#HumanStory: बस में सफर कर रहा था, तभी किसी ने आवाज लगाई...!

पिछले दिनों अपने गांव पहुंचा. वहां बस से सफर कर रहा था. खचाखच भरी बस में एक आवाज गूंजी! कुछ पलों के लिए सन्नाटा छा गया लेकिन तुरंत ही सारे लोग बातचीत में गुम हो गए. जिसे चमरा पुकारा गया था, वो शख्स भी इत्मीनान से बैठा चने खा रहा था. मैं पीछे की सीट पर हिचकोले खाता हुआ अपने स्टूडियो के बारे में सोचने लगा.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: July 12, 2019, 2:11 PM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: July 12, 2019, 2:11 PM IST
'चमार स्टूडियो' यानी मुंबई की कांदिवली का छोटा-सा कमरा, जहां बैठकर रबर, रुई और टायरों से हम एक गाली को ब्रांड में बदलने की कोशिश कर रहे हैं. पढ़ें, 'चमार स्टूडियो' के फाउंडर सुधीर राजभर का सफर...

कुछ साल पहले की बात है. मैं मुंबई के एक छोटे से आर्ट कॉलेज में पढ़ रहा था. मेरे सामने भी वो तमाम चुनौतियां थीं, जो बाहर से आए किसी भी स्टूडेंट के साथ पेश आती हैं. कांदिवली के स्लम में रहता. 10*15 की नीची छत वाले कमरे में 6 लोग. सिर झुकाए रखने की ऐसी आदत पड़ी कि खुले आसमान के नीचे भी सिर उठाकर चलने में वक्त लगा. आर्ट का छात्र था. कॉलेज से लौटता तो रंग, ब्रश, कागज, गत्तों से लदा-फदा होता. रात में पांचों साथियों के सोने के बाद कम रोशनी वाले टेबल लैंप में काम शुरू करता.



मेरा बिस्तर ही मेरा स्टूडियो था. बिस्तर पर एक तरफ रंग, कैनवास, ब्रश रखे रहते, दूसरी तरफ के कोने में सरककर मैं सो जाता. 5*4 का वो बिस्तर आज भी मेरे पास है.

कांदिवली का मेरा इलाका थोड़ा-बेहतर स्लम था. आसपास ढेर सारी वैसी ही बस्तियों से घिरा हुआ. मुंबई नगरपालिका आए दिन बस्तियां तोड़ती. बस्ती टूटते ही मैं उस जगह जा पहुंचता. वहां ऐसी चीजें खोजता जो स्लम के बाशिंदे अपने पीछे छोड़ गए हों. टूटा हुआ फूलदान, हेयर क्लिप, आईना, डायरी, अनगढ़ हाथों से लिखे खत, बर्तन, मटके, फोटो फ्रेम.

हर घर की कोई याद होती है. लोग जल्दबाजी में घर खाली करते हुए कोई न कोई याद छोड़ जाते. मैं उन तमाम चीजों को बटोरकर घर ले आता.

स्लम्स के टूटने पर छूटे सामानों से मैं डार्क होम बनाना चाहता था (फोटो- पिक्साबे)
स्लम्स के टूटने पर छूटे सामानों से मैं डार्क होम बनाना चाहता था (फोटो- पिक्साबे)


उन्हें जोड़कर एक डार्क होम बनाना चाहता था. यानी वो घर जो दमदमाते शहर का एक और चेहरा है- अंधेरों, गंदगी और हताशा से भरा हुआ.
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मैं दिखाना चाहता था कि जहां गुदगुदे बिस्तरों पर पसरे लोगों को मौसम का अहसास भी इंटरनेट कराता है, वहां शहर का एक हिस्सा सर्दी-गर्मी-बारिशों को अपनी दीवारों पर महसूसता है.

डार्क होम के ही सिलसिले में अक्सर एक मोची से मिला करता. जल्द ही हम दोस्त बन गए. गप्पों के बीच एक रोज उसने कहा- लोग हमारे पास हमेशा रिपेयर वर्क के लिए ही क्यों आते हैं? उन्हें क्यों लगता है कि हम कुछ नया नहीं कर सकते! सवाल जायज था. मैंने उसका तमंचा अपनी ओर तना हुआ पाया. मैं भी दरअसल उसके पास ऐसे ही रिपेयर वर्क के लिए जाया करता.

