#HumanStory: मॉडल बनने के बाद मुझसे एक रात की कीमत पूछी, 'नहीं' पर बोले- तेरी औकात ही क्या है...

मैं तीसरी क्लास थी. स्कूल में फैंसी ड्रेस कंपीटिशन में हिस्सा लिया. खूब चाव से 'परी' बनी. जैसे ही स्टेज पर पहुंची, नीचे से किसी ने कहा- देखो, काली परी आ रही है.

Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 10, 2018, 10:47 AM IST
Mridulika Jha | News18Hindi
Updated: August 10, 2018, 10:47 AM IST
कुछ परियां काली भी होती हैं... कहानी एक ऐसी ही परी की.

(मॉडलिंग की दुनिया जितनी चमकीली है, उसके भीतर उतना ही गहरा अंधेरा है. यहां नपा-तुला शरीर चाहिए. चर्बी- न कुछ कम, न थोड़ी ज्यादा. यहां औसत ऊंचाई वाले लोग बौने कहे जाते हैं. ऐसे में काले रंग की मॉडल! रिनी कुजूर का रंग रात जितना गहरा है. उनकी उम्र बढ़ी हुई है. और- वे सुपर-मॉडल हैं.) 

रिनी मूलतः छत्तीसगढ़ के जशपुर में एक छोटे से गांव से हैं. एक ठेठ आदिवासी इलाका, जिसकी पहचान ही उसका पिछड़ापन है. वे बताती हैं, साल 1980 के आसपास मेरे पेरेंट्स रोजी-रोटी के लिए दिल्ली आए. पापा क्लर्की करने लगे और मां घर का खर्च पूरा करने के लिए घरों में काम.

तब हम गोविंदपुरी के स्लम में रहा करते. दरवाजे की जगह मोटी टाट लटकती और एक कमरे का घर शुरू होते ही खत्म हो जाता. इन सारी चीजों से मुझे कोई तकलीफ नहीं थी. गांव से इतने बड़े शहर में आना भी एक किस्म की उपलब्धि थी. मैं खुश रहती. दूसरे बच्चों के साथ खेलती.

मुश्किलों की शुरुआत स्कूल जाने के साथ हुई. बड़े बच्चे, छोटे बच्चे, साथ के बच्चे- सब मुझे ऐसे देखते मानो मैं कोई अजूबा हूं. यहां तक कि टीचर भी. तब पहली बार सुना- मैं काली हूं. बदसूरत हूं. एक बार एक फैंसी ड्रेस में परी की पोशाक पहनकर चली गई. इधर मैं स्टेज पर पहुंची, उधर नीचे से कोई चिल्लाया- अरे, काली परी आ गई. मैं वहीं पर रोने लगी. रोते हुए ही स्टेज से नीचे उतर आई. सब हंस रहे थे. टीचर भी डांटने की बजाए मुंह दबाकर हंसी रोक रहे थे. उसके बाद से पूरे स्कूल के दौरान मेरी कभी हिम्मत नहीं पड़ी कि स्टेज पर चढ़ूं. क्लास के बच्चों से कभी झगड़ा होता तो टीचर सुलह कराने की बजाए मुझे डांटते कि जाने कहां-कहां से गंवार बच्चे चले आते हैं.



होता है न कि सारे सुंदर-सुंदर बच्चे एक ग्रुप में रहें और बदसूरत या कमजोर बच्चे एक ग्रुप में. मैं हमेशा दूसरे ग्रुप में रही.

स्कूल के बाद कॉलेज की बारी आई तो बड़े भाई ने फरमान जारी कर दिया- तुम को-एजुकेशन में नहीं जाओगी और न ही कॉलेज जाओगी. मैंने घर से ही आर्ट्स में ग्रेजुएशन किया. भाई बात-बात पर बिदकता. मेरे कपड़ों पर गुस्सा करता. फैशन के शौक को हिकारत से देखता. मुझे सजने-संवरने का शौक था. मेकअप करना अच्छा लगता. छोटे कपड़े पहनना पसंद था. कौन यकीन करेगा कि आज रैंप-वॉक करने वाली लड़की को कुछ सालों पहले जींस पहनने की भी मनाही थी.
चार लोग देखेंगे तो क्या कहेंगे, ये बात उनके लिए हरि-भजन जैसी थी. रोज कितनी ही बार मुझे टोकते.

