मैं एक प्राइवेट डिटेक्टिव- मेरा काम लोगों की जासूसी करना, उनके राज खोलना

कभी अधिकारी तो कभी चपरासी, कभी पिज्‍जा वाला, कभी सब्‍जी वाला, कभी साधु तो कभी शैतान. ये कहानी है हर दिन नया भेस धरकर लोगों की जासूसी करने वाले प्राइवेट डिटेक्टिव रोहित मलिक की

Manisha Pandey
Updated: September 14, 2018, 11:54 AM IST
Manisha Pandey
Updated: September 14, 2018, 11:54 AM IST
मैं एक प्राइवेट डिटेक्टिव हूं. मेरा काम है लोगों की जासूसी करना, उनके झूठ पकड़ना, उनके राज खोलना. आसान नहीं है एक डिटेक्टिव का काम. हर समय मानो सिर पर एक तलवार लटकी रहती है. ये 9 से 5 की दफ्तर की नौकरी नहीं कि गए और काम निपटाकर वापस आ गए. मेरा काम कभी पूरी-पूरी रात चलता है तो कभी कई रातों तक लगातार. हम कभी जनगणना के अधिकारी होते हैं, कभी पिज्‍जा वाले, कभी सब्‍जी वाले तो कभी जूस वाले. कभी साधु तो कभी शैतान. हर दिन नया रूप धरकर, नया भेस बनाकर हम किसी न किसी के झूठ का पर्दाफाश करने निकलते हैं. क्‍या करें, लोग इतना झूठ जो बोलने लगे हैं.

मेरा जन्‍म हरियाणा के एक निम्‍न-मध्‍यवर्गीय जाट परिवार में हुआ. पिता रोडवेज में बस ड्राइवर थे. बहुत सामान्‍य सा परिवार था. पढ़ाई में मैं खराब नहीं था, लेकिन हालात कुछ ऐसे हुए कि कम उम्र में ही परिवार की जिम्‍मेदारी सिर पर आ पड़ी. 2009 में मैंने पहली नौकरी शुरू की एक प्राइवेट डिटेक्टिव कंपनी के साथ, सैलरी थी साढ़े आठ हजार रु. महीना. मेरे घरवालों को तो काफी दिनों तक पता ही नहीं था कि मैं काम क्‍या करता हूं. डिटेक्टिव बनने की मैंने कोई फॉर्मल ट्रेनिंग नहीं ली थी, लेकिन मेरा काम अच्‍छा था. बॉस मेरे काम से खुश थे. एक बार हमें एक ब्रांडेड परफ्यूम के नकली सप्‍लायर्स को पकड़ना था. हमें जानकारी मिली थी कि दिल्‍ली 6 की कुछ दुकानों में वो नकली माल सप्‍लाय हो रहा है. हमारी 20 लोगों की टीम एक हफ्ते से पूरे इलाके की निगरानी कर रही थी. जिस दिन हमें रेड डालनी थी, उसके एक दिन पहले पुलिस की टीम ने हमसे पूछा कि उस इलाके का नक्‍शा बनाकर दो. दिल्‍ली 6 की छोटी-छोटी, संकरी गलियां किसी भूल-भुलैया से कम नहीं, लेकिन मेरे दिमाग में उस पूरे इलाके का नक्‍शा मानो छपा हुआ था. मैंने पूरा की पूरा दीवार पर टंगे व्‍हाइट बोर्ड पर उतार दिया.

सिर्फ एक महीने ही हुए थे और मेरी सैलरी साढ़े आठ हजार से बढ़कर 12 हजार हो गई. उसके बाद मैंने कभी मुड़कर नहीं देखा.



मैंने कई प्राइवेट डिटेक्टिव कंपनियों के साथ काम किया. कुछ समय तक फ्रीलांसिंग भी की. प्राइवेट क्‍लांइट से लेकर, कंपनियों और कॉरपोरेट तक के लिए स्‍वतंत्र रूप से काम किया. कई साल इस तरह काम करने के बाद मैंने अपनी कंपनी शुरू करने की सोची. आज मैं एक सफल प्राइवेट डिटेक्टिव कंपनी चला रहा हूं और मेरे नीचे 30 से ज्‍यादा लोग काम कर रहे हैं. मेरे घरवाले खुश हैं कि मैं जो कर रहा हूं उसमें सफल हूं. मैंने अपनी कमाई से दो बहनों की शादी की. मेरे पिता ने बस ड्राइवरी छोड़ दी है. अब वो घर पर आराम करते हैं.

