Home /News /human-stories /

मिलिए इश्‍क की एजेंट से, जो कहती हैं आओ सेक्‍स के बारे में बात करें

मिलिए इश्‍क की एजेंट से, जो कहती हैं आओ सेक्‍स के बारे में बात करें

ये हैं इश्‍क की एजेंट पारोमिता वोहरा. डॉक्‍यूमेंट्री फिल्‍मों की दुनिया का जाना-माना नाम, जिन्‍होंने सेक्‍स, सेक्‍सुएलिटी, बॉडी और डिजायर जैसे सवालों पर खुलकर बात करने के लिए एक वेबसाइट बनाई – एजेंट ऑफ इश्‍क

    ये दिसंबर, 2012 के बाद की बात है. निर्भया केस के बाद अचानक इस बारे में बात होने लगी थी. पहली बार ऐसा हुआ था कि सेक्‍सुअल वॉयलेंस का सवाल इतने बड़े पैमाने पर पब्लिक डिबेट का हिस्‍सा बन गया था. लेकिन इस पूरे संवाद में एक बड़ी दिक्‍कत थी. हम सेक्‍स के बारे में बात तो कर रहे थे, लेकिन उसकी पृष्‍ठभूमि में वॉयलेंस था, हिंसा थी. सेक्‍स का जिक्र सेक्‍सुअल वॉयलेंस के संदर्भ में ही हो रहा था. हमें लगा कि अगर सेक्‍स से हिंसा शब्‍द को हटाना है तो एक ऐसे प्‍लेटफॉर्म की जरूरत है, जहां हम खुलकर अपनी देह इच्‍छाओं, कामनाओं के बारे में बात कर पाएं. वो सारी बातें, जिसे कहने की कोई और जगह नहीं है.

    एजेंट इश्‍क के
    मुझे ये शब्‍द बहुत अच्‍छा लगा – एजेंट ऑफ इश्‍क. जैसे लाइफ इंश्‍योरेंस वाले एजेंट नहीं घूमते रहते हैं. कहते हैं लाइफ इंश्‍योरेंस पॉलिसी ले लो. फर्ज करिए वैसे ही ढेर सारे इश्‍क के एजेंट घूम रहे हैं दुनिया में, कह रहे हैं कि सेक्‍स एजूकेशन पॉलिसी ले लो. हमने अपनी वेबसाइट पर लिखा कि अगर आप एजेंट ऑफ इश्‍क बनना चाहते हैं तो हमसे संपर्क करें. हमारे पास ढेर सारे लोगों के ई-मेल आए. उन सबने इश्‍क का एजेंट बनने ख्‍वाहिश जताई थी. यह देखना काफी आश्‍चर्य और खुशी से भरा था कि इस शब्‍द का हर इंसान के लिए एक अलग मतलब था. सब एजेंट शब्‍द को अपने ही तरीके से परिभाषित कर रहे थे. यही तो हम चाहते थे. एक ऐसी जगह, जहां प्रेम की तमाम परिभाषाओं, तमाम रूपों को जगह मिल सके. ‘इश्‍क’ शब्‍द इसलिए चुना क्‍योंकि इश्‍क का कोई एक अर्थ नहीं होता. इश्‍क न सिर्फ प्रेम है, न इमोशन, न बॉडी, न इच्‍छा, न कामना. इश्‍क में सबकुछ शामिल है. भावना की ऊंचाई से लेकर देह की गहराई तक.

    मैं दस मर्दों के साथ सोना चाहती हूं और मैं सिर्फ एक के साथ
    सेक्‍सुअल फ्रीडम क्‍या है? क्‍या दस मर्दों के साथ सोना आजादी है या पूरी जिंदगी एक ही रिश्‍ते में घुट-घुटकर बिता देना, चाहे आप उसमें कितने ही नाखुश क्‍यों न हो. अगर आपके पास एक व्‍यापक संसार का अनुभव न हो तो आप अपने और अपने आसपास के चंद लोगों के अनुभवों को ही जीवन का अंतिम सच मान लेते हैं. एजेंट ऑफ इश्‍क की कहानियों ने अनुभवों के उस दायरे को तोड़ा और एक बड़ी दुनिया हमारे सामने खड़ी कर दी.



