Human Story: जहन्नुम से बदतर था घर, आधी रात को वहां से भाग गई थी...

उस रात घड़ी में लगभग बारह बज रहे थे. घर में सभी लोग सो चुके थे. मौका देखकर आधी रात मैं घर से भाग निकली थी. पढ़िए बाल विवाह कुप्रथा का शिकार हुई सुशीला विश्नोई की कहानी...

Nandini Dubey | News18Hindi
Updated: November 30, 2018, 6:02 PM IST
Nandini Dubey | News18Hindi
Updated: November 30, 2018, 6:02 PM IST
उस रात घड़ी में रात के लगभग 12 बज रहे थे. घर में सभी लोग सो चुके थे. मम्‍मी-पापा के खर्राटों की आवाज दूसरे कमरे तक आ रही थी लेकिन भाईयों के बारे में मुझे अंदाजा नहीं था. इसीलिए मैं उनके कमरे में पहुंची तो वे लोग भी गहरी नींद में थे. मुझे यह सही वक्‍त लगा, मैंने धीरे से घर का दरवाजा खोला और बेतहाशा दौड़ने लगी.

मैं बस भागती रही. बहुत सूनसान और डरावनी रात थी. सड़क पर सिर्फ मेरे कदमों की आवाज कानों में पड़ रही थी. मुझे नहीं पता था कि कहां जाना है लेकिन मैं दौड़ते हुए चली जा रही थी. एक रुपया भी जेब में नहीं था. उस रात मेरे साथ कुछ भी हो सकता था. कोई भी अनहोनी हो सकती थी लेकिन वो शायद घर में होने वाले जुल्‍म से बहुत कम होता. दर्द डर पर भारी पड़ा और मैं घर से बहुत दूर निकल गई.



हाईवे पर आ पहुंची थी

अब तक चलते-चलते मेरी सांस फूलने लगी थी लेकिन तब भी मैं नहीं रुकी, क्‍योंकि मुझे डर था कि अगर घर वाले मुझे ढूंढते हुए आ गए तो वापस फिर उसी जहन्‍नुम में जाना पड़ेगा. फिर पापा मेरे साथ मार-पीट करेंगे. ससुराल जाने का दबाव बनाएंगे. ये मुझे गंवारा नहीं था. मुझे मरना पसंद था, लेकिन बाल विवाह की बेड़ियों में जकड़ना गवारा नहीं था. इसीलिए जब तक पैरों में जान रही चलती रही. भागते- भागते मैं हाईवे के करीब आ पहुंची. यहां आकर मैंने थोड़ी सांस ली और एक पेड़ के पीछे छिप गई. मुझे लगा कि अगर सारथी ट्रस्‍ट की कार्यकर्ता आएंगी तो इसी हाईवे से होकर गुजरेंगी और मैं उनके साथ निकल जाऊंगी.



सारथी ट्रस्‍ट की ली मदद 
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दरअसल घर से भागने के पहले मेरा पास सिर्फ एक सहारा था और वो एक थी एक कॉल, जो मैंने बाल विवाह रोकने वाली संस्‍था ‘सारथी ट्रस्‍ट’ को थी. उनकी कार्यकर्ता डॉ. कृति भारती को ये बताया था कि आज मैं घर छोड़कर भाग जाऊंगी, आप लोग प्‍लीज मुझे लेने आ जाना. इसे मेरी खुशकिस्‍मती कह सकते हैं कि हाईवे पर मुझे एक गाड़ी नजर आई और वो लोग कुछ ढूंढते हुए नजर आ रहे थे. गाड़ी के अंदर बैठी एक महिला बाल विवाह रोकने वाली संस्‍था सारथी ट्रस्‍ट की डॉ कृति भारती जैसी लगी. मैंने उनकी तस्‍वीर अखबार में देखी थी. इसीलिए मैं पेड़ के बाहर निकली और उनके नजदीक पहुंची तो वो डॉ कृति ही थीं. मैं भागकर उनके गले लग गई. उनके गले लगकर मेरे आंसू रूक नहीं रहे थे. मैं इतनी डरी थी कि कांप रही थी. डॉ कृति ने मुझे शांत कराया. मैं इतनी डरी थी कि कांप रही थी. उसके बाद मैं उनके साथ गाड़ी में बैठकर निकल पड़ी. रोते- रोते गाड़ी में उन्‍हें पूरी दास्‍तां सुनाई.

