ठेठ गांव से था, रेस्त्रां की दीवार रंगने लंदन पहुंचा तो वहां लोगों से लेकर बादल भी हैरान करते

नाइट गार्ड की ड्यूटी करते हुए एक रोज नौकरी चली गई और मैं चाचा के पास चला आया. वे पेंटिंग करते. मुझे उनमें रंग भरने का काम मिला. रंग भरते हुए मैं कब खुद अपनी कहानी बुनने लगा, मुझे नहीं पता. पढ़ें, गोंड कलाकार भज्जू श्याम को, जो तस्वीरों के अलावा अपनी किताब लंदन जंगल बुक के लिए भी मशहूर हैं.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: September 5, 2018, 10:15 AM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: September 5, 2018, 10:15 AM IST
जबलपुर के डिंडोरी जिले का एक सुस्ताता हुआ गांव पाटनगढ़, जहां आबादी से ज्यादा पेड़-पौधे हैं. आज से 30 साल पहले गांव और भी ज्यादा गांव हुआ करता. इसी गांव में जन्म हुआ, यहीं बचपन बीता. पिता आदिवासी मजदूर थे. कमाई इतनी कम कि हम तीन भाइयों के पास कभी पूरी किताबें या स्कूल के कपड़े नहीं जुटे. स्कूल में आएदिन डांट पड़ती. किसी के पास आधी किताबें होती तो कोई बिना यूनिफॉर्म के स्कूल चला जाता. डांट खाने की बजाए मैं अक्सर छुट्टी कर लेता. भाई भी कमोबेश यही करते. बल्कि स्कूल के लगभग सभी आदिवासी बच्चों का यही हाल था.

स्कूल से बाहर की दुनिया में खूब रंग थे. हरे-भरे खेत, दूर तक पसरे सूने मैदान, बारिश के दिनों में बने अस्थायी पोखर. घर छोटा लेकिन उतना ही सुंदर हुआ करता. गोंड समुदाय में दीवारों पर ढिगना आर्ट बनाने का रिवाज है. कोई पर्व-त्यौहार हो, मां दीवार रंग देती. मिट्टी के रंग, गेरू, गोबर और चूने से आदिवासी कहानियां दीवारों पर उकेरी जातीं. मां का कद जरा कम था. कहानी पूरी बनानी थी तो मैं उनकी मदद कर देता. ऊपर के हिस्से में मैं ढिगना बनाता. तब रंगों और कला का केवल मेरे कद से ही नाता था.

उम्र बढ़ने के साथ खाने की समस्या और बड़ी हुई. 10वीं पास करके मैंने गांव छोड़ दिया. अमरकंटक में पेड़ लगाने का काम मिला. गड्ढा खोदकर पेड़ लगाने के दिन में लगभग 15 रुपए मिल जाते. सालभर बाद जरूरतें बढ़ने पर भोपाल का रुख किया. सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी मिली. वो गई. फिर इलेक्ट्रिशियन का काम किया. मानव संग्रहालय में मजदूरी भी की. कला से तब भी मेरा नाता मजदूरी का था. फिर नौकरी छूटने पर भोपाल में ही अपने चाचा जांगड़ सिंह श्याम के पास पहुंचा. वे कलाकार थे. गोंड कला से दुनियाभर का परिचय करा रहे थे. उन्होंने मुझे तस्वीरों में रंग भरने का काम दिया.



रंग भरते हुए मैं तस्वीरें बनाने लगा. चाचा जहां जाते, मुझे अपना असिस्टेंट बनाकर ले जाते. एक रोज उन्होंने मेरी पेंटिंग्स किसी और को दिखाईं. ढेर सारी तस्वीरों में से कुछ उसे पसंद आईं. चाचा के कहने पर मैं अलग से भी काम करने लगा. उनकी मौत के बाद उनके परिचितों ने मुझे काम दिया. साल 2000-2001 की बात है, मुझे लंदन में एक रेस्त्रां की दीवारों पर गोंड आर्ट बनाने का काम मिला. लंदन का वो पहला सफर और वहां बिताया हर दिन मेरे लिए कहानी बन गया.