    मैं 22 साल की उम्र से अकेली रह रही हूं. मैं मुंबई आ गई थी, डॉक्‍यूमेंट्री फिल्‍में बनाती थी और कम उम्र में ही एक ऐसी दुनिया से मेरी वाकफियत हुई, जो बाकी समाज के मुकाबले सेक्‍स और रिश्‍तों के सवाल पर ज्‍यादा मुखर थी. यहां रिश्‍ते सिर्फ शादी के दायरे में ही परिभाषित नहीं किए जाते थे. यहां हर तरह के रिश्‍तों, हर तरह के अनुभवों के लिए जगह थी. यह खुलापन तो था, लेकिन इस खुलेपन में भी एक किस्‍म का झूठ और नकलीपन था. वो झूठ, वह आवरण मेरे लिए जीवन का सबसे बड़ा सबक रहा.
    जब हम एक बंधन, एक पूर्वाग्रह से बाहर निकलते हैं तो अपने लिए चार नए पूर्वाग्रह खड़े कर लेते हैं. एक तरफ वो पारंपरिक समाज है, जहां औरतों के लिए अपनी सेक्‍सुअल डिजायर को स्‍वीकार तक करने की जगह नहीं थी. हमने उसका विरोध किया और उस विरोध ने हमें वहां ला पटका, जहां औरत की सेक्‍सुअल फ्रीडम का मतलब ये हो गया कि उसके बहुत सारे मर्दों के साथ संबंध होने चाहिए, उसके 50 ऑर्गेज्‍म होने चाहिए यानी एक खास तरह के मर्द का फीमेल वर्जन. यह बहुत खतरनाक परिभाषा है. पहले कहा जाता था कि एक से अधिक लोगों के साथ रिश्‍ते खराब हैं तो अब कह रहे हैं कि एक ही के साथ संबंध निहायत पिछड़ापन है.

    सेक्‍सुअल फ्रीडम का कोई एक रूप नहीं. पॉलीगैमी उसके बहुत सारे तरीकों में से सिर्फ एक तरीका है. किसी का तरीका इससे उलट भी हो सकता है. हो सकता है किसी स्‍त्री के अनेकों संबंध हों और यह भी मुमकिन है कि किसी स्‍त्री के लिए सिर्फ एक ही पुरुष से आजीवन प्रेम करना काफी हो. अगर पारंपरिक सोच उस पहली स्‍त्री के प्रति जजमेंटल है तो मॉडर्न सोच उस दूसरी स्‍त्री के प्रति भी उतनी ही जजमेंटल. दोनों ही गलत हैं. एक या अनेकों से संबंध, हमारा सोचा-समझा फैसला होना चाहिए और उस फैसले का सम्‍मान होना चाहिए.



    लड़का उम्र में बड़ा हो सकता है तो छोटा क्‍यों नहीं
    आज औरतों की सबसे बड़ी दिक्‍कत ये है कि शादी की संस्‍था को नकारने वाली स्त्रियों के लिए उम्र के साथ विकल्‍प बहुत कम होते जाते हैं. लेकिन विकल्‍प सचमुच कम हैं या हमारी सोच उस दायरे को और सीमित कर देती है. एक उम्र के बाद आपको अपने आसपास की दुनिया में ढेर सारी सिंगल औरतें तो मिल जाएंगी, लेकिन सिंगल मर्द बहुत कम मिलेंगे. औरतों को लगने लगता है कि जो उनके हमउम्र या उम्र में बड़े हैं, वो सब शादीशुदा हैं और जो शादीशुदा नहीं हैं, वो उम्र में छोटे हैं. औरत जितनी आसानी और सहजता से अपने से बड़े उम्र के पुरुष के साथ संबंध बना लेती है, छोटी उम्र के पुरुष के साथ उतनी ही असहज होती है. यह प्राकृतिक नहीं है, दुनिया की थोपी हुई सोच है. लड़का उम्र में बड़ा हो सकता है तो छोटा क्‍यों नहीं हो सकता. बल्कि मुझे तो लगता है कि मेरी उम्र के पुरुष निहायत बोरिंग होते हैं. मर्दों को यह कभी सिखाया ही नहीं गया कि बातचीत में चार्मिंग कैसे हुआ जाता है. औरत से कैसे बात करनी चाहिए. वो अपना सारा अहंकार, सारा इगो लेकर बस आपके ऊपर लद जाना चाहते हैं.