उसी शाम से मेरे जेहन में 'चमार स्टूडियो' आकार लेने लगा.

रिसर्च के लिए शहर के एक कोने से दूसरे कोने भटकता रहता. उन बस्तियों में जाता, जहां उनकी बसाहट थी. ऐसे कारखाने खोजता. तब एक रोज धारावी पहुंचा. एक जमाने में वहां लेदर वर्किंग स्कूल हुआ करते थे. पहुंचा तो वहां कुछ भी नहीं था. पहले जहां लेदर का काम होता, उन बड़ी-बड़ी फैक्ट्रियों को गोदाम की शक्ल दे दी गई है. वहां AC रिपेयर होते हैं. कुछ लोग मिले, जो पहले लेदर का काम करते थे. अब उनके पास कोई काम नहीं.

लेदर वर्किंग स्कूल अब एसी बनाने वाले कारखानों में बदल चुके हैं (फोटो- इंस्टाग्राम)


'चमार बोलते हुए आपके दिमाग में क्या आता है'- सुधीर एकाएक सवाल करते हैं. मुसे हुए कपड़े पहने, कटे-फटे हाथों वाला कोई शख्स जूते का तल्ला सी रहा है. या फिर बारिशों में टूटा छाता बना रहे हैं.

बहुत से लोग इस शब्द को गाली की तरह पिच्च से थूकते हैं. ऐसे लोग देख नहीं पा रहे कि 'चमार' शब्द दरअसल एक खास तबके के काम से उपजा है. ये व्यापार या पंडिताई से कहीं अलग नहीं. जूते-चप्पल या छातों से अलग वे भी नया काम कर सकते हैं. यही समझाने के लिए मैंने काम शुरू किया.

सबसे पहले अपने बिस्तर को रंग-कूचों से खाली किया और उस पर नया सामान सजाया. ये कैनवास के बैग थे, जिन पर दुनियाभर की भाषाओं में 'चमार' लिखा हुआ था. पब्लिक स्पेस पर ये बैग लाकर मैं देखना चाहता था कि लोग क्या प्रतिक्रिया देते हैं. लोग बैग पसंद करने लगे. बैग बाजार में छाए तमाम बैगों से अलग था क्योंकि उसके पीछे एक इरादा था. पश्चिमी देशों में भी इसे पूछा जाने लगा. आखिर क्या है 'चमार'? किसलिए उनकी पहचान को एक गाली की तरह देखा जाता है.

लोग चमार ब्रांड के पीछे का संघर्ष समझने लगे हैं (फोटो- इंस्टाग्राम)


अब तक कई महीने बीत चुके थे. स्लम्स में जाकर हर तरह के लोगों से मिलता. ये वो लोग थे, जो फटे जूते सिलने या नालियों की सफाई का काम करते थे. उन सबको एक-दूसरे से, और फिर अपने सपने से जोड़ा. धारावी में एक छोटा सा कमरा लिया और उसे नाम दिया चमार स्टूडियो. ये पिछले साल की बात है. अपने ब्रांड का नाम चुना 'चमार' ब्रांड. उसे रजिस्टर करवाया. हम मिलकर बैग बनाने लगे. मैं डिजाइन करता हूं और वे स्टिच करते हैं.

हम जहां काम करते हैं, वो कोई पॉश कॉलोनी नहीं, कांदिवली का एक तंग कमरा है. दीवारों पर पलस्तर उखड़ रहा है. बारिश आती है तो छत टपकती है.

स्टूडियो में बैग बनाने वाले हाथ अब भी फटे-कटे हैं. उनके कपड़ों से किसी महंगे परफ्यूम की महक नहीं आती. वे अंग्रेजीदां तरीके से सिगार नहीं पीते. और न ही लच्छेदार बोली में अपनी कहानियां सुनाते हैं. वे चुपचाप बैग बनाते हैं. और हर बैग पर लेवल लगाते हैं- 'चमार'. उन्हें कुछ कहने की जरूरत नहीं. चमकते बैग पर टंका ये एक शब्द ही उनकी सारी कहानी कह देता है.

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