मॉडलिंग की इच्छा तो थी लेकिन बचपन के फैंसी ड्रेस कंपीटिशन का हश्र भूली नहीं थी. मैंने रेस्त्रां में काम करना शुरू कर दिया. पार्टी होस्टेस बनती यानी घरेलू पार्टियों में मेहमानों को खाना परोसने का काम. तब भी रंग पर मजाक बनता रहता. सड़क चलते हुए लड़कों का कोई ग्रुप कहता- कितनी 'बदसूरत' है. या फिर कितनी काली है. कालापन और बदसूरती एक ही बात थी. काम शुरू करने पर हालांकि मैंने खुद पर ध्यान देना शुरू किया.
पहली बार पार्लर गई. अपने कपड़े अपनी मर्जी से खरीदे. लोगों से मिलने लगी तो काले रंग से ध्यान हटने लगा.



साल 2008, जब पहली बार मेरी किसी ने एक सुपर-मॉडल से तुलना की
मैं एक मल्टी-डिजाइनर स्टोर पर काम कर रही थी. वहां क्लाइंट ने कहा कि तुम रेहाना जैसी दिखती हो. मैं नहीं जानती थी, ये रेहाना कौन है. बात आई-गई हो गई. हालांकि मॉडलिंग में जाने का मेरा ख्वाब तब भी मरा नहीं था. मॉडलिंग में सबसे पहली शर्त होती है पोर्टफोलियो तैयार करना. पोर्टफोलियो यानी आपकी तस्वीरों का एलबम. मैं नौकरी करते हुए उसके लिए पैसे जमा कर रही थी कि तभी जिंदगी ने यू-टर्न लिया. मेरी नौकरी चली गई. मैं घर बैठ गई. दूसरी नौकरी मिल नहीं रही थी. जिंदगी में पहली बार हार मान ली और मां-पापा के पास गांव चली गई. ये साल 2012 की बात है.

गांव में ताजी हवा और घरवालों का साथ तो था लेकिन मन से सुकून कोसों दूर था. मैं घुटती रहती. सबको लगा कि बेटी छुट्टियों पर आई है लेकिन मैं तो जाने का नाम ही नहीं लेती थी.

आखिरकार मां ने पूछ लिया. मैंने सब बताया कि कैसे मेरी नौकरी चली गई. मेरे पास कोई काम नहीं है, पैसे नहीं हैं और मैं दिल्ली नहीं लौटूंगी. मां ने सब सुना और कहा कि इतने बड़े शहर में मौका न खोज पाना शर्मनाक है! मेरी बेटी ने दिल्ली में रहने के बाद भी हार मान ली. मेरी जेब खाली थी. कोई उम्मीद नहीं थी. ये सब सुनकर भड़क गई.

हम मां-बेटी की वो बातचीत बिल्कुल फिल्मी थी और क्लाइमैक्स और भी ज्यादा फिल्मी. मैंने न लौटने की धमकी देकर घर छोड़ दिया. वापस लौटी तो काम नहीं था. घर-वापसी के रास्ते भी खुद बंद कर आई थी.



मैंने अपने बचे-खुचे पैसे पोर्टफोलियो तैयार करने में लगा दिए. रोज एक से दूसरी जगह काम के लिए भटकती लेकिन काली लड़की किसी का मॉडल नहीं बन सकी. मैंने साथ के साथ पार्टटाइम काम शुरू कर दिया ताकि खाने-कमरे का खर्चा निकल जाए. जिस कंपनी में काम मिला, वहां देशी-विदेशी क्लाइंट आते. वे कहते- मैं रेहाना जैसी लगती हूं. मेरे साथ सेल्फी खिंचवाते. मुझे इंडियन रेहाना कहते.