    लड़कियों को डर है कि दुनिया क्‍या कहेगी
    एजेंट ऑफ इश्‍क को जितनी भी लड़कियों ने अपनी कहानियां लिखकर भेजीं, उन सब में एक बात कॉमन थी- एक किस्‍म की झिझक और संकोच. हर लड़की कहीं-न-कहीं अपने भीतर ये लड़ाई लड़ रही होती है कि अगर वो अपनी देह की कामनाएं जाहिर करेगी, अपने भीतर जो वो महसूस कर रही है, उसे खुलकर कहेगी तो दुनिया उसके बारे में क्‍या सोचेगी. लोग उसे किस नजर से देखेंगे. किसी को डर है कि अपनी देह के बारे में बात करना शर्मिंदगी का सबब है तो किसी को इस बात पर गुस्‍सा है कि यह शर्मिंदगी का सबब क्‍यों है, दुनिया क्‍यों ऐसा सोच रही है. लेकिन संकोच और डर सबको है.
    लेकिन इस डर के बावजूद जब एक लड़की अपनी कहानी लिखने को आती है तो अपने मन के भीतरी कोनों की बेहतर पड़ताल कर पाती है. अपने डर और इच्‍छा, दोनों के प्रति ज्‍यादा ईमानदार होती है. लड़कों की कहानियों में हमें इस तरह का सेल्‍फ रिफ्लेक्‍शन कम मिलता है. उनके भीतर खुद को लेकर ज्‍यादा द्वंद्व नहीं होते. वो काफी दंभ और इत्‍मीनान ने अपनी बात कहते हैं और अपनी बात कहने से ज्‍यादा दूसरों पर जजमेंट पास कर रहे होते हैं. हमें उन्‍हें अकसर टोकना पड़ता है- अपनी जिंदगी की कहानी सुनाइए, दूसरों की जिंदगी पर फैसले नहीं.



    कैसी-कैसी कहानियां
    एक बार हमें कानपुर की रहने वाली एक लड़की का ईमेल आया. उसने लिखा था कि उसकी मां ने उसे पूछा कि मैं ऐसा फोन कहां से खरीद सकती हूं, जिसमें मैं पोर्न देख सकूं. हम चकित रह गए. हमने ऐसी बात पहले कभी सुनी नहीं थी. मुझे लगा कि कानपुर जैसे शहर में एक औरत है, जो बिलकुल ट्रेडिशनल है, घर से ज्‍यादा निकलती भी नहीं, उसे पता नहीं कि स्‍मार्ट फोन कहां मिलेगा, लेकिन वो अपनी देह, अपनी इच्‍छाओं के बारे में अपनी जवान बेटी से खुलकर बात करना चाहती है. उसकी बेटी ने हमें लिखा था कि वो अपनी मां की कहानी लिखना चाहती है. इस कहानी ने एक नया सवाल खड़ा किया. हम चाहते हैं कि हमारे मां-पिता, समाज हमारी सेक्‍सुएलिटी और डिजायर को स्‍वीकार करे, लेकिन क्‍या हम अपने मां-पिता की सेक्‍सुलिटी, उनकी डिजायर को स्‍वीकार करने को तैयार हैं. यह आसान नहीं. खुद को आईने में देखना कभी भी आसान नहीं होता.



