हुए. कमोबेश रोज ही धमकीभरे फोन आते हैं. कई बार हमले भी हुए. डर लगता है तो उन्हीं 4 हजार चेहरों में से कोई भी चेहरा याद कर लेता हूं.

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First published: August 14, 2019, 10:32 AM IST
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