#HumanStory: स्कूल में था जब मेरे दोस्त लड़कियों के पीछे भागते, मैं लड़कों के बारे में सोचता

गे लड़कों की जमात में भी काफी भिन्नता थी. गे वे नहीं होते, जिनके शौक लड़कियों जैसे हों. ये जरूरी नहीं. उनकी स्पोर्ट में दिलचस्पी हो सकती है, कोई गे किताबों की दुनिया में खोया रहता है

News18Hindi
Updated: September 6, 2018, 12:10 PM IST
News18Hindi
Updated: September 6, 2018, 12:10 PM IST
(इनपुट- कल्पना शर्मा)

(दिल्ली के आकाश ने एक लंबा अरसा अपनी सेक्सुअल आइडेंटिटी को लेकर संघर्ष किया. तमाम उतार-चढ़ाव के बाद आखिरकार अब उन्हें खुद को गे मानने में कोई झिझक नहीं.)

स्कूल में था जब मुझे अपनी पसंद का अहसास हुआ. उस वक्त, जब लड़के लड़कियों को खत लिखने में रातें तमाम करते, मुझे लड़के अच्छे लगते थे. मैं अपनी क्लास के लड़कों के बारे में सोचा करता. मेरी काफी सारी मेहनत अपनी इमोशन्स को छिपाने में लगा करतीं. वक्त के साथ कई परतें खुलीं. मुझे बताया गया कि मैं अकेला नहीं. क्लास में और पूरे स्कूल में ऐसे कई लड़के थे, जिन्हें लड़के ही अच्छे लगते.

गे लड़कों की जमात में भी काफी भिन्नता थी. गे वे नहीं होते, जिनके शौक लड़कियों जैसे हों. ये जरूरी नहीं. उनकी स्पोर्ट में दिलचस्पी हो सकती है, कोई गे किताबों की दुनिया में खोया रहता है. गे दुनिया भी अपने में काफी विविधता लिए हुए है. धीरे-धीरे कई और बातें मुझे पता चलीं. क्लास में किसी तरह का कोई मजाक हो तो हमें चुप रहना है. अगर हम विरोध करेंगे तो सबको सच पता चल जाएगा.

बाद के दिनों में कई लड़कियों से दोस्ती हुई. उनमें से कई ने अपनी पसंदगी जाहिर की. लेकिन मैं ज्यादा से ज्यादा उन्हें घुमा-फिराकर खुश कर सकता था. मैं किसी से सीधा नहीं कह सका कि मुझे तुम में नहीं, लड़कों में दिलचस्पी है. इससे भी ज्यादा मुश्किल थी पेरेंट्स के साथ छिपम-छिपाई. अपने बेटे की शादी उनका सबसे बड़ा सपना थी. बच्चे पैदा होंगे और उनका वंश आगे बढ़ेगा.

इसमें जरा सा भी कुछ बदले तो मानो उनकी जिंदगी 'खत्म' हो जाती है. अपने बच्चे को सही ट्रैक पर लाने के लिए वे तमाम जोर लगाते हैं. वही मेरे साथ हुआ.

मैंने पेरेंट्स को बताया कि मुझे लड़कियों में थोड़ी भी दिलचस्पी नहीं. मैं या तो किसी लड़के के साथ रह पाऊंगा या फिर किसी के भी साथ नहीं रह सकूंगा. मैंने शादी के लिए साफ मना कर दिया. मां बीमार होकर अस्पताल पहुंच गईं. पापा खुदकुशी की धमकी देने लगे. जैसा वे चाहते थे- मैंने शादी कर ली. मैं नहीं बता सकता था कि मैं उसे पूरी तरह से प्यार क्यों नहीं कर पाता. उसे लगता, मैं किसी दूसरी के साथ जुड़ा हूं. ये वजह उसके मन के आसपास तक नहीं फटकी. रिश्ता चार महीने भी नहीं टिका.



खेल और पढ़ाई में खूब चमकीला लड़का अब अवसाद में था. शादी टूट चुकी थी. मां-पिता मुझे बीमार मानते और रिश्तेदारों में भी खुसपुस होने लगी थी.

मुझे डॉक्टर के पास ले जाया गया. उसने इलाज सुझाया- डिप्रेशन की दवाएं. दोस्तों से दूरी और पेरेंट्स के साथ वक्त बिताना. इलाज का असर ये हुआ कि मुझे पूरे वक्त नींद आने लगी. अकेलेपन के साथ अवसाद और बढ़ने लगा. यानी मेरी बीमारी लाइलाज दिखने लगी. नाते -रिश्तेदार मुझसे कटने लगे. उन्हें लगता, मेरा साथ उनके बच्चों पर भी 'हार्मफुल' असर डालेगा. हालांकि कोई मुझसे सामने आकर बात नहीं करता.

लंबा अरसा अकेलेपन और शर्मिंदगी के साथ बिताने के बाद अब मैं अपनी पहचान के साथ जी रहा हूं. पेरेंट्स मुझे दूर से सपोर्ट करते हैं. वे अब भी इसी उम्मीद में हैं कि किसी रोज उनका बेटा अकेलेपन से ऊब जाएगा और वे उसके लिए एक अच्छी सी दुल्हन ला सकेंगे. लेकिन मैं अब साफ हूं. न तो मैंने किसी का खून किया है, न किसी को किडनैप किया है. अपने बेडरूम में मैं क्या करता हूं, इसका किसी कोई वास्ता नहीं होना चाहिए.

कुछ वक्त पहले मां ने पूछा- तुम क्या अब भी उसी 'फील्ड' में हो! उन्हें गे शब्द के इस्तेमाल में भी एतराज था.



सेक्शन 377 के हटने पर जिंदगी में क्या बदलाव आएंगे, ये सवाल बहुतों के मन में आता है.

आकाश साफ कहते हैं, जब हम सड़क पर गाड़ी लेकर निकलते हैं तो हमें धाराएं नहीं पता होतीं. हम सिर्फ ये जानते हैं कि हमारी गाड़ी से किसी को ठोकर नहीं लगनी चाहिए. हर किसी को किसी दूसरे को नुकसान पहुंचाए बिना अपनी जिंदगी बिताने का हक है. इसमें 377 जैसे डिजिट्स मायने नहीं रखते. हालांकि ये हट जाएगा तो समान सेक्स के लिए आकर्षण रखने वालों की जिंदगी आसान हो जाएगी. उन्हें छिपना नहीं होगा.

मैंने जिंदगी का लंबा वक्त खुद की पसंदगी को छुपाते हुए बिताया. शादी टूटी. कुछ सबसे अजीज रिश्तों को तकलीफ दी. खुद डिप्रेशन में रहा. दोहरेपन से निकलना ही तमाम तकलीफों का इलाज था. जिस दिन मैंने ये समझ लिया, जिंदगी सुलझने लगी.

ये भी पढ़ें-

#HumanStory: दास्तां, उस औरत की जो गांव-गांव जाकर कंडोम इस्तेमाल करना सिखाती है

#HumanStory: गोश्त पर भैंस की थोड़ी-सी खाल लगी रहने देते हैं वरना रास्ते में मार दिए जाएंगे

HumanStory: गंदगी निकालते हुए चोट लग जाए तो ज़ख्म पर पेशाब कर लेते हैं गटर साफ करने वाले

34 बरस से करते हैं कैलीग्राफी, ये हैं खत्म होती कला के आखिरी नुमाइंदे

दास्तां एक न्यूड मॉडल की: 6 घंटे बगैर कपड़ों और बिना हिले-डुले बैठने के मिलते 220 रुपए
पूरी ख़बर पढ़ें
अगली ख़बर