Human Story : “मैं गे नहीं थी, मैं लड़के के शरीर में लड़की थी”

वो जब पैदा हुआ तो अभिनव था. दुनिया ने कभी उसे लड़का समझा तो कभी गे. वो कहती रही, “मैं लड़की हूं. गलत शरीर में पैदा हो गई.” क्‍या प्रकृति की इस भूल को डॉक्‍टर ठीक कर सकते थे? पढ़िए अभिनव के सानिया सूद बनने की कहानी

Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: November 15, 2018, 2:24 PM IST
Manisha Pandey | News18Hindi
Updated: November 15, 2018, 2:24 PM IST
लोग समझते हैं कि मैं लड़का हूं.
लोग समझते हैं कि मुझे लड़का होकर भी लड़के पसंद हैं.
लोग समझते हैं कि मुझे लड़का होकर भी लड़के पसंद हैं, इसलिए मैं गे हूं.
मैं लड़का नहीं हूं. मैं गे भी नहीं हूं. मैं होमोसेक्‍सुअल नहीं हूं.

मुझे लड़के पसंद हैं क्‍योंकि मैं लड़की हूं. मैं गलत शरीर में पैदा हुआ सही मन हूं. मैं अपने मन में लड़की हूं. मैं समूची लड़की हूं.
मैं सानिया सूद हूं.



शिमला के एक समृद्ध परिवार में मेरा जन्‍म हुआ. पैदा हुई तो खुशियां मनाईं गईं. नाम रखा गया अभिनव. मां ने मुझे लड़कों के कपड़े पहनाए, लड़कों की तरह पाला. उस उम्र में मुझे क्‍या पता कि लड़का-लड़की क्‍या होता है. लोग मुझे चाहे जो भी समझते रहे हों, लेकिन मेरी तो हरकतें, व्‍यवहार, खेल-खिलौने, चाल-ढ़ाल, बात करने का तरीका, पसंद-नापसंद सब लड़कियों वाली थी. बचपन में घरवालों ने उसे बचपना समझकर टाल दिया. लेकिन लड़कपन नहीं था. वो मैं थी.
Loading...

लेकिन जो मैं थी, जो मैं खुद को समझती थी, बाकी लोग मुझे वो नहीं समझते थे. पहले समझ नहीं आती थी, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ ये बात समझ में आने लगी और जितनी समझ में आने लगी, उतनी तकलीफ बढ़ती चली गई. न समझा जाना अकेला पड़ जाना है. इससे गहरी पीड़ा दूसरी नहीं. मुझे कोई समझता नहीं था तो मैं सबसे कटती चली गई. स्‍कूल में, मोहल्‍ले में और आसपास के सारे लोग मुझे अजीब नजरों से देखते. मुझसे कोई बात करना, दोस्‍ती करना नहीं चाहता था. उन्‍हें ऐसा लड़का पसंद नहीं था, जिसकी व्‍यवहार लड़कियों जैसा हो. स्‍त्री होना तो हमारे समाज में वैसे भी शर्मिंदगी की बात है. स्‍त्री को वैसे भी कौन सम्‍मान और स्‍नेह की नजर से देखता है. ऐसे में जिसे दुनिया लड़का समझती हो, वो लड़कियों जैसे लक्षण दिखाए तो उसके लिए कोई वैसे भी कोई आदर नहीं रह जाता. मेरे साथ कुछ ऐसा ही हो रहा था. मैं खुद को तिरस्‍कृत महसूस करती थी. जैसे सबने मेरा साथ छोड़ दिया. कोई मेरा दोस्‍त नहीं रहा. स्‍कूल में बच्‍चे मुझे चिढ़ाते थे. मैं और ज्‍यादा खुद में सिमटती चली गई.

मैं हर वक्‍त एक अजीब से गुस्‍से और अवसाद से भरी रहती थी. हमेशा अकेले रहती, किसी से बात नहीं करती. वो जीवन का एक ऐसा दौर था, जब मैं आसपास की दुनिया में सबसे नाराज थी. मैं भगवान से नाराज थी कि उन्‍होंने मुझे ऐसा क्‍यों बनाया. मैं क्‍या हूं, मैं क्‍या महसूस कर रही हूं. मैं अपने घरवालों से नाराज थी, पूरी दुनिया से नाराज थी.