    सेक्‍स के बारे में बात करो हिंदुस्‍तानी तरीके से
    परंपराओं को तोड़कर जीने का मतलब ये नहीं होता कि जो कुछ पुराना है, सब खत्‍म कर दिया जाए. अपने इतिहास, अपनी जड़ों को काटकर कुछ नया बनता भी नहीं. जितना नया होता है, उतना ही पुराना उसमें बचा रहता है. हमारे पास जितनी एलजीबीटी की कहानियां आईं, उन सबकी पीड़ा ये थी कि उनका परिवार उन्‍हें स्‍वीकार नहीं करता. वे अपने मां-बाप को छोड़ नहीं देना चाहते थे. वो चाहते थे परिवार में रहना, परिवार का हिस्‍सा बनकर. हिंदुस्‍तान में सेक्‍स और सेक्‍सुएलिटी के बारे में कोई भी बात होगी तो परिवार उस संवाद का हिस्‍सा होंगे. परिवार खत्‍म नहीं होने जा रहे. एक बार एक स्‍त्री ने हमें अपनी कहानी भेजी कि उनके पति उनके साथ सेक्‍स नहीं करते. वो शादी तोड़ना नहीं चाहतीं. एक स्‍त्री ने लिखा कि आज तक अपने पति के अलावा उनके किसी और पुरुष के साथ संबंध नहीं रहे. वो शादी से नाखुश नहीं, लेकिन दूसरे पुरुषों की कल्‍पना करती हैं. उनके लिए वो फैंटेसी ही काफी थी, वो उसे सचमुच जीना नहीं चाहती थीं. जो स्‍त्री अपनी शादी नहीं तोड़ना चाहती, पारंपरिक शादी में रह रही एक स्‍त्री, जो फैंटेसी को सच नहीं करना चाहती, लेकिन यह भी स्‍वीकार कर रही है कि उसके मन में दूसरे पुरुषों को लेकर कामना है. इन सभी स्त्रियों के लिए अगर उनका परिवार बहुत कीमती है तो हम उन्‍हें पारंपरिक या पिछड़ा कहकर खारिज नहीं कर सकते. उन्‍हें स्‍वीकार करते हुए ही आगे बढ़ सकते हैं.

    अपना सच कहना सबसे मुश्किल है
    मेरे पिता एयरफोर्स में थे. हर दो साल पर ट्रांसफर हो जाता और एक नया शहर, नई जगह, नए लोग और नई दुनिया में खुद को नए सिरे से ढूंढना होता. मैं बचपन से ही थोड़ी अलग-थलग रहने वाली बच्‍ची थी, आसानी से दोस्तियां नहीं कर पाती. मैं मोटी थी, देह और सुंदरता को लेकर जितनी उलझनें एक बड़ी होती लड़की के मन में हो सकती हैं, मेरी उनसे कहीं कम नहीं थी. प्रेम जब आपकी देह के दरवाजे खटखटाता है तो सौ कुंठाएं, सौ तकलीफें सिर उठाती हैं. खुद ये स्‍वीकार करना आसान नहीं होता कि आप दुनिया की सुंदरता के मानदंडों पर फिट नहीं बैठते. हम इंटेलेक्‍चुअली तो इससे निकल सकते हैं, लेकिन इमोशनली निकलता आसान नहीं होता. एकांत में जब खुद का सामना करना होता है, तो सारे डर सिर उठाते हैं. शायद मैं सुंदरता के इस सिंड्रोम से इमोशनली कभी नहीं निकल पाई, हालांकि इंटेलेक्‍चुअल समझदारी में कोई कमी नहीं रही. आपके अपने अंतर्द्वंद्व और अंतर्विरोध ही आपको सोचने के लिए मजबूर करते हैं और देखने की नजर देते हैं.

    मेरे लिए प्रेम और सेक्‍स जीवन के सबसे केंद्रीय सवालों में रहा. हम इस दुनिया में क्‍या लेकर आए थे, यह देह ही तो. फिर इसे लेकर इतना डर, इतना पर्दा क्‍यों. जिस देह के लिए हम इतना कष्‍ट सहते हैं, उसके सुख पर हमारा हक क्‍यों नहीं.

    ये भी पढ़ें-


    प्‍यार नहीं, सबको सिर्फ सेक्‍स चाहिए था, मुझे लगा फिर फ्री में क्‍यों, पैसे लेकर क्‍यों नहीं
    एक अंजलि गई तो उसके शरीर से पांच और अंजलियां जिंदा हो गईं
    मैं दिन के उजाले में ह्यूमन राइट्स लॉयर हूं और रात के अंधेरे में ड्रैग क्‍वीन

    'मैं बार में नाचती थी, लेकिन मेरी मर्जी के खिलाफ कोई मर्द मुझे क्‍यों हाथ लगाता'
    घर पर शॉर्ट स्‍कर्ट भी पहनना मना था, अब टू पीस पहनकर बॉडी दिखाती हूं


    इस सीरीज़ की बाकी कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए human stories पर क्लिक करें.

    Tags: Human story

    विज्ञापन

    राशिभविष्य

    मेष

    वृषभ

    मिथुन

    कर्क

    सिंह

    कन्या

    तुला

    वृश्चिक

    धनु

    मकर

    कुंभ

    मीन

    प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
    और भी पढ़ें
    विज्ञापन

    टॉप स्टोरीज

    अधिक पढ़ें

    अगली ख़बर