#HumanStory: 'लोग कहते हैं, फेसबुक पर ब्रेस्ट कैंसर का एलान करोगी तो बेटे का रिश्ता नहीं होगा'

जब रिपोर्ट आई तो डॉक्टर के चेहरे पर तनाव की लकीरें थीं. मैंने हंसते हुए पूछा- कोई छोटी-मोटी बीमारी तो नहीं है! मुझे राजेश खन्ना जैसी बीमारी चाहिए.

News18Hindi
Updated: August 17, 2018, 10:23 AM IST
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(औरत के ब्रेस्ट का 'आकार' में होना उनके स्त्रीत्व और सौंदर्य का मानक बना दिया गया है. ऐसे में उस औरत पर क्या बीतती है, जिसे ब्रेस्ट कैंसर हो जाए. सरिता जैन एक ऐसी ही 'अधूरी' औरत हैं. बस, फर्क इतना ही है कि इनकी जिंदादिली की मिसालें दी जाती हैं.)

जनवरी 2004 की बात है. मैं एक लेडीज संगीत से लौटी. ब्रेस्ट में हल्का दर्द हो रहा था. लगा, रातभर जागने और हंसने-बोलने की वजह से अजीब लग रहा है. दिन चढ़ने के साथ दर्द बढ़ता जा रहा था. मैं जान-पहचान के एक डॉक्टर के पास पहुंची. उसे ब्रेस्ट में गांठ नजर आई, मुझे टेस्ट के लिए बोला. चार घंटों के भीतर ही रिपोर्ट आ चुकी थी. डॉक्टर का मेरे पास फोन आया.

अब तक दर्द में थोड़ा आराम था. क्लिनिक में बैठे हुए मैं डॉक्टर का चेहरा देख रही थी. कई सालों से हम एक-दूसरे को जानते थे. डॉक्टर के चेहरे पर परेशानी पढ़ पाने में कोई खास मुश्किल नहीं हुई. मैं समझ चुकी थी कि ये चिंता मेरे लिए है. डॉक्टर को सहज करने के लिए मैंने हंसते हुए पूछा- रिपोर्ट में क्या लिखा है? कोई छोटी-मोटी बीमारी तो नहीं है! मुझे आनंद के राजेश खन्ना जैसी बीमारी चाहिए कि बताने में मजा आए. डॉक्टर टकटकी लगाए मेरा चेहरा देखता रहा.
कुछ और जांचों के बाद उसका डर पक्का हो गया. मेरे दाएं ब्रेस्ट में कैंसर पनप चुका था.



मैं घर लौटी. पति को सिर्फ ये बताया कि ब्रेस्ट में छोटी सी गांठ है, सर्जरी होनी है. बेटे को फोन करके बुलाया. सर्जरी के लिए दो दिनों का वक्त मिला. मैं एकदम खुश और वैसे ही हंसती-बतियाती रही, जैसे हमेशा रहती हूं. सर्जरी के वक्त तक सिर्फ मैं, मेरी बहन और डॉक्टर को पता था कि मेरा ब्रेस्ट रिमूव होने वाला है. सर्जरी हुई. दायां ब्रेस्ट हटा दिया गया. इसके बाद ही घरवालों को पता चल सका कि मेरी सर्जरी बड़ी थी. अब तक मैं सर्जरी और ब्रेस्ट रिमूवल को लेकर सहज थी. आसपास बहुत सी औरतों को जानती थी, जो बिना ब्रेस्ट के उसी जिंदादिली से जी रही हैं.

अस्पताल से छुट्टी मिली तब फर्क महसूस होना शुरू हुआ. शरीर का एक हिस्सा हट चुका था, चलते हुए संतुलन बनाने में मुश्किल आती. मैं चलते हुए लड़खड़ा जाया करती. डॉक्टर से कहा करती, मेरा दूसरा ब्रेस्ट भी हटा दो.

