Human Story: बाबरी मस्जिद तोड़ते हुए गिरा और अपंग हो गया, 26 साल में न राम आए न उनके चाहने वाले

बाबरी विध्वंस के बाद सियासत बदली, राजनेता भी बदले. राम जन्मभूमि आंदोलन में किए गए बलिदान की कीमतें भी अदा हुईं, लेकिन इसी आंदोलन में शरीर का आधा हिस्सा गंवा चुके अंचल सिंह मीणा की जिंदगी जैसे उसी एक तारीख पर थम गई. पढ़िए भोपाल के नजदीक सुआखेड़ा गांव में रहने वाले कारसेवक अंचल सिंह मीणा की कहानी...

Rohit Upadhyay | News18Hindi
Updated: December 6, 2018, 10:44 AM IST
Rohit Upadhyay | News18Hindi
Updated: December 6, 2018, 10:44 AM IST
6 दिसम्बर, 1992 के दिन जो कारसेवक बाबरी मस्जिद तोड़ने के लिए चढ़े थे, उनमें मैं भी एक था. सुबह के साढ़े ग्यारह बज रहे होंगे. कारसेवकों ने 'एक धक्का और दो, बाबरी तोड़ दो...' का नारा लगाना शुरू किया. हम सभी जोश में आ गए और बाबरी मस्जिद पर टूट पड़े. मैं सबसे पहले दीवार पर चढ़ने वालों में से था. कुछ ही देर बाद हम गुंबद के ऊपर थे. हमने 'जय श्री राम' के उद्घोष के साथ दनादन कुदालें चलानी शुरू कर दीं. थोड़ी देर बाद गुंबद का एक हिस्सा भरभराकर गिर पड़ा. उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं है.

जब मुझे होश आया तो मैं अस्पताल में था. पूरी देह इतनी सुन्न जैसे मुर्दा हो. शरीर का कोई भी अंग हिला-डुला नहीं पा रहा था. सिर्फ मुंह से आवाज़ निकल रही थी. रोना बंद भी कर दूं तो आंखों से आंसू निकलते ही रहते थे. मैं भगवान राम के काम से गया था. तो मेरे साथ ये अन्याय क्यों... मेरी उंगलियां बेकार हो गई हैं, अब मैं दोनों पैरों से लाचार हूं, न मैं खड़ा हो सकता हूं, न कोई काम कर सकता हूं. इस बात को 26 साल हो गए हैं, लेकिन किसी संगठन वाले ने मदद तो दूर की बात है, एक गिलास पानी तक को नहीं पूछा.

बीवी बच्चों के साथ अंचल


मेरे बीवी-बच्चों ने किस तरह काम करके मेरा पेट पाला है, ये मैं ही जानता हूं. घाव आज तक नहीं भरे हैं. झुककर पानी भी नहीं पी सकता हूं. घर में 5 बेटियां हैं और 1 बेटा. मेरी बीवी इतने सालों से मजदूरी करने को मजबूर है. अब तो किसी से उम्मीद भी नहीं रह गई है. मैं भगवान के काम से गया था, उसकी मर्ज़ी होगी तो किसी से मदद करवा देगा. वही मेरा ध्यान रखेगा, न कोई नेता रखेगा, न कोई मंत्री.

मैं वहां कोई हिंदू-मुसलमान सोचकर नहीं गया था. मेरे आसपास रहने वाले सभी मुसलमान मुझे मानते हैं और हम सब बहुत प्रेम से रहते हैं. जितना हिंदुओं से सहयोग मिलता है, उतना ही मुसलमान भाइयों से भी सहयोग मिलता है. मैं तो वहां भगवान के नाम से गया था. इस वक़्त मैं जिसके फोन से बात कर रहा हूं, उसका नाम रईस है. मेरे पास फोन नहीं है. अगर किसी का फोन आता है तो रईस ही बात करवाता है.

अपने गांव के दोस्त रईस के साथ अंचल


इसके बाद अंचल के दोस्त रईस कहते हैं कि, 'अंचल मेरे दोस्त हैं. हमारे यहां हिंदू-मुसलमान में कोई भेदभाव नहीं है. हम तो चाहते हैं, अंचल भइया बस ठीक हो जाएं. यह भगवान का मामला है, वो सलामत होते तो हम कहते कि फिर चले जाओ. मंदिर-मस्जिद हमारे आपके चाहने से नहीं होगा. वो तो वही होगा जो ऊपर वाला चाहेगा.'
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अंचल की कहानी के लिए इससे ज़्यादा मौज़ूं कविता और क्या होगी-

क्यों लड़ता है, मूरख बंदे,
यह तेरी ख़ामख़याली है.
है पेड़ की जड़ तो एक वही,
हर मज़हब एक-एक डाली है.

बनवाओ शिवाला, या मस्जिद,
है ईंट वही, चूना है वही.
मेमार वही, मज़दूर वही,
मिट्टी है वही, चूना है वही.

फिर लड़ने से क्या हासिल है?
ज़ईफ़ हम, हो तुम नादान नहीं.
भाई पर दौड़े गुर्रा कर,
वो हो सकते इंसान नहीं.
(अज्ञात)

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