बड़े होकर तो हम फिर भी कुछ समझदार हो जाते हैं. हमारी चमड़ी मोटी हो जाती है. हम जान चुके होते हैं कि ये दुनिया कोई खूबसूरत जगह नहीं है. लेकिन बचपन का इमोशनल स्‍ट्रगल अजीब होता है. तब कुछ भी साफ नहीं होता, कुछ भी पता नहीं होता. सिर्फ इतना समझ में आता है कि हमें तकलीफ महसूस हो रही है.

इस तकलीफ ने मुझे जिस अकेलेपन में ढकेला, वहां मैंने अपनी एक अलग दुनिया बना ली. मैं ज्‍यादातर अकेली रहती. मुझे फिल्‍में देखना और गाने सुनना पसंद था. ये सन् 94 की बात है. तब भारत से मिस वर्ल्‍ड और मिस यूनीवर्स बनी थीं. वहां ये मेरा ब्‍यूटी कॉन्‍टेस्‍ट और फैशन की तरफ रूझान बढ़ा. मैं ब्‍यूटी क्‍वीन बनना चाहती थी. शिमला में सर्दियों की लंबी छुट्टियां होती हैं. मैं उन छुट्टियों में लड़कियों और उनके फैशनेबल कपड़ों के स्‍केचेज बनाती, उनका आपस में ही ब्‍यूटी कॉन्‍टेस्‍ट करवाती. ये मेरी बहुत निजी दुनिया थी. बाहर का कोई इस निजता में साझेदार नहीं था.

खुद को जानने का संघर्ष
स्‍कूल पास करने के बाद मैं होटल मैनेजमेंट का कोर्स करने बैंगलुरू गई. तब तक लोगों ने मुझे बोलना शुरू कर दिया था कि मैं गे हूं. मुझे लड़का होकर भी लड़के पसंद हैं. इसका मतलब होमोसेक्‍सुअल होना होता है. खुद को जानने की तलाश मुझे होमोसेक्‍सुअल्‍स के बीच लेकर गई. मैं गे लड़कों से दोस्‍ती की और उनके बीच रहने लगी. लेकिन वहां भी मुझे संतोष नहीं मिला. जो मैं महसूस कर रही थी, वो कोई समझ नहीं सकता था.

मैं लड़का थी ही नहीं. मैं तो लड़की थी. लड़कों के प्रति मेरा सहज आकर्षण वैसा ही था, जैसा किसी भी लड़की का लड़कों के प्रति होता है. मैं गलत देह में कैद थी.
मैंने उस गलत देह से मुक्‍त होने का फैसला किया.



अभिनव से सानिया बनने की शुरुआत
मुझे काफी पहले ये पता चल गया था कि इस तरह की सर्जरी होती है. और मैं सोचती थी कि बड़े होकर जब मेरे पास खूब सारे पैसे होंगे, तो मैं सर्जरी करवाऊंगी.

अब वक्‍त आ गया था, प्रकृति की उस गलती को ठीक करने का, जिसकी सजा मैं इतने सालों से भुगत रही थी. इंडिया में कुछ जगह सेक्‍स चेंज की सर्जरी होती हैं, लेकिन मेरे कुछ दोस्‍तों का अनुभव अच्‍छा नहीं रहा था. इसलिए मैंने थाइलैंड जाकर सर्जरी करवाने का फैसला किया.

सर्जरी की प्रक्रिया दो चरणों में होने वाली थी. सबसे पहले तो मुझे दो डॉक्‍टर्स और साइकोलॉजिस्‍ट से मिलना था. उन्‍होंने मुझे जेंडर डिस्‍फोरिया का सर्टिफिकेट दिया. उसके बाद कहीं जाकर इलाज शुरू हुआ.
सबसे पहले डेढ़ साल तक मुझे हॉर्मोन दिए गए. चूंकि मेरे शरीर में प्राकतिक रूप से मेल हॉर्मोन हावी थे, इसलिए फीमेल हॉर्मोन इंजेक्‍शन और दवाइयों के जरिए पहुंचाए गए. हॉर्मोन का असर धीरे-धीरे दिखना शुरू हुआ. मेरे ब्रेस्‍ट आकार लेने लगे. आवाज थोड़ी पतली हुई, चिन नाजुक हुई. शरीर पर पहले से मौजूद बालों को हटाने के लिए मैंने लेजर का सहारा लिया. अब मेरा शरीर स्‍त्री देह का रूप धारण कर रहा था.
डेढ़ साल के हॉर्मोन ट्रीटमेंट के बाद बारी आई सर्जरी की. सर्जरी के जरिए मेरे शरीर के अंतिम बदलाव को पूरा किया गया. सर्जरी के बाद मुझे तीन महीने बेड रेस्‍ट पर रही. और फिर जब ठीक हुई तो उस देह में थी, जिसे मैं महसूस करती थी.
मैं स्‍त्री थी.