सर्जरी कैंसर के इलाज का पहला पड़ाव है. शायद सबसे आसान. इसके बाद 6 महीने तक कीमो के सेशन्स चले. असल परेशानी इसी के साथ शुरू हुई. कैंसर को खत्म करने वाले इस इलाज के साइड इफैक्ट थे- उल्टियां, उबकाई, बाल झड़ना, नाखून काले पड़ना, पेट में दर्द, सिरदर्द, चक्कर आना, वजन कम होना और अवसाद...! मैं पूरी तरह से डिप्रेशन में जा चुकी थी. बात-बात पर रोती. चाहती थी कि बिस्तर पर चारों ओर लोग मुझे घेरकर बैठे रहें. कोई भी किसी काम से उठता या नजरों से हटता तो मैं रो पड़ती. महीना-दर-महीना मैं कमजोर होती चली गई. तीसरे सेशन में तो ये हाल था कि मैंने अपने भाई से कहा- मुझे पागलखाने छोड़ आओ. मुझमें कोई भी वैसी बात नहीं थी जो पहले की सरिता में हुआ करती. मैं शादी-ब्याह में महफिलों को जान होती थी लेकिन अब हर बात पर आंसू ढरक आते.

इसी दौरान कई और भी बातें एक साथ हुईं. बिजनेस में कुछ नुकसान हो गया. बेटों की शादी की उम्र हो चुकी थी और मां बिस्तर पर पड़ी थी. मुलाकातियों से मैं अपने बेटों को गोद लेने की बात कहने लगी. वक्त के साथ हालांकि अवसाद कम हुआ.



एक तो ब्रेस्ट नहीं, उसपर झड़ते बाल
ब्रेस्ट कैंसर के बाद कीमो में बाल झड़ते हैं, ये सब जानते हैं. मेरे बाल खूब लंबे हुआ करते. सबको लगा कि मैं कैसे सह पाऊंगी. पहले कीमो के बाद ही परिवार ने मेरे बाल बहुत छोटे-छोटे करवा दिए. एक अच्छा सा हेयरकट दे दिया. तीसरे कीमो में एक रोज कोई मेरी कंघी कर रहा था कि गुच्छों में आधे सिर के बाल आ गए. कंघी करने वाली जोरों से रो पड़ी. आंसू मेरी भी आंखों में थे लेकिन अपने बाल झड़ने से कम और उसे यूं बिलखता देखकर ज्यादा.
मां बताती हैं कि मेरे पति भी कीमो के दौरान दहाड़ें मारकर रो पड़े थे, सरिता हंसती हुई कहती हैं. बीमारी में मुहब्बत कैसी निखरकर सामने आती है.

ब्रेस्ट कैंसर के बाद की जिंदगी...
सरिता याद करती हैं, मैं खुशकिस्मत रही कि मेरे आसपास सारे लोग संवेदनशील और पढ़े-लिखे हैं. वे आते तो दया दिखाने की बजाए उदाहरणों में बात करते. देखो, फलां औरत को भी ये बीमारी है. सर्जरी के बाद वो एकदम सामान्य जिंदगी जी रही है. खुद ब्रेस्ट कैंसर की तकलीफ से गुजर चुकी औरतें मिलने आतीं या फोन पर बातें करतीं. उनसे बात करना बड़ा सहारा देता. कपड़े खरीदने जाने पर हालांकि कुछ अलग अनुभव हुए. दुकान के लड़के शरीर का मुआयना करते. बाद में पता चला कि उनके घर पर भी मुझ-सा कोई है.

बीमारी में तकलीफ सुने जाने से बड़ा सहारा कुछ नहीं. ये इलाज जितना ही असरदार है. यही वजह है कि मैं ब्रेस्ट कैंसर सर्वाइवर ग्रुप से जुड़ी. गांव-गांव घूमकर लोगों को इस बीमारी के बारे में बताती हूं. शहरों में झुग्गी-बस्तियों में जाती हूं, जहां कैंसर के बारे में नहीं के बराबर जागरुकता है. अस्पताल में कैंसर के मरीजों के साथ वक्त बिताती हूं. हमारे ग्रुप में पुरुष भी जुड़े हुए हैं. वे भी औरतों के लिए उतनी ही संवेदनशीलता से सोचते और बातें करते हैं.

हालांकि ब्रेस्ट कैंसर को लेकर हौवा अभी भी पूरी तरह से खत्म होना बाकी है. सोशल मीडिया पर जब मैं अपने ब्रेस्ट कैंसर की बातें लिखती हूं या तस्वीरें पोस्ट करती हूं तो मां का फोन आ जाता है. उनको लगता है कि मेरा कैंसर मेरे बेटों की शादी में रुकावट डाल सकता है.

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