#HumanStory: 33 सालों से सांप पकड़ना है पेशा, सबसे ज़हरीले सांप के डसने पर भी नहीं हुई मौत

मैंने अब तक 20 हजार से कुछ ज्यादा ही सांप पकड़े होंगे. घर पर ताला लगाकर निकलता हूं तो पता नहीं होता है कि वापसी होगी भी या नहीं.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 9, 2018, 11:48 AM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 9, 2018, 11:48 AM IST
(मध्यप्रदेश के खलील खान सांप और हर तरह के जहरीले जानवर पकड़ने का काम करते हैं. 52 साल के खलील बीते 33 सालों से यही कर रहे हैं. पढ़िए, खलील को.)

गहरे रंग की शेरवानी में तेजी से बोलते खलील को देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल है कि वे बचपन से खतरों के खिलाड़ी रहे हैं. यहां तक कि उम्र के इस पड़ाव पर जब कमर चश्मे की कमान से मुकाबला करने लगती है, खलील बला की फुर्ती से जहरीले से जहरीला सांप पकड़ लेते हैं.

वे याद करते हैं, जन्म ग्वालियर में हुआ. पिता फर्नीचर का काम किया करते. कई बार अम्मी लकड़ी लेने के लिए जंगल भेजतीं. मैं कई किलोमीटर दूर जंगल जाया करता. हाथ में एक कुल्हाड़ी होती और खाने को केला या मूंगफली जैसी चीजें. जैसे-जैसे अंदर जाते, किस्म-किस्म के जानवर मिलते. मैं डरता नहीं, उनके पीछे लग जाता. मुझे इसमें मजा आता था. ऐसे ही एक रोज भालू से सामना हुआ. खुद-से कई गुना वजनी जंगली भालू को देखकर डर लगा. बचने की कोशिश में शाम गहरा चुकी थी. आखिर हिम्मत करके मैंने भालू को बस में किया और उसे साइकिल पर बांधकर ले गया, जैसे बकरी को बांधा हो. रेंजर के पास पहुंचकर जानवर उन्हें सौंपा. मैं थकान से चूर था. भालू चलने में आनाकानी करता, मुझे लगभग उसे घसीटते हुए लाना पड़ा. खतरा तो था ही.

खूब अच्छी तरह से याद है, रेंजर ने शाबासी देते हुए मुझे 5 रुपए दिए और साथ में मेरे पिता को भी बता दिया. घर लौटा तो मार पड़ी. पापा ने अम्मी से कहा कि मुझे समझा दें वरना किसी रोज मेरी जान चली जाएगी.



संपेरे को चाय पिलाई ताकि वो मुझे गुर सिखा दे

गरीबी के दिन थे. पिता जो भी काम करते, मुझे भी साथ ले लेते. फर्नीचर बनाते तो मैं साथ रहता. घर पर मजदूरी करते तो मैं भी साथ देता. इन कामों में मन नहीं लगता था. रोज के डेढ़ रुपए मिलते इसलिए काम छोड़ भी नहीं सकता था. एक रोज घर पर सांप निकला. खलबली मच गई. संपेरे को बुलाया गया. मैं उसके साथ-साथ घर के भीतर गया. देखता रहा कि वो कैसे सांप पकड़ता है. फिर मैंने उसे चाय पिलाई और अपनी गाढ़ी कमाई का एक रुपया दिया. दिनभर खटने पर मिलने वाली कमाई का बड़ा हिस्सा ताकि वो मुझे बताए कि आखिर सांप पकड़ते कैसे हैं. थोड़ा-बहुत उसने बताया. फिर दूसरे संपेरों से भी जान-पहचान बढ़ाई. कहीं भी सांप निकलता तो काम-धाम छोड़कर मैं साथ हो लेता. देखते-देखते सीखने लगा.
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धीरे-धीरे मैं सांप पकड़ने वालों का दोस्त नहीं, खुद सांप पकड़ने वाला बन गया.

काम के सिलसिले में भोपाल पहुंचा. वहां बोट बनाने से शुरुआत की. एक रोज एक बड़ी जानी-मानी महिला के घर सांप निकला तो मुझे बुलाया गया. उसके बाद से मैं भोपाल में भी जाना जाने लगा. मेरा नंबर लोगों में बंट गया कि सांप या कोई भी जंगली या जहरीला जानवर पकड़ने के लिए खलील से बात करें. भोपाल में जंगलों के कारण वैसे भी ऐसा होना आम है. बहुत तरह के जानवर पकड़े. सांप, कबरबज्जू, लोमड़ी. जंगली जानवरों को पकड़ने में जान का जितना खतरा है, उतनी और परेशानियां भी हैं.

कई बार लोग बुलाते हैं कि चले आइए, सांप निकला है. मैं आनन-फानन ऑटो करके पहुंचता हूं तो पता चलता है कि सांप बाहर भाग चुका. कुछ किया नहीं तो ऑटो का किराया कोई क्यों देगा. फिर खुद ही वो पैसे भी भरने होते हैं.



सबसे जहरीले सांप के काटने पर भी कुछ नहीं हुआ

तकरीबन 33 साल हुए ये काम करते. दो साल पहले एक करैत ने मुझे काट लिया. सबसे जहरीला सांप है. काटते ही ज्यादा से ज्यादा पांच मिनट में जान चली जाती है. मैंने दबा-दबाकर जहर निकाल दिया. लेकिन तब भी लोग मुझे अस्पताल ले गए. तब तक साढ़े तीन घंटे हो चुके थे. मैं एकदम भला-चंगा था. साथ में सांप भी एक डिब्बे में था. ऐसे हादसे अक्सर होते रहते हैं. मैं बिना चिल्ला-चोट किए जहर निकालकर घर लौट जाता हूं. कौन सा सांप कितना जहरीला होता है, ये खलील मियां को खूब अच्छी तरह से पता है. जान बचने पर हर वे ऊपरवाले का शुक्रिया अदा करते हैं. कहते हैं, इतने सालों से ये काम कर रहा हूं. साल 2011 से नगर निगम में काम मिला तब से हिसाब रख रहा हूं. अब तक 20 हजार से ज्यादा सांप पकड़कर जंगल में छोड़े. कितनी बार जान पर बनी लेकिन ऊपरवाले ने बचा लिया. सबसे पहले ऊपरवाला और उसके बाद फुर्ती, हिम्मत और नजर का खेल. जरा नजर चूकी और जान गई. सांप भी लुकाछिपी खेलता है. कभी टीवी के पीछे, कभी बिस्तर में, कभी किसी बॉक्स में तो कई बार वॉशिंग मशीन में घुस जाता है. सांप पकड़ते हैं तो तीन जानें बचती हैं, एक तो जिसके घर पर आया उसकी जान. दूसरी सांप की जान और तीसरी पकड़ने वाले की जान.

ताला लगाकर घर से निकलते हैं तो पता नहीं होता है कि वापस लौटकर ताला खोल भी सकेंगे या नहीं.

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