कभी मैडमों के घर में बाई थी, आज मैडम लोगों पर कॉमेडी करती है

घर-घर खाना बनाने, झाड़ू-पोंछा करने और लोकल ट्रेन में अचार-पापड़ बेचने वाली दीपिका म्‍हात्रे आज माइक लेकर स्‍टेज पर कॉमेडी करती हैं और उन मैडम लोगों पर ताने मारती हैं, जो कभी उनके कामों में नुक्स निकाला करतीं.

Manisha Pandey
Updated: September 12, 2018, 2:00 PM IST
Manisha Pandey
Updated: September 12, 2018, 2:00 PM IST
मेरा नाम दीपिका म्‍हात्रे है. मैं कॉमेडी करती हूं. मैंने सुना है कि कॉमेडियन लोग लोग अपनी कामवाली बाई के ऊपर कॉमेडी करते हैं. आज मैं अपनी मैडम लोगों के ऊपर कॉमेडी करूंगी. ठीक है कि हमारे काम वालियों की लिफ्ट अलग है, खाने का बर्तन अलग है, पानी का गिलास अलग है, लेकिन मैडम खाना तो आपका मैं ही बनाती हूं न. रोटी तो आप मेरे ही हाथ की ही बनी खाती हो.

मैं मैडम लोगों का मजाक उड़ाती हूं तो लोग हंसते हैं. यही तो है कॉमेडी कि आप अपनी तकलीफों पर भी हंस सकें.

बाई लोगों का प्रोग्राम
मैं मलाड में एक मैडम के घर खाना बनाने का काम करती थी. एक दिन उन्‍होंने अपनी सोसायटी की सब बाइयों के लिए एक प्रोग्राम रखा. उन्‍होंने सब काम वाली बाइयों को बुलाया और कहा कि उन सबको कुछ करना है. गाना गाओ, डांस करो या कुछ पढ़कर सुनाओ. वहां मैंने पहली बार कॉमेडी की. बाई और मैडम लोग सब मेरी कॉमेडी पर बहुत हंसे. वहां उस प्रोग्राम में हिंदुस्‍तान टाइम्‍स के एक रिपोर्टर भी आए थे. उन्‍होंने मेरे बारे में अखबार में लिखा. अदिति मित्‍तल ने अखबार में वो पढ़ा तो एक दिन उन्‍हीं मैडम के घर मुझे मिलने के लिए आई. उसने कहा कि आप स्‍टेज पर कॉमेडी करो. मुझे लगा कि वो मजाक कर रही है. मैं तो घर-घर काम करने वाली बाई हूं, स्‍टेज पर तो बड़े-बड़े लोग कॉमेडी करते हैं. मैं उनके बीच कैसे खड़ी हो सकती हूं. लेकिन अदिति नहीं मानी. उसने कहा था कि आप कर सकती हो, मैं आपको सिखाऊंगी.

फिर एक दिन उसने मुझे अपने घर बुलाया और एक स्क्रिप्‍ट लिखकर दी. बोली कि अब इसे अच्‍छे से पढ़ो. शुरू में तो मुझे बहुत डर लगा, मुझसे पढ़ा भी नहीं गया, मुंह से आवाज ही नहीं निकल रही थी. लेकिन फिर हो गया. कोशिश करने से हो जाता है न.

वो दिन है और आज का दिन. एक बार जो मैंने स्‍टेज पर कॉमेडी करना शुरू किया तो फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

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प्रभादेवी की चाल और वडा पाव का ठेला
मेरा जन्‍म यहीं मुंबई के प्रभादेवी में हुआ था. पिता सरकारी अस्‍पताल में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे और मां प्रभादेवी में ही वडा पाव का ठेला लगाती थी. हम एक कमरे की छोटी सी चाल में रहते थे. लंबा-चौड़ा परिवार. स्‍कूल जाती जरूर थी, लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि पढ़ाई करने पर बहुत जोर दिया गया हो. स्‍कूल जाना जरूरी नहीं था, लेकिन घर के काम झाड़ू-पोंछा, बर्तन, खाना बनाना और घर के काम सीखना जरूरी था. मैंने बचपन से सारे जरूरी काम सीख लिए. घर के कामों के बाद बाकी समय मां के वडा पाव के ठेले में हाथ बंटाती. किसी तरह दसवीं पास की और उसके तुरंत बाद मेरी शादी हो गई. पति की एक प्राइवेट कंपनी में मामूली नौकरी थी और ससुराल का घर भी चाल में. 5-6 साल पति काम पर गए, लेकिन फिर उन्‍हें बीमारी लग गई. मुझे काम पर जाना पड़ा. मेरी सबसे छोटी बेटी तब सिर्फ डेढ़ साल की थी. उसे घर छोड़कर मैं काम पर जाती.