'मौसर' में कराया बाल विवाह 
मैंने डॉ. भारती को बताया कि दादाजी की मौत के बाद ‘मौसर प्रथा’ के तहत मेरा  रिश्‍ता तय कर दिया गया था. दरअसल राजस्‍थान में मौसर प्रथा के तहत घर में किसी बड़े- बुजुर्ग की मौत होने पर उसके घर की बच्‍चों का बाल विवाह करा दिया जाता है. इसीलिए मेरा और बड़ी बहन दोनों की मंडप में जबरन बाल विवाह करा दिया गया था. उस वक्‍त मेरी उम्र मात्र बारह साल थी. जब इस शादी का मैंने विरोध किया तो पापा ने मेरे साथ मारपीट करना शुरू कर दिया और पढ़ाई तक छुड़वा दी लेकिन मैं भी जिद्दी थी. ठान लिया था कि चाहें कुछ हो जाए लेकिन मैं ससुराल तो नहीं जाऊंगी.

घर में जहुन्‍न जैसा बर्ताव
मेरी इस जिद की वजह से घर में साथ बहुत बुरा व्‍यवहार किया जा रहा था. मुझे कमरे में कैद कर दिया गया था. खाना- पीना भी बंद हो चुका था. मारपीट की जाती थी. एक दिन जबरन मुझे ससुराल भेजने की तैयारी कर ली गई थी, जब मैंने जाने से इनकार कर दिया तो पापा ने मेरा गला दबाया और जान से मारने की धमकी दी. मम्‍मी, दीदी और भाई सब लोग ये देखते रहे, किसी ने कुछ भी नहीं कहा. दीदी ने तो हालातों से समझौता कर लिया था और वो तो ससुराल जाने को भी तैयार हो गई थी. दीदी के इस कदम के बाद मैं हताश हो गई थी.

पुलिस ने नहीं की मदद  
लेकिन अब मैंने तय कर लिया था कि अब तो  मैं यहां नहीं रहूंगीं. इसीलिए बाल अधिकारों के लिए काम करने वाली चाइल्‍ड लाइन संस्‍था को कॉल किया, मगर उन्‍होंने मेरी कोई मदद नहीं की.  इसके बाद मैंने पुलिस से भी मदद ली. पुलिस ने तो उल्‍टा मेरे पापा को ही बता दिया. उसके बाद तो मेरे ऊपर पहरे और बढ़ गए. मारपीट हुई  वो अलग.  मुझे घर में कैद कर दिया गया था. पिछले कई दिनों से मैं घर मैं कैद थी, तभी एक दिन मेरी नजर आपकी संस्‍था पर पड़ी थी. ये सब कहते- कहते मेरे आंसू नहीं रूक रहे थे तभी अब तक बहन बन चुकी कृति दीदी ने मुझे शांत कराया.

न्‍यायालय में की अपील 
मैंने कोर्ट से शादी रद्द करने की अपील की थी. केस अदालत में पहुंचा. सुनवाई के दौरान मेरे पति ने शादी की बात से ही इंकार कर दिया. नरेश का कहना था कि दोनों की शादी कभी हुई ही नहीं. नरेश के इस तरह मुकरने से लड़की का केस कमजोर हो गया था क्‍योंकि जब शादी हुई ही नहीं तो उसे रद्द करने का सवाल ही नहीं उठता. मगर मैंने और कृति दी ने हिम्‍मत नहीं हारी. उन्‍होंने नरेश के फेसबुक प्रोफाइल की छानबीन की. इस दौरान उसे फेसबुक पर ऐसे सबूत मिले जिससे यह साबित होता था कि लड़की की शादी हुई थी और वह भी तब जब वह नाबालिग थी.  इसके बाद मेरा केस मजबूत हो गया. आखिरकार मुझे इंसाफ मिला. अगली सुनवाई में मेरा बाल विवाह निरस्‍त हो गया.

पुलिस ऑफिसर बनना चाहती हूं 
मैंने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू कर ली है. फिलहाल जोधपुर के कॉलेज से बीए कर रही हूं. भविष्‍य में  पुलिस ऑफिसर बनना चाहती हूं.

ये कहानी सुशीला विश्‍नोई की है. जो राजस्‍थान के बाड़मेर जिले से ताल्‍लुक  रखती हैं. वे जब बारह वर्ष की थीं, तब उनके घरवालों ने जबरन उनका बाल विवाह करा दिया था लेकिन सुशीला को बाल विवाह की बेड़ियों में जकड़ना गवारा नहीं था. इसीलिए उन्‍होंने हिम्‍मत दिखाई और न केवल अपने घर वालों के खिलाफ शादी को मानने से इनकार कर दिया बल्‍कि  न्‍यायालय में इस विवाह के खिलाफ केस भी फाइल किया. आज उनका बाल विवाह निरस्‍त हो चुका है और वे पढ़ाई कर रही हैं.

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