क्‍या मैं हूं संपूर्ण स्‍त्री
सेक्‍स चेंज की यह सर्जरी आपके शरीर को सिर्फ बाहर से बदलती है. वो भीतर अंगों को रिप्‍लेस नहीं करती. हॉर्मोन के प्रभाव से मेरे ब्रेस्‍ट जरूर बड़े हो गए, लेकिन मुझे पीरियड्स नहीं होते. सर्जरी ने बाहरी तौर पर मेरे शरीर को बदला है, आंतरिक रूप से नहीं. इस सर्जरी के कुछ साइड इफेक्‍ट भी हैं. हॉर्मोनल बदलाव का असर मन और भावनाओं पर भी पड़ता है. इलाज के दौरान भी कई बार मुझे भयानक मूड स्विंग होते थे. कई बार मैं बेवजह बहुत खुश हो जाती तो कई बार बहुत उदास. अभी भी कई बार ऐसा होता है. सर्जरी के बाद भी बदलाव की प्रक्रिया पूरी होने में कम से कम दो साल का वक्‍त लगता है. दिसंबर में मेरी सर्जरी को एक साल पूरा होगा. अभी भी मैं उस बदलाव से गुजर रही हूं. कुछ वक्‍त और लगेगा, जब मैं बाहर से भी पूरी तरह वैसी हो जाऊंगी, जैसी मैं भीतर से हमेशा से थी.

सर्जरी के बाद मैंने ट्रांसवुमेन के ब्‍यूटी कॉन्‍टेस्‍ट में हिस्‍सा लिया और वहां हिमाचल प्रदेश को रीप्रेजेंट किया. मैं खुश हूं अपनी इस नई जिंदगी से. मैं खुशकिस्‍मत हूं कि मेरे घरवालों ने हर कदम पर मेरा साथ दिया.
अब जब भी मैं खुद को आईने में देखती हूं, एक गहरे संतोष से भर जाती हूं. मुझे पता है मैं सुंदर दिखती हूं. लेकिन मेरे चेहरे की ये चमक सिर्फ सुंदर होने की चमक नहीं है. ये वो खुशी है, जो आंखों में चमकती है, जिसकी चमक से मेरा चेहरा, मेरा मन और पूरा जीवन रौशन है.

ये भी पढ़ें-

Human Story: तंत्र साधना के नाम पर मर्द तांत्रिक औरतों का यौन शोषण करते थे
Human Story: मर्दों के लिए मोटी लड़की मतलब हॉट बिग एसेट, लेकिन वो हॉट लड़की से शादी नहीं करते
Human Story: मैं चाहता हूं कि अंकित बस एक बार सपने में आकर मुझसे बात कर ले

Human Story: औरतों का डॉक्‍टर होना यानी देह के परे स्‍त्री को एक मनुष्‍य के रूप में देखना
मैं एक प्राइवेट डिटेक्टिव- मेरा काम लोगों की जासूसी करना, उनके राज खोलना
फेमिनिस्‍टों को क्‍या मालूम कि पुरुषों पर कितना अत्‍याचार होता है ?

कभी मैडमों के घर में बाई थी, आज मैडम लोगों पर कॉमेडी करती है
मिलिए इश्‍क की एजेंट से, जो कहती हैं आओ सेक्‍स के बारे में बात करें

प्‍यार नहीं, सबको सिर्फ सेक्‍स चाहिए था, मुझे लगा फिर फ्री में क्‍यों, पैसे लेकर क्‍यों नहीं
एक अंजलि गई तो उसके शरीर से पांच और अंजलियां जिंदा हो गईं
मैं दिन के उजाले में ह्यूमन राइट्स लॉयर हूं और रात के अंधेरे में ड्रैग क्‍वीन
'मैं बार में नाचती थी, लेकिन मेरी मर्जी के खिलाफ कोई मर्द मुझे क्‍यों हाथ लगाता'
घर पर शॉर्ट स्‍कर्ट भी पहनना मना था, अब टू पीस पहनकर बॉडी दिखाती हूं

इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human stories पर क्लिक करें.

Loading...

और भी देखें

पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...