36 सालों बाद लाहौर जेल से छूटकर आया ये शख्स अपनी पत्नी को भी भूल चुका है

जिंदगी के 36 साल लाहौर सेंट्रल जेल में बिताने के बाद गजानंद शर्मा की रिहाई हुई. ये कहानी है उनके परिवार की जिजीविषा की. ये कहानी है इंतजार की.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 22, 2018, 10:11 AM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 22, 2018, 10:11 AM IST
वतन की सरहदें सिर्फ सैनिकों और उनके परिवारों की जिंदगी नहीं बदलतीं. सरहदों का उन मछुआरों से भी ताल्लुक है जिन्हें अनजाने ही समंदर की लहरें उस ओर धकेल देती हैं. ये उनकी जिंदगी भी तितर-बितर कर देती हैं जो गलती से सीमा पार पहुंच जाते हैं. राजस्थान के गजानंद शर्मा का कुनबा भी इन्हीं में से है. ये वही गजानंद हैं, जिनकी खबरों ने 14 अगस्त को पूरा सोशल मीडिया तिरंगा कर दिया. 36 साल पाकिस्तानी की जेल में बिताने के बाद गजानंद लौटे. गाजे-बाजे और फूलमालाओं से उनका स्वागत हुआ. पत्नी मखनी देवी की हरियल साड़ी को हरियाली तीज से जोड़ा गया. पूरे परिवार के चेहरे पर बिछड़े पति-पिता को वापस पाने का नूर था. लेकिन उस नूर के पीछे भी बीते हुए 36 सालों का हिसाब छिप नहीं पा रहा था.

गजानंद के छोटे बेटे मुकेश कहते हैं, मैं तब 12 साल था. पिताजी की खास याद नहीं है. बस यही कि वो रिक्शा चलाया करते थे और कई बार मजदूरी भी करते. मेरी याद में हम कभी भी भरपेट खाकर नहीं सोए. साल 1982 में एक दिन पिताजी कमाने के लिए गए तो वापस नहीं लौटे. उनकी खोज-ढूंढ मची. तब जयपुर के सामोद में रहा करते थे. छोटा सा गांव. कोई फूफा था तो कोई ताऊ. सब मिलकर खोजने लगे लेकिन पिताजी नहीं मिले. मां थाने भी गई लेकिन रिपोर्ट नहीं लिखवाई. वो पढ़ी-लिखी नहीं थी और न ही हममें या हमारे जानने वालों में कोई इतना जानता था.

गजानंद शर्मा

तब गजानंद 32 के हुआ करते. मखनी उनसे कुछ साल छोटी. जीवन की तमाम उमंगों और संभावनाओं का एकाएक मानो अंत हो गया. पहले गरीबी में भी हंसती-खेलती मखनी देवी गुमसुम हो गईं लेकिन सोग मनाने की गुंजाइश नहीं मिली. मुकेश याद करते हैं, मां को बच्चों के साथ अपना भी पेट भरना था. मिलने वाले आते, दुख जताते और चले जाते. तब मां ने काम शुरू किया. पढ़ी-लिखी नहीं थी इसलिए कुछ भी कर सकती थी. उसने दुनियाभर के काम किए. तब एक पीपा (टिन) गेहूं बीनने के 10 पैसे मिलते. 5 किलो छोले छीलने के 25 पैसे. कहीं जाकर रोटी बना देती. शादियों में सब्जियां काटती. मसाला कूटा. जिसने जो काम दिया, उसने किया. बाद में 30 रुपए महीने पर एक स्कूल में साफ-सफाई का काम मिला. यहां से हमारे हालात कुछ सुधरने लगे. तब जिंदगी में पहली बार हम भरपेट खाने लगे थे.

वक्त के साथ आर्थिक हालात सुधरने लगे. त्यौहार-बार पर शर्मा परिवार की हांडी की महक भी पड़ोस के घरों को न्यौतने लगी लेकिन सामाजिक हालात तब भी नहीं बदले. लोग हमारे यहां आते और पिताजी के जिक्र से जख्मों को कुरेदकर चले जाते. हम भाइयों की शादी के वक्त उनके मन की फांसें खुलकर सामने आईं. रिश्ते आते तो थे लेकिन लड़कीवालों की दिलचस्पी हम लड़कों से ज्यादा पिताजी के बारे में होती. वे खोद-खोदकर पूछते. हमने बताया कि हमें नहीं पता, वे कहां हैं. शायद घर के हालातों से घबराकर घर छोड़ दिया. हो सकता है, साधु हो गए हों या मंदिर में काम करते हों. बहुत खोद-खाद के बाद आखिरकार लड़कीवालों को कुछ तसल्ली हुई.



36 साल. हम बड़े हुए. हमारे खुद के बच्चे बड़े हो गए. अब तक हमने उनके आने की आस खो दी थी. मां को छोड़कर. वो किसी भी त्यौहार पर उन्हें उतनी ही आजिजी से याद करती. इसी साल 7 मई को हमारे पास फोन आया. पाकिस्तानी सरकार हमारे पिता की राष्ट्रीयता की जांच करना चाहती थी. मां ने सुना तो पहले तो समझ ही नहीं सकी, फिर रो पड़ी. 'मिले भी तो कहां मिले. अब वापस कैसे लौट सकेंगे!' किसी तरह उन्हें समझाया-बुझाया. थाने में जाकर सारे कागज जमा किए.
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ये सौ दिन हमारी जिंदगी के सबसे मुश्किल दिन थे. उन दिनों से भी ज्यादा, जब मां रातभर इसलिए काम करती कि सुबह परचून की दुकान जा सके. पिताजी की पुरानी तस्वीरें हमारे पास थीं. उन्हें देखते. उनसे जुड़ी यादें ताजा करने की कोशिश करते. मां बहुत सी बातें करतीं. इतने सारे सालों का सारा गुबार निकल रहा था. आखिरकार वो लौट आए. जब गए तो 32 साल के थे, लौटे तो दो हाथ उन्हें सहारा दे रहे थे. चेहरे पर रौब की जगह झुर्रियों ने ले ली थी. आवाज और यहां तक कि लहजे में भी अक्सर पाकिस्तानी पंजाब का पुट आ जाता है.



हम उन्हें पिता पुकारते हैं लेकिन वे हमें नहीं पहचानते
हमने दिन-दिन गिनकर बिताए. पिता लौट तो आए लेकिन उन्हें कुछ याद नहीं. यहां तक कि अपनी पत्नी को भी नहीं पहचान पा रहे हैं. जो भी खाना देता है, उसे माई-बाप कहने लगते हैं. आए थे तो पहली दो-तीन रातें मुश्किल गुजरीं. वो सोते-सोते चिल्ला उठते. डर जाते. शायद ये पाकिस्तानी जेल की बदसुलूकी का असर हो. हरदम खुली हवा में रहे लेकिन यहां कमरे के भीतर रहते हैं. लाइट जलाने पर डर जाते हैं. किवाड़ खोलने पर भड़क उठते हैं. गांव-पड़ोस-दूर-दराज से लोग उनसे मिलने आ रहे हैं लेकिन वो देखते ही सबको बरज देते हैं.

जिंदगी के जितने साल बाहर बिताए, उससे कहीं ज्यादा वक्त उन्होंने सलाखों के भीतर गुजारे. शरीर पर जख्मों के हल्के-गहरे निशान उनकी तकलीफों के गवाह हैं. अब वे हमें न पहचानें, गुस्सा करें या रौशनी से डरें, इन सबके बावजूद सुकून है कि वे अपन वतन में आखिरी सांस लेंगे.

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