जब मैं घर-घर जाकर काम करने लगी
मेरा दिन सुबह चार बजे शुरू होता था. चार बजे उठती और साढ़े चार बजे नालासोपारा से पहली चर्चगेट की लोकल ट्रेन पकड़ती थी. ट्रेन में मैं अचार-पापड़-नमकीन बेचती. ट्रेन बदलते-बदलते, अलग-अलग ट्रेनों में बेचते हुए नालासोपारा से चर्चगेट जाती और वापस मलाड तक आती. आते-आते 8 बज जाते थे. 8 बजे से मेरा घर काम शुरू होता. मलाड में मैं 5-6 घरों में खाना बनाने का काम करती थी. हर घर से तीन, साढ़े तीन हजार रु. पगार मिलती. उसी पैसे से मेरा घर चलता था. घर में सिर्फ मैं ही थी कमाने वाली. पति और तीन लड़कियों की सारी जिम्‍मेदारी मेरे सिर पर थी. घरों में खाना बनाने का काम तीन बजे तक खत्‍म होता. फिर वहां से मैं मलाड या दादर जाती, अगले दिन बेचने का सामान खरीदने. घर पर ही मेरी इमिटेशन ज्‍वेलरी की छोटी सी दुकान भी थी. दादर से नकली जूलरी खरीदती और घर पर बेचती. रोज घर लौटते हुए 7-8 बजते. फिर घर के काम, खाना बनाना, बच्‍चों को देखना. 12 बजे से पहले सोने का मौका कभी नहीं मिलता और उठना रोज सुबह 4 बजे पड़ता था. 12 साल तक ऐसे ही चलता रहा. सुबह 4 बजे से लेकर रात 12 बजे तक सिर्फ काम और काम.



एक काम वाली की जिंदगी
मैं कॉमेडी में जो कहती हूं, वो सारी कहानियां मेरी जिंदगी से ही निकली हैं. मैंने बांद्रा, पाली हिल, अंधेरी, खार रोड, मलाड सब जगह मैडम लोगों के घरों में काम किया. कई घरों में 12 घंटे की ड्यूटी होती थी. हम जिस घर में खाना बनाते, उस घर में भी हमारे खाने का बर्तन और पानी के गिलास अलग होते थे. तबीयत खराब हो, बुखार हो, बीमारी हो, महीना चल रहा हो, कभी आराम नहीं मिलता. मैडम लोगों की सोच ऐसी होती है कि हम पैसा दे रहे हैं तो पूरा वसूल लें. एक मिनट भी इसको बैठना नहीं चाहिए. कुछ-न-कुछ काम करते ही रहो. दोपहर में जब पूरा घर आराम कर रहा होता, हमें तब भी आधा घंटा सोने को नहीं मिलता था. 10-15 मिनट जो खाने की छुट्टी मिलती, उससे भी उन्‍हें तकलीफ होती थी. काम वाली की जिंदगी आसान नहीं होती. दफ्तर में भी लोगों को चाय पीने, सिगरेट पीने का ब्रेक मिलता है, मजदूर लोगों की भी दोपहर में एक घंटे की छुट्टी होती है, लेकिन काम वाली को कोई छुट्टी नहीं.



कॉमेडी क्‍या है
मैंने इसके पहले कभी कॉमेडी के बारे में सोचा नहीं था. हम बाई लोग अपनी मैडमों का पहले भी मजाक उड़ाती थीं, उनकी नकल करती थीं, लेकिन मैंने कभी उसके बारे में सोचा नहीं था. लेकिन जब इंटरव्‍यू में एक जर्नलिस्‍ट ने मुझसे पूछा कि आपके लिए कॉमेडी का क्‍या मतलब है तो मुझे पहली बार लगा कि इसका कोई मतलब भी होता है. मुझे यही लगता है कि जो बात बुरी लगती है या जिस बात से तकलीफ होती है, उस पर हम हंसना सीख लें. मैडम लोगों हमेशा हमारे काम में नुक्‍स निकालती हैं, ताना देती रहती हैं. वो मैडम हैं, हम बाई हैं. वो मुंह पर बोलती हैं और हम उनके पीठ पीछे. मेरे लिए कॉमेडी अपने दुखों पर हंसने का तरीका है. जिस चीज को हंसी में उड़ा दो, वो दिल में नासूर नहीं बनती.



पति को पहनाऊंगी मंगलसूत्र
मैं मैडम लोगों के अलावा हसबैंड और मर्दों पर भी कॉमेडी करती हूं. बचपन से सुनती आ रही हूं कि औरत का जीवन तो दुख है. उसके हिस्‍से में सिर्फ है सिर्फ त्‍याग और कभी न खत्‍म होने वाला काम. मैं पतियों का भी मजाक उड़ाती हूं. मुझे सिर से लेकर पांव तक सुहाग की निशानियों से भर रखा है, शरीर के हर हिस्‍से में कुछ न कुछ है, जो लाउडस्‍पीकर की तरह मेरे पति के होने की घोषणा करता रहता है और पति को देखो, 40 की उमर में भी कुंवारे ही नजर आते हैं. इसलिए मैंने तय किया कि पति को भी मंगलसूत्र पहनाऊंगी और उसमें अपनी फोटो लगाऊंगी. तभी लगेगा न सेम-सेम.
आज सिर्फ पूरे देश से ही नहीं, विदेशों से भी मेरे पास इंटरव्‍यू के लिए फोन आते हैं. अभी कुछ दिन पहले जी मराठी चैनल से मुझे बुलाया था, स्‍टार प्‍लस वालों ने बुलाया था. कलर्स चैनल पर जो इंडियाज गॉट टैलेंट आता है, उसमें बुलाया गया. मैं अदिति मित्‍तल के साथ बंगलुरू गई थी. पहली बार हवाई जहाज में बैठी. अगले महीने मैं कानपुर जा रही हूं. वहां प्रोग्राम में पैसे भी मिलेंगे. मैंने अब बाई काम काम छोड़ दिया है. अब मैं इमिटेशन जूलरी बेचती हूं और कॉमेडी करती हूं.
एक छोटे से प्रोग्राम ने मेरी जिंदगी बदल दी. मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन मेरा इतना नाम होगा.

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