तब पहली बार मैंने रेहाना को सर्च किया. इंटरनेशनल पॉप-आइकॉन रेहाना से मेरी सूरत किस कदर मेल खाती थी! मेरी उम्मीदें बढ़ गईं.

मॉडलिंग इंडस्ट्री में किस्म-किस्म के लोग होते हैं. कई खराब फोटोग्राफर्स से मिली. उन्होंने अच्छी तस्वीरों के लिए साथ सोने की बात कही. वक्त निकल रहा था लेकिन मुझे हरदम मां की बात याद आती. 'जो भी करना, कभी गलत काम नहीं करना. अपनी मेहनत की कमाई ही खाना.' कई बार हिम्मत टूटती तो यही बात सहारा बनती. लगा कि गलत करूंगी तो आइने में खुद से नजरें कैसे मिला सकूंगी. कुछ अच्छे लोग भी मिले. उन्होंने अच्छे क्लिक्स किए. आखिरकार साल 2015 में पहला असाइनमेंट मिला. ये कामयाबी की शुरुआत थी लेकिन डार्क मॉडल के रास्ते आसान नहीं होते.

मॉडलिंग शुरू की तब मैं 28 साल की थी. ये उम्र मॉडलों के लिए रिटायरमेंट की उम्र मानी जाती है.

दोस्त कहते, ये तेरी शादी की उम्र है. शादी कर. घर में रह. बच्चे संभाल. मैं घूम-घूमकर काम खोजती. लोग रिजेक्ट करते रहते. पोर्टफोलियो पसंद आता तो मेरी डेट ऑफ बर्थ देखकर मना कर देते. मुझसे मिले बिना ही तय कर लिया जाता कि इसका चेहरा फ्रेश नहीं होगा, इसकी आंखें सूजी लगती होंगी, झुर्रियां तो जरूर ही होंगी और शरीर भी ढलने की कगार पर होगा.




पहले मैं सिर्फ काली थी, अब मैं बूढ़ी भी थी. ऐसे में मिलने पर लोग मुझे कमउम्र मान लेते तो मैं उनकी गलती नहीं सुधारती थी.


अब मैं 33 की हूं. बीबीसी लंदन में इंटरव्यू के दौरान पहली बार अपनी उम्र का खुलकर जिक्र किया. जब रेनी कहती हैं, 'खूब रिजेक्शन देखा, अब वही लोग मुझसे मिलने के लिए मरते हैं', तो उनकी आवाज की खनक उनकी कामयाबी के किस्से कहती है. मैंने बताया कि मैं 23 नहीं, 33 की हूं. गोरी नहीं, काली हूं और फिर भी मॉडलिंग मेरा पैशन है.

शुरुआती काम के दौरान कई दिलचस्प बातें हुईं. सबकी-सब मेरे रंग के इर्द-गिर्द घूमतीं. एक बार एक बहुत सीनियर मेकअप आर्टिस्ट की क्लास में सबने 'डिमांड' की कि रिनी को दो स्किन-टोन हल्का करके दिखाया जाए.

मेकअप आर्टिस्ट मुझे किसी चुनौती की तरह देखते. इसलिए अपनी मॉडल बनाते ताकि वे एक बदशक्ल लड़की को खूबसूरत बना सकें.

इतने सालों में रंग को लेकर मैंने इतनी बातें सुन ली थीं कि रोना बंद कर चुकी थी. कई तरह के लोग भी मिले. कई लोग मुझसे एक रात की कीमत पूछते. मना करने पर भड़क जाते कि तेरी औकात ही क्या है, 500 रुपए में तेरे जैसी बिकती हैं. मैं सबको नजरअंदाज करती.

एक काली परी के पास आज कई इंटरनेशनल असाइनमेंट हैं.

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