पहली बार फ्लाइट में बैठा. मुझे एयरपोर्ट की कोई समझ नहीं थी. हर कदम पर मदद ली. फॉर्म भी किसी और से भरवाया. हवाई जहाज में बैठा तो दुनिया जैसे उल्टी हो चुकी थी. बादल मेरे नीचे चल रहे थे. पेड़ों की फुनगियां भी घास की तरह पैरों के नीचे नजर आतीं. सबकुछ बेहद खूबसूरत था. 9 घंटे के सफर में मैं पूरे समय खिड़की से नीचे देखता रहा. साथ में हिंदी-अंग्रेजी बोलने वाला भी गया था. उसने होटल में ठहराया. रेस्त्रां ले गया. हफ्तेभर बाद वो लौट गया.
मुझे अंग्रेजी बोलना नहीं आता था. किंग्सक्रॉस में रहता था और इजलिंग्टन जाना होता था. इन्हीं दो जगहों के नाम रट लिए और यही बोलकर टिकट लेता.

लंदन के पेड़-पौधे से लेकर वहां से लोग और सड़कें भी मेरे लिए अजूबा थीं. लोग स्टेशन में, खुली सड़क पर कहीं भी एक-दूसरे से प्यार जताने लगते. लिपटे हुए जोड़ों के बगल से निकलते हुए झेंप जाता. अलग तरह से बाल बनाते. आंखें मेकअप से खिंची हुई रहतीं. वहां शाम को पबों और रेस्त्रां में इतनी भीड़ रहती कि मैं हैरान रह जाता. शायद यहां घरों में चूल्हा नहीं जलता होगा! बिजली से चलने वाली सीढ़ियां. काले कपड़ों में लिपटे भागते हुए लोग. मैं जितने दिन रहा, हैरानी से बस देखता रहा.



वापसी में किसी वर्कशॉप के दौरान लंदन के दिनों का जिक्र छिड़ा. तारा बुक्स वालों ने इसे तस्वीरों वाली कहानी की शक्ल देने की बात कही. मैं पेंटिंग बनाने तो लगा लेकिन बार-बार ठिठक जाता. हम आदिवासी अपनी कहानियों की ही तस्वीरें बनाते हैं. पेड़ों की पूजा करते हैं. पहाड़ों को सगा मानते हैं. दीमक की बांबी से बात करते हैं. लंदन जैसे चमचमाते शहर को अपनी कहानियों से कैसे जोड़ूं! तीन महीने काम किया. अंडरग्राउंड ट्रेनें आदिवासी किस्सों के केंचुओं में बदल गईं. काले कपड़ों वाले लोग चमगादड़ों में. बादल-पेड़-पानी- सबको तस्वीरों में उतार लाया. ये किताब लंदन जंगल बुक के नाम से 2004 में लंदन में ही रिलीज हुई. सराही गई. उसके बाद से 15 देश घूम चुका हूं लेकिन कल्पना अब भी उतनी ही आदिवासी है.

भोपाल में ही अपने छोटे से स्टूडियो में काम कर रहा ये पद्मश्री कलाकार अपनी पेंटिंग्स की चोरी की खबरें भी सुनता रहता है. हालांकि उनका सरल आदिवासी स्वभाव इसे मुद्दा नहीं बनाता. भज्जू बताते हैं, अक्सर पता चलता रहता है कि फलां के ड्रॉइंगरूम में मेरी पेंटिंग की कॉपी सजी है. मैं पेंटिंग बनाता हूं तो चोरी करने वाले लिहाज में उसे सीमेंट, लोहे या लकड़ी पर कॉपी कर लेते हैं. पता चलने पर पूछता हूं तो तपाक से कहते हैं- आपसे 'इन्सपायर्ड' होकर बनाई है. चोरी को सभ्य भाषा में इंस्पिरेशन का नाम देना नया चलन है.

गेरू, मिट्टी और गोबर के रंगों से कैनवास सजाते भज्जू की कला दरअसल इंसानों को प्रकृति से जोड़ने की कला है.

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