लोग रिश्‍तों में जासूसी क्‍यों करवाते हैं
हर पेशा आपको जीवन के कुछ सबक देता है, मेरा पेशा शायद सबसे ज्‍यादा. अकसर लोग मुझसे पूछते हैं कि लोग रिश्‍तों में जासूसी क्‍यों करवाते हैं और मेरा जवाब हर बार एक ही होता है – क्‍योंकि लोग रिश्‍तों में झूठ बोलते हैं, अपना सच छिपाते हैं. हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां सबकुछ आवरण है. जो दिख रहा है, वो सच नहीं है. जो सच है, वो पर्दे में है. लोग निजी संबंधों में झूठ बोल रहे हैं, दोस्‍तों से झूठ बोल रहे हैं, परिवार में झूठ बोल रहे हैं, कंपनी में झूठ बोल रहे हैं, सोशल मीडिया पर अपने बारे में झूठ बोल रहे हैं. इतने साल इस पेशे में रहने के बाद मुझे यही समझ में आया कि लोग हर वक्‍त, हर जगह, हर किसी से वो नहीं बता रहे, जो वो हैं. झूठ इतना बड़ा हो गया है कि वही उनका सच बन गया है.
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हमारे पास हर तरह के क्‍लाइंट आते हैं. रिश्‍तों में चोट खाई औरतें, जिन्‍हें शक है कि उनके पति का कहीं और अफेयर चल रहा है. शंकालु पति, जिन्‍हें इस बात से परेशानी है कि पत्‍नी हर वक्‍त मोबाइल पर बिजी रहती है या व्‍हॉट्सएप पर किसी से बात करती रहती है. अपनों बच्‍चों की शादी के लिए परेशान पिता, जो अपने संभावित दामाद की जासूसी करवाकर पता करना चाहते हैं कि वो सही लड़का है या नहीं. कॉरपोरेट कंपनियां भी अपने इंप्‍लॉइज की जासूसी करवाती हैं कि कहीं वे दूसरी कंपनी के लिए तो काम नहीं कर रहे. गर्लफ्रेंड अपने ब्‍वॉयफ्रेंड की जासूसी करवा रही है, ब्‍वॉयफ्रेंड अपनी गर्लफ्रेंड की जासूसी करवा रहे हैं. ये सभी शको-शुबहा के मारे लोग हमारे क्‍लाइंट हैं.



सारे फसाद की जड़ है ये सोशल मीडिया और मोबाइल
मेरा अनुभव ये कहता है कि रिश्‍तों में शक, झूठ और फसाद की सबसे बड़ी वजह मोबाइल और सोशल मीडिया है. ज्‍यादातर मामलों में ये होता है कि शक की वजह मोबाइल फोन होता है और शक के यकीन में बदलने की वजह भी ये मोबाइल ही होता है. इसी से झूठ और अफेयर पकड़े जाते हैं. और दूसरा सबसे बड़ा फसाद है- सोशल मीडिया. सोशल मीडिया एक नकली दुनिया है. वहां लोग एक खास रूप में खुद को प्रोजेक्‍ट करते हैं. फेसबुक पर इंस्‍टाग्राम पर लोग जैसे दिख रहे हैं, वास्‍तविक जीवन में वैसे नहीं है. फेसबुक आज रिश्‍ते टूटने की बड़ी वजह है. लोग फेसबुक के वर्चुअल प्रोफाइल और तस्‍वीरों को देखकर आकर्षित हो जाते हैं, फिर बातचीत और दोस्‍ती की शुरुआत होती है और वो दोस्‍ती संबंधों तक पहुंच जाती है. ऐसे तमाम वर्चुअल संबंधों का नतीजा बहुत खतरनाक रूप में सामने आता है. लोग धोखा देते हैं, झूठ बोलते हैं, शादी के बाहर रिश्‍ते बनाते हैं और एक-दूसरे की जासूसी करवाते हैं.

जब सारी दुनिया ही झूठी नजर आने लगे
हम अपने काम के प्रभाव से बच नहीं सकते. ये हमारे मन-जेहन पर भी असर डालता है. हर वक्‍त रिश्‍तों में झूठ पकड़ते, जासूसी करते हुए एक प्राइवेट डिटेक्टिव को एक समय के बाद ऐसा लगने लगता है कि मानो संसार में हर कोई झूठा है, हर कोई हर किसी को धोखा दे रहा है. एक डिटेक्टिव दूसरों का पीछा करता है, उनके राज पता कर रहा होता है. ऐसा करते-करते ऐसा भी होता है कि एक समय के बाद उसे लगने लगता है कि कहीं कोई उसका भी तो पीछा नहीं कर रहा, कि कहीं किसी और की नजर उसकी निजी जिंदगी पर भी तो नहीं. डिटेक्टिव होना आसान नहीं. यह हमारे मन पर भी असर डाल रहा है. रिश्‍तों में झूठ और धोखे की कहानियां देख-देखकर एक समय के बाद मेरा रिश्‍तों पर से भरोसा ही उठ गया था. मुझे शादी के ख्‍याल से ही डर लगने लगा. हमेशा लगता था कि कोई झूठ बोलेगा, कोई राज मुझसे छिपाया जाएगा. डिटेक्टिव तलवार की धार पर चलते हैं. हम लोगों के डर से खेलते हैं, लेकिन खुद अपने डर से भी कहां बच पाते हैं.



दुनिया एक जासूस को कैसे देखती है
जासूस को दुनिया बहुत इज्‍जत की नजर से नहीं देखती. पिता से कोई पूछे कि तुम्‍हारा बेटा क्‍या करता है तो यह कहने में उन्‍हें बहुत गर्व नहीं महसूस होता कि वो एक प्राइवेट डिटेक्टिव है. आसपास के लोग आपको शुबहा की नजर से देखते हैं. जब मैं अपनी वाइफ को डेट कर रहा था तो काफी समय तक तो मैंने उसे अपने काम के बारे में कुछ बताया ही नहीं. उसके लगता था कि मैं किसी कंपनी में काम करता हूं. जब पता चला तो वो परेशान हो गई. शक से ज्‍यादा उसे डर लगा. मेरे घरवालों को भी काफी समय तक लगता रहा कि यह खतरे का काम है. कभी मेरी जान को भी खतरा हो सकता है. ऐसा होता भी है. पुलिस भी कई बार हमारी मदद लेती है, लेकिन वही पुलिस कई बार हमारे पीछे भी पड़ जाती है. कुछ लोगों के लिए आपका काम जिज्ञासा, उत्‍तेजना और सिरहन की वजह हो सकता है, लेकिन अधिकांश लोगों के चेहरे पर एक बड़ा सा सवालिया निशान ही होता है- जासूस होना भी कोई काम है भला?

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